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सोमवार, 30 नवंबर 2020

टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, हरिद्वार, उत्तरकाशी, चमोली और देहरादून के युवाओं के लिए भारतीय सेना ने 20 दिसंबर से सेना भर्ती की होने के लिए विशेष अभियान छेड़ा हैं यह भर्ती 2 जनवरी 2021 तक चलेगी। रजिस्ट्रेशन नवंबर से शुरू हो चुके हैं और अब रजिस्ट्रेशन बंद होने में कुछ ही दिन शेष हैं। जो भी अभ्यर्थी इसमे भाग लेने के लिए इच्छुक हैं वे 4 दिसंबर से पहले पहले http://joinindianarmy.nic.in पर अपना रजिस्ट्रेशन करें , बिना रजिस्ट्रेशन के भर्ती अभियान में भाग नहीं ले सकते हैं, 


रजिस्ट्रेशन कराने से पहले नीचे सभी पदों के लिए तय की गईं योग्यताओं का विवरण 1) सिपाही के पद की आयु सीमा साढे 17 वर्ष से 21 वर्ष तय की गई है। उम्मीदवारों के दसवीं में कम से कम 45 फीसदी मार्क्स और हर एक विषय के अंदर 33 फीसदी मार्क्स होना अनिवार्य है। 2) सिपाही टेक्निकल के लिए आयु सीमा साढ़े 17 वर्ष से 23 वर्ष तय की गई है और उसके लिए 12वीं में साइंस साइड से 50 फीसदी मार्क्स होना अनिवार्य 

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

कहानी - डॉक्टर की लेखनी || लेखिका - आरोही रावत, कक्षा - 3, उम्र 8 साल,


शशि नाम का एक लडका था। शशि चौकलेट और टॉफी बहुत खाता था!! अपनी मम्मी पापा से हर बार चॉकलेट और टॉफी खाने की जिद्द करता था !! मम्मी पापा भी उसकी जिद्द के आगे हार जाते थे और उसे चॉकलेट दे देते थे !! 
एक बार वह अपनी मम्मी के साथ बाजार गया और उसने वहाँ अपनी मम्मी से टॉफी मांगी । मम्मी ने शशि को टॉफी दे दी !! थोड़ी देर बाद अचानक उसके दांत में दर्द होने लगा उसने दर्द की बात मम्मी को बताई !! शशि की मम्मी उसे पास ही डॉक्टर के पास ले गई। डॉक्टर को उसके मुहं में दर्द की बात बताई । डॉ ने शशि से कुछ सवाल पूछे !! तुम्हारा नाम क्या है ? बच्चे ने कहा शशि !! डॉ ने उम्र बताने को कहा ? शशि ने कहा 9 साल !! डॉक्टर ने कहा कौन सी क्लास में पढ़ते हो ? शशि ने जवाब दिया कक्षा चार में !! डॉ ने शशि को मुहं खोलने के लिए कहा और मुहं देखने के बाद पूछा क्या आप चॉकलेट खाते हो ? शशि चुप हो गया !! डॉ समझ गए और कहा क्या आपको पता है चॉकलेट खाने से आपके पूरे दांत ख़राब हो जायेंगे, और एक दिन तुम्हारे सारे दांतों पर कीड़े लग जायेंगे। और फिर उन्हें तोड़ना पडेगा।!! शशि खमोश होकर सुन रहा था । डॉ ने उससे कहा मुझसे वादा करो कि आज के बाद तुम चॉकलेट नही खाओगे!! शशि ने डॉ से वादा किया कि आज के बाद वह चॉकलेट नही खायेगा। 
डॉ ने उसके पर्चे पर दवाई लिखी और शशि की मम्मी से उन्हें सामने वाली दुकान से लेने को कहा और कहा कि पर्चे पर जैसा लिखा है उसके हिसाब से बच्चे को दवाई दे देना । शशि की मम्मी ने सामने वाली दुकान से दवाई ली और घर वापस आकर दवाईओं को घर पर बने रैंक जहाँ पहले से और दवाईयाँ रखी थी उनके साथ रख दिया।।


शाम को जब शशि की मम्मी ने शशि को दवाई खिलाने के लिए रैंक से दवाई निकालनी चाही पर शशि ने उन दवाईओं को अन्य दवाईयों के साथ मिला दिया था। मम्मी ने डॉ की पर्ची निकाली और उसे पढ़कर दवाई खोजने लगी । पर डॉ की राइटिंग समझ में नहीं आई उसने शशि के पापा को भी दिखाया शशि के पापा को भी डॉ की लेखनी समझ में नही आयी। काफी कोशिश करने के बाद भी जब समझ नही तो मम्मी ने कुछ मिलती-जुलती दवाई निकली शशि को पिला दी पर मम्मी ने शशि को गलत दवाई दे दी थी !! जिससे शशि की तवियत और ख़राब हो गयी उसे बुखार भी हो गया।। उसके मम्मी पापा डर गए और वह उसे जल्दी से उसी डॉ के पास ले गए । डॉ ने शशि को देखा और उसे एक सुई लगायी और मम्मी पापा से कहा घबराने कोई बात नही है शशि जल्द ही ठीक हो जायेगा !! अच्छा हुआ आप बच्चे को जल्दी ले आये वरना कुछ भी हो सकता था। शशि के शारीर में गलत चीज खाने से गलत प्रतिक्रया हुई है !! आप लोगो ने इसे कोई गलत दवाई तो नही दी !! मम्मी ने कहा शायद मैंने गलत दवाई दे दी !! डॉ ने कहा पर मैंने तो आपको लिखकर दिया था कि ये दवाई देनी है !! मम्मी ने कहा कि डॉ साहब हमे आपकी राइटिंग समझ में आई आपने लिखा ही ऐसा था कि उसे कोई पढ़ ही नही सकता। और हमने गलत दवा दी जिसकी वजह से आज हमारा बच्चा मौत के मुहं में पहुँच गया । डॉ को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने उनसे माफ़ी मांगी । इधर शशि को होश आ गया उसकी मम्मी ने उसे चूमा डॉ ने कहा कि आज मेरी वजह से आपको तकलीफ उठानी पड़ी तभी शशि बोल उठा डॉ अंकल आप मुझसे भी प्रोमिश करो कि आज के बाद आप भी साफ साफ राइटिंग में लोगों को दवाई लिखकर दोगे डॉ को बहुत आत्मग्लानी हुई और उसने कहा हाँ बेटा मै आज से अभी से ये वादा करता हूँ कि साफ साफ दवाई लिखकर दूँगा!!



लेखिका
आरोही रावत
कक्षा - 3
उम्र 8 साल

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

डोला पालकी आंदोलन के जनक जयानंद भारती डॉ विवेक आर्य

गढ़वाल में सवर्णों तथा स्थानीय मुसलमान युवक -युवतियां के विवाह के अवसरों पर डोला-पालकी के उपयोग की परंपरा सदियों से रही है। बारात में डोला-पालकी उठाने का कार्य मुख्यत शिल्पकार ही करते थे। किन्तु सवर्ण समाज ने उन्हें अपने ही पुत्र पुत्रियों के विवाह के अवसर पर डोला-पालकी के प्रयोग से वंचित कर दिया था। शिल्पकार वर वधुओं को डोला-पालकी तथा ऐसी सवारियों पर बैठने का सामजिक अधिकार नहीं दिया गया था। नियम के प्रतिकूल आचरण करने वाले शिल्पकारों को दण्डित किया जाता था।

गढ़वाल में आर्य समाज की स्थापना के प्रारम्भ में गंगादत जोशी (तहसीलदार) जोतसिंह नेगी (सेंताल्मेंट आफसर),नरेंद्र सिंह (चीफ रीडर) आदि प्रबुद्ध लोगों ने आर्य समाज के विचारों को जनता तक पहुँचाने का कार्य किया था। किन्तु असंगठित और कम व्यापक होने के कारण इनके प्रयत्न सीमित क्षेत्र तक ही प्रभाव स्थापित कर सके।

यह वर्ग सवर्णों की अपेक्षा आर्थिक दृष्टि से भी बहुत पिछड़ा हुआ था। 20वीं शताब्दी के नवजागरण के प्रभाओं से उत्पन्न चेतना के फलस्वरूप शिल्पकार नेतृत्व के रूप में जयानंद भारती का आविर्भाव हुआ। सन 1920 के पश्चात जयानंद भारती के नेतृत्व मैं शिल्पकारों की सामजिक,आर्थिक,समस्याओं तथा,उनमें व्याप्त कुरीतियों के हल के लिए संघठित प्रयास किये गए। नेता जयानंद भारती ने सवर्ण नरेंद्र सिंह तथा सुरेन्द्र सिंह के साथ मिलकर शिल्पकारों में व्याप्त कुरीतियाँ दूर करने बच्चों को शिक्षा के लिए स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया।

कुमाऊ में लाला लाजपत राय की उपस्थिति में सन 1913 में आर्य समाज के शुद्धिकरण के समारोह में शिल्पकारों को जनेऊ देने का कार्यकर्म चलाया गया।
शिल्पकारों को जनेऊ दिए जाने के फलस्वरूप गढ़वाल में भी आर्य समाज द्वारा सन 1920 के पश्चात् जनेऊ देने का कार्यक्रम चलाया गया था। शिल्पकारों के मध्य जन-जागरण कार्यक्रम के अर्न्तगत सवर्णों के एक वर्ग विशेष द्वारा शिल्पकारों के साथ संघर्ष की घटनाएं इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि रूढिवादी व्यक्ति समाज मैं परिवर्तन में अवरोधक बन गए थे।

गढ़वाल में ईसाई मिशनरियों के कारण निर्बल शिल्पकार वर्ग में धर्मांतरण की बढती रूचि बढ़ना एक बड़ी चुनौती थी । फलस्वरूप आर्यसमाज द्वारा ईसाई मिशनरियों के कुचक्र को रोकने के लिए शिल्पकारों के मध्य उनके सामाजिक, आर्थिक पिछडेपन को दूर करने के लिए प्रयत्न किये गए। इन प्रयासों में 1910 में दुग्गाडा में पहला आर्य समाज का स्कूल स्थापित किया गया था। तत्पश्चात 1913 में स्वामी श्रद्धानंद द्वारा आर्य समाज का स्कूल प्रारंभ किया गया। गढ़वाल में आर्य समाज से इन प्रारम्भिक प्रयत्नों से एक ओर जहाँ आर्य समाज के कार्य क्षेत्र में अपेक्षाकृत वृद्धि ही वही दूसरी ओर शिल्पकार में शिक्षा के प्रति रुझान भी बढ़ा। इससे शिल्पकारों के ईसाईकरण के प्रयास शिथिल पड़ने लगे। शिल्पकारों में अशिक्षा कितनी थी इसका अनुमान इसी तथ्य से चलता है कि प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व तक गढ़वाल में एक भी शिल्पकार इंट्रेस परीक्षा उतीर्ण नहीं था।

गढ़वाल मेंआर्य समाज को विस्तार देकर शिल्पवर्ग की सहानुभूति अपने पक्ष में करने के उद्देश्य से आर्य प्रतिनिधि सभा के उपदेशक सन 1920 में गढ़वाल के प्रमुख नगरो कोटद्वार,दुगड्डा,लेंसिदौन,प ोडी,श्रीनगर में भेजे गए। इनमें गुरुकुल कांगडी के प्रचारक नरदेव शास्त्री जी प्रमुख व्यक्ति थे। गढ़वाल में आर्य समाज के आन्दोलन के रूप में गाँवों तक पहुँचने के उद्देश्य से नगर-कस्बों के पश्चात् चेलू सैन,बीरोंखाल,उदयपुर,अवाल्सु ं,खाटली,रिन्ग्वाद्स्युं आदि ग्रामीण क्षेत्रों में आर्य समाज की शाखाएं और विद्यालय आदि स्थापित कर ईसाई मिशनरी की चुनौती को स्वीकार किया गया।

1920 में आर्य समाज के तत्वावधान में अकाल राहत व शैक्षणिक कर्यकर्मों के प्रारम्भ होने के पश्चात् शिल्पकारों को सवर्णों के समान सामजिक अधिकार दिलाने के उद्देश्य से उनका जनेऊ संस्कार भी आर्यसमाज द्वारा आरंभ किया गया। इस प्रकार सन1924 में जयानंद भारती के नेतृत्व में डोला-पालकी बारातें संगठित की गई। इस प्रयास में कुरिखाल तथा बिंदल गाँव के शिल्पकारों की बारात ने डोला-पालकी के साथ कुरिखाल से बिंदल गाँव के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में कहीं भी सवर्णों के गाँव नहीं पड़ते थे।

कुरिखाल के कोली शिल्पकार भूमि हिस्सेदार होने के कारण अन्य शिल्पकारों की तुलना में संपन्न थे। दूसरी ओर उन्नी व्यवसाय के कुशल शिल्पी के रूप में इनके कुटीर उद्योग भी समृद्ध थे। इस स्थिति का लाभ उठाकर जातिवाद को चुनौती देने के उद्देश्य से आर्य समाजी नेताओं के संरक्षण में डोला-पालकी बारात निकाली गई। किन्तु एक घटना के अनुसार दुगड्डा के निकट चर गाँव के संपन्न मुस्लिम परिवार के हैदर नामक युवक के नेतृत्व में हिन्दू सवर्णों द्वारा जुड़ा स्थान पर शिल्पकारों की बारात रोकी गई। तत्पश्चात डोला-पालकी तोड़कर बारातियों के साथ मार- पीट की गयी। प्रशासन के हस्तक्षेप किये जाने के उपरांत भी चार दिन तक बारात मार्ग में ही रुकी रही। ऐसी अनेक घटनाएं उस काल में हुई। आर्य समाज के प्रभाव में आकर जब जब दलितों ने डोला-पालकी में नवविवाहितों को बैठाने का प्रयास किया तब तब उनके साथ मारपीट और लूटपाट की गयी। ऐसा व्यवहार दलितों की सैकड़ों बारातों के साथ हुआ। भारती जी न केवल संघर्ष के मोर्चे पर खड़े हुए बल्कि अदालतों में भी वाद दायर किये।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दलित शिल्पकारों के हक़ में फैसला दिया गया। लेकिन सवर्णों का अत्याचार रुका नहीं। जयानंद भारतीय ने सत्याग्रह समिति बना कर इन अत्याचारों के विरुद्ध लड़ाई जारी रखी। देश के बड़े नेताओं गोविन्द बल्लभ पन्त, जवाहर लाल नेहरु और महात्मा गांधी को भी उन्होंने इन अत्याचारों से अवगत कराया गया। गांधी जी को पत्र लिख कर,उन्होंने आग्रह किया कि गढ़वाल में शिल्पकारों की बारातों पर अत्याचार बंद होने तक वे व्यक्तिगत सत्याग्रह पर रोक लगा दे। गांधी जी ने भारतीय जी के पत्र को गंभीरता पूर्वक लिया और गढ़वाल में हरिजनों के उत्पीड़न बंद होने तक व्यक्तिगत सत्याग्रह पर रोक लगा दी। अखिल राष्ट्रीय स्तर पर डोला-पालकी के लिए यह संघर्ष किया गया।

अंत में अनेक प्रयासों जनजागरण के पश्चात शिल्पकारों को अपना हक आर्यसमाज ने दिलवाया। डोला-पालकी आंदोलन लगभग 20 वर्ष तक चला। इस आंदोलन के प्राण जयानंद भारती थे। एक निम्न शिल्पकार परिवार में जन्म लेकर जयानंद भारती ने स्वामी दयानंद के समानता के सन्देश को जनमानस तक पहुँचाने के लिए जो संघर्ष किया। यह अपने आप में एक कीर्तिमान है।

आज हमारे देश की दलित राजनीति में जयानंद भारती और आर्यसमाज के दलितौद्धार के कार्य को पुनः स्मरण तक नहीं किया जाता। केवल डॉ अम्बेडकर और ज्योतिबा पहले के प्रयासों का स्मरण किया जाता हैं। कारण वोट बैंक की राजनीती है। आईये हम उन महापुरुषों के योगदान से समाज को अवगत करवाये।
डॉ विवेक आर्य

रविवार, 17 दिसंबर 2017

उत्तराखंड के तीन और लाल लेंगे देश की सुरक्षा में अहम् जिम्मेदारी-मदन जैड़ा



मदन जैड़ा एनडीए सरकार में उत्तराखंड के अधिकारियों को सेना एवं शासन में अहम पदों की जिम्मेदारी दी जा रही है। थलसेना के प्रमुख बिपिन रावत हैं। अब नए साल में तीन लेफ्टिनेंट जनरलों को सेना में अहम जिम्मेदारी दी जा रही है। नए साल में ये तीन वरिष्ठ अधिकारी अपनी नई जिम्मेदारी संभालेंगे।सेना में डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशन (डीजीएमओ) का पद अहम होता है। अभी लेफ्टिनेंट जनरल ए. के. भट्ट डीजीएमओ हैं। जो मूलत: उत्तराखंड के पौड़ी जिले के निवासी हैं। लेकिन उन्हें अब दूसरी अहम जिम्मेदारी दी जा रही है। वे 15 कार्प के कमांडर बनाएं जाएंगे। इस कार्प का मुख्यालय श्रीनगर में है। पाकिस्तान के खिलाफ अब तक हुए सभी युद्धों में अहम भूमिका निभाने वाली यह कार्प उत्तरी कमान की सबसे महत्वपूर्ण कार्प मानी जाती है। भट्ट जल्द इसके कमाडर का कार्यभार संभालेंगे।सेना से जूड़े सूत्रों के अनुसार, नए डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चौहान होंगे। वे भी पौड़ी जिले के मूल निवासी हैं। चौहान अभी 3 कार्प कमॉडर हैं। इस कार्प का मुख्यालय दीमापुर है जो पूर्वोत्तर से जुड़े अहम मुद्दों को देखती है। सूत्रों के अनुसार इस महीने के तहत तक लेफ्टिनेंट जनरल चौहान नए डीजीएमओ के रूप में कार्यभार संभाल सकते हैं। उत्तराखंड मूल के तीसरे बड़े अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल जे. एस. नेगी हैं जो अभी 2 कार्प के कमांडर हैं। इसका मुख्यालय अंबाला में है। उन्हें स्ट्रैजिक फोर्सेज कमांड का कमांडर बनाया जा रहा है। यह कमान वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में सृजित हुई थी जिसे स्ट्रैजिक न्यूक्लीयर कमांड के रूप में भी जानते हैं। इस कमांड के जिम्मे न्यूक्लीयर वैपन और इससे जुड़ी रणनीति होती है। यह न्यूक्लीयर कमॉड अथॉरिटी का हिस्सा होती है। बता दें कि पौड़ी जिला वर्तमान सेना प्रमुख का गृह क्षेत्र भी है। खास बात यह है कि तीन अधिकारी गोरखा रेजिमेंट से हैं। सेना प्रमुख भी गोरखा रेजिमेंट से हैं।उत्तराखंड के लोग अहम पदों पर: सेना प्रमुख बिपिन रावत और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल उत्तराखंड से हैं। हाल में पूर्व नौसेनाध्यक्ष डी. के. जोशी को अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल बनाया गया है। रॉ प्रमुख, कोस्ट गार्ड के प्रमुख भी उत्तराखंड से हैं। हाल में प्रदीप सिंह खरौला को एयर इंडिया का सीएमडी बनाया गया है, वे भी उत्तराखंड के हैं।

सोमवार, 25 सितंबर 2017

“कड़ाली” पर हुई एक रिसर्ज से पता चली अहम् जानकारी


हरिद्वार (महावीर नेगी)। “कड़ाली” जिसे पहाड़ की बिच्छू घास भी कहा जाता है जिसे अक्सर पहाड़ में बच्चों की शैतानी पर उन्हे सजा देने के काम में लाया जाता था। लेकिन बदलते वक्त के साथ पता चला कि कड़ाली न केवल बच्चों की शैतानी को रोकने में काम आती है इसका उपयोग रोजगार के अवसर पैदा करने और पलायन पर लगाम लगाने की भी क्षमता हैं। हरिद्वार के एक छात्र ने अपने शोध में यह साबित कर दिया है कि

कड़ाली का फाइबर अन्य फाइबर के मुकाबले न केवल मजबूत है अपितु यह मानव निर्मित फाइबर से सस्ता भी हैं। मंयक पोखरियाल के इस शोध का प्रकाशन अमेरिका की प्रसिद्व टेलर एंड फ्रांसिस ऑनलाइन में भी प्रकाशित हुआ हैं। शोध में पाया गया कि कंड़ाली का फाइबर ऑटोमोबाइल इंडस्ट्रीज, एयरो स्पेस इंडस्ट्रीज,स्पोर्टस इंडस्ट्रीज,फैब्रिकेटेड स्ट्रक्चर,डोरपैनल,हेलमेट आदि बनाने में सहायक है।

20 सितंबर को अमेरिका की टेलर एंड फ्रांसिस ऑनलाइन में जब कंडाली को लेकर हरिद्वार के छात्र मंयक पोखरियाल का शोध प्रकाशित हुआ तो यह साबित हो गया कि जंगल में पायी अपने आप उगने वाली यह घास कितने काम की हैं। मंयक ने बताया कि उसने कंड़ाली हिमायलन नेट्टल पर 2013 में मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी के दौरान शोध शुरु किया था। जिसे करीब 2015 में पूरा कर लिया गया था। उन्होने बताया कि उन्होने अपने इस शोध में पाया कि उत्तराखंड राज्य के मध्य हिमालयी छेत्र में १२००.३००० मीटर पर पाए जाने वाला पौधा कंडाली हिमालयन नेट्ल के फाइबर को हम कम्पोजिट मैटेरियल्स बनाने में इस्तेमाल कर सकते है। यह एक इको फाइबर है जो मानव निर्मित फाइबर से काफी सस्ता आसानी से उपलब्ध ए कम घनत्व वाला बायो डिग्रेडेबल है। इसको पॉल्मर के साथ मिलकर कम्पोजिट बनाया जा सकता है।इसका फाइबर बास्ट फाइबर की केटेगरी में आने वाला सबसे मजबूत फाइबर है

इस शोध में हिमालयन नेट्टल फाइबर को पहले केमिकल ट्रीटमेंट देने के बाद सुखाकर इसको पॉल्मर के साथ रैनफोर्स किया गया। उसके बाद इस पर विभिन परीक्षण जैसे टेंसिलटेस्ट,इम्पैक्टटेस्ट,वियर टेस्ट किये गए जिसमे यह पाया गया की इसको विभिन्न क्षेत्रों जैसे ऑटोमोबाइल इंडस्ट्रीज, एयरो स्पेस इंडस्ट्रीज,स्पोर्टस इंडस्ट्रीज,फैब्रिकेटेड स्ट्रक्चर,डोरपैनल,हेलमेट आदि बनाने में सहायक है।

मंयक ने बताया कि पूर्व में उत्तरखंड के पहाड़ी इलाके जैसे पौड़ी,चमोली और पिथौरागढ़ आदि क्षेत्रों में लोग इसके फाइबर से रस्सी, धागे,बोरे, चटाई व कपडा आदि बनते थे जो जानकारी के अभाव में अब कम हो गया था यह पौधा १२०० मीटर की उचाई से ऊपर प्राकर्तिक रूप से बंजर भूमि, रास्ते एवं सड़को के किनारे स्वतः ही उग जाता है।
पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाने वाला हिमालयन नेट्टल रोजगार देने और पलायन रोकने में सहायक होने के साथ साथ लोगो की आर्थिक स्थिति को सुधारने में सहायक सिद्ध होगा। मंयक ने बताया कि इस शोद्ध में उनके गाइड एवं पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ लालता प्रसाद ए सहायक आचार्य हिमांशु प्रसाद रतूड़ी उत्तराखंड बम्बू एंड फाइबर डेवलपमेंट बोर्ड के मैनेजर दिनेश जोशी, आगाज़ फाउंडेशन के जे0 पी० मैथानी का पूर्ण सहयोग किया।

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

उत्तराखंड के एक ऐसे बहुमूल्य उत्पाद की जिसका नाम सुनते ही हमें इससे अपना परम्परागत सम्बन्ध याद आने लगता है। गहत Macrotyloma uniflorum L.उत्तराखण्ड में उगायी जाने वाली एक महत्वपूर्ण फसल है डॉ राजेंद्र डोभाल महानिदेशक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् उत्तराखडं।

उत्तराखंड के एक ऐसे बहुमूल्य उत्पाद की जिसका नाम सुनते ही हमें इससे अपना परम्परागत सम्बन्ध याद आने लगता है। गहत उत्तराखण्ड में उगायी जाने वाली एक महत्वपूर्ण फसल है जिसका वैज्ञानिक नाम Macrotyloma uniflorum L. जो कि Fabaceae कुल का पौधा है। इसे ही Dolichos uniflorum भी कहते हैं। वैसे तो गहत का मुख्य स्रोत अफ्रीका माना जाता है लेकिन भारत में इसका इतिहास बहुत पुराना है। विश्व में पाए जाने वाली कुल 240 प्रजातियों में से 23 प्रजातियां सिर्फ भारत में पायी जाती हैं जबकि शेष प्रजातियां अफ्रीका में पायी जाती हैं। In Association with Amazon.in
गहत या गहथ को इसके अलावा और भी बहुत नामों से जाना जाता है जैसे कि अंग्रेजी में Horse gram, हिन्दी में कुलथ, तेलुगू में उलावालु, कन्नड़ में हुरूली, तमिल में कोलू, संस्कृत में कुलत्थिका, गुजराती में कुल्थी तथा मराठी में डुल्गा आदि। भारत के अलावा चीन, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, श्रीलंका तथा इंडोनेशिया में भी गहत का उत्पादन किया जाता है। मुख्य रूप से भारत में गहत का उत्पादन लगभग सभी राज्यों में किया जाता है लेकिन कुछ प्रमुख राज्यों से भारत के कुल उत्पादन में 28 प्रतिशत कर्नाटक, 18 प्रतिशत तमिलनाडु, 10 प्रतिशत महाराष्ट्र, 10 प्रतिशत ओडिशा तथा 10 प्रतिशत आंध्र प्रदेश का योगदान है।
भारत में गहत मुख्यतः रूप से असिंचित दशा में उगाया जाता है और जहां तक उत्तराखण्ड में गहत उत्पादन है यह परम्परागत रूप से दूरस्थ खेतो में उगाया जाता है क्योंकि गहत की फसल में सूखा सहन करने की क्षमता होती है, साथ ही नाइट्रोजन फिक्सेशन करने की भी क्षमता होती है। इसकी खेती के लिये 20 से 30 डिग्री सेल्शियस, जहाँ 200 से 700 मिलीमीटर वर्षा होती है, उपयुक्त पायी जाती है। गहत बीज का उत्पादन भारत में 150 से 300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर किया जाता था, मगर आई0सी0आर0आई0एस0ए0टी0, हैदराबाद द्वारा वर्ष 2005 में उच्च गुणवत्ता वाली प्रजाति विकसित की गयी जिससे गहत बीज उत्पादन बढ़कर 1100 से 2000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गया है। गहत की मुख्यतः 02 प्रजातियां पायी जाती हैं जिनमें से कि एक जंगली तथा दूसरी खेती कर उगायी जाती हैं। यहां सामान्यतः गहत के बीज लाल, सफेद, काला तथा भूरा रंग के पाये जाते हैं।


गहत को सामान्यतः दाल के रूप में प्रयोग किया जाता है जो कि गरीबों के भोजन में शामिल किया गया है। गहत में प्रोटीन तथा कार्बोहाईड्रेड की प्रचूर मात्रा होने के कारण आज गहत का उपयोग सम्पूर्ण विश्व में विभिन्न खाद्य तथा पोषक पदार्थों के रूप में किया जा रहा है। इसके बीज में कार्बोहाईड्रेड 57.3 ग्राम, प्रोटीन 22.0 ग्राम, फाइबर 5.3 ग्राम, कैरोटीन 11.9 आई0यू0, आयरन 7.6 मिलीग्राम, कैल्शियम 0.28 मिलीग्राम, मैग्नीशियम 0.18 मिलीग्राम, मैग्नीज 37.0 मिलीग्राम, फोस्फोरस 0.39 मिलीग्राम, कॉपर 19.0 मिलीग्राम तथा जिंक 0.28 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम तक पाये जाते हैं।परम्परागत रूप से ही गहत का उपयोग इसकी विशेषताओ के अनुरूप किया जाता है। इसकी प्रकृति गरम माने जाने के कारण इसका मुख्य उपयोग सर्दियों में या अधिक ठंड होने पर अधिक किया जाता है। दास, 1988 तथा पेसीन, 1999 द्वारा अपने शोध में गहत को कैल्शियम तथा कैल्शियम फास्फेट स्टोन को गलाने तथा बनने से रोकने के लिये पाया गया। एक आयुर्वेदिक औषधि सिस्टोन में भी गहत को मुख्य भाग में लिया जाता है जो कि किडनी स्टोन के लिये प्रयोग की जाती है। इसके अलावा अन्य विभिन्न शोधों में भी इसके उपयोग को किडनी रोगो के रूप में उपयुक्त पाया गया है। इसमें फाइटिक एसिड तथा फिनोलिक एसिड की अच्छी मात्रा होने के कारण इसे सामान्य कफ, गले में इन्फेक्शन , बुखार तथा अस्थमा आदि में 
प्रयोग किया जाता है। भारतीय कैमिकल टैक्नोलॉजी संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किये गये एक शोध में बताया गया है कि गहत के बीज में प्रोटीन टायरोसिन फॉस्फेटेज 1-बीटा एन्जाइम को रोकने की क्षमता होती है जो कि कार्बोहाईड्रेड के पाचन को कम कर शुगर को घटाने में मदद करता है तथा साथ ही शरीर में इन्सुलिन रेजिसटेंस को भी कम करता है। उत्तराखण्ड में गहत को बाजार उपलब्ध न होने के कारण स्थानीय काश्तकार केवल स्थानीय विनिमय प्रणाली के अन्तर्गत चावल, नमक एवं नगदी के बदले बेच
देते हैं जबकि राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर में गहत 100 से 200 रूपये प्रति किलोग्राम तक बेचा जाता है। उत्तराखण्ड गहत स्वयं में एक ब्रांड होने के कारण बड़े बाजारों में इसकी मांग रहती है जिसकी औषधीय तथा न्यूट्रास्यूटिकल महत्ता को देखते हुये आज विभिन्न कम्पनियां नये-नये शोध कर उत्पाद बना रही है तथा भविष्य में इसकी बढ़ती मांग हेतु इसके बहुतायत उत्पादन की आवश्यकता है।
राज्य के परिप्रेक्ष्य में गहत की खेती यदि वैज्ञानिक एवं व्यवसायिक रूप में की जाय तथा दूरस्थ खेतो में जो कि बंजर होते जा रहे है में भी की जाये तो यह राज्य की आर्थिकी का एक बेहतर पर्याय बन सकता है।

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

ऐसे बचेगा हिमालय मात्र शपत लेने से कुछ नहीं होने वाला इस ‘भगीरथ’ ने भी धरती पर उतारी ‘गंगा’- सच्चिदानंद भारती by Dainik Jagaran Uttarakhand

‘चिपको’ आंदोलन की धरती उत्तराखंड में पिछली सदी के आखिरी दशक में जंगल पनपाने के साथ ही बारिश की बूंदों को सहेजने की ऐसी धारा फूटी, जिसने न सिर्फ सिस्टम को आईना दिखाया, बल्कि जनमानस के लिए प्रेरणा बन गई। सूखी रहने वाली पौड़ी जिले के उफरैंखाल से लगी गाडखर्क की जिस पहाड़ी पर कभी बारिश की बूंद तक नहीं ठहरती थी, आज वहां न सिर्फ हरा-भरा जंगल है, बल्कि जलस्रोत रिचार्ज होने से बरसाती नदी भी जी उठी। इसे नाम दिया गया है ‘गाडगंगा’। 2010 से लोग इस गंगा का पानी पी रहे हैं। भीषण गर्मी में भी इसमें तीन एलपीएम (लीटर प्रति मिनट) पानी रहता है। बदलाव की बयार यूं ही नहीं बही, गाडखर्क की पहाड़ी को यह ‘वरदान’ आधुनिक भगीरथ के रूप में आए सच्चिदानंद भारती के अथक प्रयासों ने दिया। 1पौड़ी जिले में एक छोटा सा गंवई कस्बा है उफरैंखाल। इसी से लगी है गाडखर्क की पहाड़ी, जो सच्चिदानंद भारती के प्रयासों की गवाही दे रही है। एक दौर में चिपको आंदोलन से जुड़े रहे सच्चिदानंद भारती बताते हैं कि वर्ष 1979 में जब वह अपने गांव गाडखर्क (उफरैंखाल) लौटे तो दूधातोली वन क्षेत्र में भी पेड़ों का कटान हो रहा था। इसे देखते हुए शुरू हुई पेड़ों को बचाने की मुहिम। 1987 में पड़े भयावह सूखे का व्यापक असर इस क्षेत्र पर भी पड़ा। फिर शुरू की गई बारिश की बूंदों को सहेज पेड़ बचाने की मुहिम। आंदोलन को नाम दिया गया ‘पाणी राखो’।
महिला मंगल दलों समेत ग्रामीणों की मदद से उफरैंखाल से लगी एकदम सूखी गाडखर्क की पहाड़ी को इसके लिए चुना गया। 1990 में महिला मंगल दलों समेत ग्रामीणों की मदद से 40 हेक्टेयर में फैली इस पहाड़ी पर छोटे-छोटे तालाब खोदने का कार्य शुरू किया। इन्हें नाम दिया गया जलतलैंया। इसके साथ ही जल संरक्षण में सहायक बांज, बुरांस, पंय्या, अखरोट जैसे पेड़ों के पौधे लगाए गए।

फिर तो यह सिलसिला लगातार चलता रहा। 10 साल की कोशिशें रंग लाई और 1999 में गाडखर्क की पहाड़ी न सिर्फ हरी-भरी हो गई, बल्कि बरसाती नाले में भी वर्षभर पानी रहने लगा। जल आंदोलन के रूप में भारती की यह पहल क्षेत्र के दर्जनों गांवों के जंगलों को नवजीवन दे रही है। 2016 में जब राज्यभर में जंगल भीषण आग की गिरफ्त में थे, तब यहां जंगल सुरक्षित रहे।उत्तराखंड के पौड़ी जिले में ‘पाणी राखो’ आंदोलन के सूत्रधार सच्चिदानंद भारती की अभिनव पहल सूखी गाडखर्क की पहाड़ी न सिर्फ हरी-भरी हुई, बल्कि बरसाती नाला भी सदानीरा बनापहाड़ी पर 4000 से अधिक जलतलैंया खोदी गईं। दो लाख पौधे लगाए गए। यह पहल यहां के सौ से ज्यादा गांवों तक पहुंची। उन क्षेत्रों में भी हजारों जलतलैंया बनाई जा चुकी हैं

उत्तराखण्ड बनाम स्वीटजरलैंड - डॉ राजेंद्र डोभाल महानिदेशक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् उत्तराखडं।


हमें याद है कि जून, 2013 में केदारनाथ या कहें तमाम उत्तराखण्ड में दैवीय आपदा आयी थी। उसी दौरान मुझे श्री मोहन मूर्ति जो कि यूरोप में CII के निदेशक थे एवं कोलान, जर्मनी में रहते हैं का एक लेख The Hindu Business line में पढ़ने को मिला जिसमें उन्होने लिखा है कि उत्तराखण्ड, स्वीटजरलैंड नहीं ! दोनो (उत्तराखण्ड एवं स्वीटजरलैंड) की मात्र Topography ही समान नहीं है बल्कि दोनों का आकार करीब-करीब बराबर ही है।

उत्तराखण्ड की जनसंख्या 01 करोड़ से थोड़ा ऊपर है एवं स्वीटजरलैंड की 01 करोड़ के आस-पास है। स्वीटजरलैंड का जनसंख्या घनत्व 190 मानव per sq. Km है जबकि उत्तराखण्ड का 189 मानव per sq. Km है। दोनों जगह प्राकृतिक आपदायें भी आती हैं। यूरोप में 1970 से लेकर 1995 के बीच करीब 150 बड़ी बाढ़े आयी थी लेकिन उससे कोई बड़ी हानि नहीं हुई। कारण यह कि वो अपनी नदियों को Integrated River Basin Management (IRBM) जिसका मुख्य आधार नदी के लिये अधिक जगह (More room for rivers) एवं बाढ़ क्षेत्र में कोई निर्माण कार्य न हो, जिससे नदी का धारा प्रवाह कम हो जाता है। स्वीटजरलैंड अपने यहां बाढ़ की रोकथाम के लिये प्रतिवर्ष 2.5 billion Swiss francs खर्च करता है।
उनके अध्ययन के अनुसार यह भी बात सामने आयी है कि स्वीटजरलैंड का रेल नेटवर्क काफी बड़ा है जो करीब 5063 किलोमीटर है और हर साल 350 मिलियन यात्रियों को सेवा देता है जबकि उत्तराखण्ड में मात्र 345 किलोमीटर रेल नेटवर्क है। स्वीटजरलैंड में कुल बिजली के उत्पादन का 56 प्रतिशत जल विद्युत् एवं 39 प्रतिशत न्यूक्लियर पावर है जो लगभग कार्बन-ऑक्साइड फ्री नेटवर्क है।
होटल उद्योग की बात की जाय तो वर्ष 2011 में स्वीटजरलैंड में 4967 पंजीकृत होटल थे जो लगभग 39 मिलियन रात्रि निवास 01 करोड़ लोगों को सेवायें दे रही है जबकि उत्तराखण्ड में लगभग 02 करोड़ यात्रि आते हैं और यहां करीब 22 पंजीकृत होटल है। बाकी सब अवर्गीकृत श्रेणी जैसे – धर्मशाला, आश्रय, छोटे अतिथि गृह आते हैं।

अगर हवाई सेवाओं की बात करें तो उत्तराखण्ड में 02 मुख्य हवाई अड्डा जौलीग्रांट एवं पंतनगर में हैं जबकि स्वीटजरलैंड में 25 Heliports, 110 transitory helipads, 8 बड़े अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे हैं जहाँ कोई भी आधुनिक जेट उतर सकता है एवं 56 छोटे हवाई अड्डे भी हैं। स्वीटजरलैंड का सार्वजनिक परिवहन दुनिया में सबसे अधिक घनत्व वाला है जिसका आकार 22000 किलोमीटर है एवं वहां लगभग 800 बस मार्ग हैं जो कि स्विस पोस्ट द्वारा संचालित किया जाता है। इसके अलावा 600 funiculars, cable cards, rack railways and chairlifts हैं जो सेकेण्ड की accuracy से चलते हैं।
लेखक ने Jungfrau (स्वीटजरलैंड का सबसे सुन्दर पर्यटक स्थल) की केदारनाथ से तुलना की है जिसमें कहा गया है कि स्वीटजरलैंड में 4000 मीटर से ऊपर ऊँचाई वाले लगभग 24 ग्लेशियर हैं, 3500 मीटर से ऊपर (केदारनाथ के बराबर) लगभग 64 पहाड़ियां, 2000 मीटर से ऊपर लगभग 4000 चोटी हैं। इन सब जगह में पूरी सुरक्षा एवं आसानी से जाया जा सकता है। Jungfrau रेलवे स्टेशन 11332 फीट की ऊँचाई में है जो यूरोप का उच्चतम एवं केदारनाथ की ऊँचाई के बराबर है। यहां 1893 में बर्फीले पहाड़ के अन्दर cog wheel railway tunnel का निर्माण किया गया था जिसे बनाने में 16 साल लगे एवं 105 साल पहले यह जनता को समर्पित हुआ। वर्ष 2012 में मैं स्वीटजरलैंड गया था तो वे लोग इसके100 साल मना रहे थे।

स्वीटजरलैंड मॉर्टिज एवं बर्निना पर्वत श्रंखला है जो केदारनाथ की ऊँचाई के बराबर है। वहां केबिल कार ऑपरेशन को वर्ष 2012 में 50 साल पूरे हो गये थे जबकि केदारनाथ में 14 किलोमीटर की दूरी गौरीकुण्ड से घोड़े, खच्चर, पालकी एवं पैदल पूरी की जाती है।

यह तजुर्बा मैंने आपके समक्ष इसलिये रखा कि हम खुद को स्वीटजरलैंड से तुलना करने से पहले, वहां के बारे में पूरा जान लें।

डॉ राजेंद्र डोभाल
महानिदेशक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद्
उत्तराखडं।

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

इस मुद्दे पर जरा गहराई से गौर करें : बहस को आगे बढ़ाने की गुजारिश ,कौन-सी है कुमाऊनी की कविता-परंपरा -By Laxman Singh Bisht Batrohi


दो साल पहले उत्तराखंड के जौनसार भाबर की लोक कविता परंपरा पर फेसबुक पर युवा एक्टिविस्ट और लेखक सुभाष तराण का एक विचारोत्तेजक आलेख प्रकाशित हुआ था उसमें इस बात का दर्द साफ झलकता था कि मुख्यधारा की साहित्यिक परम्पराओं ने लोक अभिव्यक्ति के स्वर को न सिर्फ हाशिए में डाल दिया है, उसके स्थान पर समृद्ध भाषाओँ की साहित्यिक मान्यताओं को उस पर थोप भी दिया है.
शायद यह संकट हमारी नई दुनिया में सभी लोक-भाषाओँ में दिखाई दे रहा है. विस्तार में न जाकर सिर्फ कुमाऊनी के सन्दर्भ में अपनी बात कहूँगा. कुमाऊँ में लिखित साहित्य की परंपरा वैसे तो अठारहवीं सदी के आखिरी वर्षों में सामने आये कवि गुमानी से शुरू होती है मगर इसे विधिवत विस्तार दिया आजादी के बाद छठे-सातवे दशक के कवियों की कविताओं ने. इस बीच मौखिक और लिखित दोनों कविताओं के रूप में अभिव्यक्ति होती रही मगर यह बात भी साफ हो गयी कि लिखित कविता की परंपरा में लोक स्वर धीरे-धीरे गायब होता चला गया.
1973 में जब कुमाऊँ और गढ़वाल विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई, इस बात की आवश्यकता महसूस की गयी कि यहाँ की लोक भाषाओँ के साहित्य को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये.
वर्ष 1972-73 में प्रख्यात गणितज्ञ और बीआइटी के कुलपति पद्मश्री शुकदेव पांडे ने नैनीताल से एक पत्रिका 'उत्तराखंड भारती' का प्रकाशन आरम्भ किया जिसके संपादन का दायित्व मुझे सौपा गया. करीब साल भर के बाद हम लोगों ने उसमें कुमाऊनी में लिखे साहित्य को प्रकाशित किया और तीन रचनाकारों का चयन किया. ये रचनाएँ थीं : चारू चन्द्र पांडे की 'पुन्तुरियां', शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' की 'पारबती को मैतुड़ा देश' और गिरीश तिवारी 'गिर्दा' की 'रत्ते ब्याण'. तब तक भी यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि कुमाऊनी कविता में लोक कविता के दो स्वर हैं : शहरी और ग्रामीण. पांडे जी की कविताएँ पहली कोटि की और बाकी दो लोगों की कविताएँ दूसरी कोटि की हैं. पहले प्रकार की कविताओं की भाषा पर भी शहरों में बोली जाने वाली कुमाऊनी का प्रभाव साफ दिखाई देता था. आने वाले वर्षों में भी इन तीन कवियों की परंपरा साफ दिखाई देने लगी. इन तीनों कवियों में भी शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' और चारू चन्द्र पांडे की कविताएँ मुख्य रूप से चर्चा में रहीं. तमाम दूसरे कवियों के साथ जो कविता-संग्रह प्रकाशित हुए उनमें सर्वाधिक चर्चा इन्हीं दो कवियों के संग्रहों की रही.
अस्सी के दशक में जब एम् ए (हिंदी) के एक वैकल्पिक प्रश्नपत्र के रूप में कुमाऊनी भाषा और साहित्य का पाठ्यक्रम बनाया जा रहा था तो एक पाठ्यपुस्तक की तलाश हुई. उन दिनों मैं हिंदी विभाग का अध्यक्ष और संयोजक था और मैंने इसके लिए शेरदा 'अनपढ़' के संग्रह 'मेरि लटि पटि' को सबसे उपयुक्त पाया. यह संग्रह कुमाऊनी कविता का एकदम नया आयाम सामने रखता है. भाषा और विषयवस्तु दोनों ही रूपों में. अपने भौगोलिक परिवेश का जितना जीवंत और प्रभावशाली चित्र इस संग्रह की कविताओं में देखने को मिलता है, वह उस वक्त ही नहीं, आज तक भी दुर्लभ है. मनुष्य की नियति और नश्वरता के साथ-साथ मानवीय संभावनाओं को लेकर जो चित्र इन कविताओं में उकेरे गए हैं, वे इन कविताओं को विश्व-कविता के समकक्ष ला खड़ा करते हैं. इस बीच शेरदा की कविताओं को लेकर अनेक लेख लिखे गए, उनका व्यापक विवेचन हुआ, दर्जनों लघु शोध और पीएच. डी. के लिए प्रबंध लिखे गए. 'अनपढ़' कवि स्नातकोत्तर कक्षाओं में पढाया जाने लगा. और देखते-देखते कुमाऊनी कविता का प्रतिनिधि स्वर बन गया.
मगर देखते-देखते कवि शेरदा में एक अजीब फर्क महसूस होने लगा. मानवीय नियति की कविताओं को शेरदा हास्य-कविताओं की तरह पढ़ने लगे. पाठक और श्रोता तो कविताओं में चित्रित विडम्बनाओं और व्यंग्य को सुनकर हँसता था, शेरदा उनकी हंसी के साथ खुद भी ठहाके लगाने लगे. श्रोता उनकी 'हास्य' कविताओं की लगातार फरमाइश करने लगे, कवि और श्रोताओं की हंसी के बीच देखते-देखते शेरदा एकाएक 'हास्य कवि' बन गए और इस तरह एक गंभीर कवि के रूप में वो हाशिए में चले गए. दुर्भाग्य से यह एक तरह से कुमाऊनी लोक-काव्य-परंपरा की भी असामयिक मृत्यु साबित हुई.
इसी बीच उभरे कुमाऊनी कवि के रूप में गिरीश तिवारी 'गिर्दा'. कुमाऊनी के क्रन्तिकारी कवि. भाषा और काव्य-विषय को देखते हुए गिर्दा हिंदी-उर्दू के कुछ लोकप्रिय कवियों से प्रभावित थे, कुमाऊँ हिंदी क्षेत्र का ही एक हिस्सा है, इसलिए उनकी चर्चा हिंदी के चर्चित कवियों के साथ होने लगी. वे कुमाऊनी के प्रतिनिधि कवि बन गए हालाँकि उनकी कविताओं में कुमाऊँ का लोक-समाज सिरे से गायब था. वह एक तरह से कुमाऊनी के जरिये चित्रित किया गया हिंदी समाज था.
अगर आप कुमाऊनी की काव्य-यात्रा का अवलोकन करें तो एक दशक पहले तक भी यह साफ दिखाई देता था कि हर नया कवि भाषा और संवेदना दोनों स्तरों पर शेरदा को नक़ल करता हुआ साफ दिखाई देता था जब कि आज यह स्थिति गिर्दा के प्रति दिखाई देती है. वास्तविकता यह है कि गिर्दा कभी शेरदा की जगह नहीं ले सकते. वो दो अलग-अलग धाराएँ हैं, एक कुमाऊँ की लोक कविता का विस्तार है जब कि दूसरा जनपक्षीय कविता का विस्तार.
कुमाऊनी कविता आज जो अपने परिवेश की आशा-आकांक्षाओं से कटी हुई दिखाई दे रही है, शायद उसका कारण भी यही है.
लोक भाषा की अभिव्यक्ति लोक समाज के कारण है, इसी कारण उसकी जीवन्तता भी. लोक अपने स्वभाव से ही क्रन्तिकारी होता है, उस पर क्रांति आरोपित करने की कोशिश की जाएगी तो उसका लोक मुरझा जायेगा. शेरदा और गिर्दा दोनों की जगह अलग-अलग है, एक की जगह लोक में है तो दूसरे की मुख्यधारा के समाज और साहित्य में. दोनों अलग-अलग नहीं हैं मगर दोनों की जगहें अलग हैं.

Laxman Singh Bisht Batrohi 

शनिवार, 5 अगस्त 2017

क्या उत्तराखंड की भाषाएँ लुप्त हो जाएँगी


क्या उत्तराखंड की भाषाएँ लुप्त हो जाएँगी , या आज की टेक्निक भाषाओ को नए आयाम पर ले जाएगी, भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण द्वारा प्रकशित किताब बहुत कुछ कहती है, यहाँ तक अंग्रजी भाषा की स्थिति भी कोई खास अच्छी नहीं है विश्व अंग्रेजी भाषा के एक तिहाई ही शब्दों का प्रयोग हो रहा है , जो अंग्रेजी के लिए भी

खतरे की घंटी है, वही पूरे विश्व में भोजपुरी एक ऐसी भाषा है जो बड़ी तेजी से बढ़ रही है, भारत के समुद्र तट पर जहाँ पहले एक सौ अस्सी भाषाएँ बोली जाती थी अब केवल दो या तीन ही भाषाएँ वजूद में है , एक भाषा का समाप्त होना मतलब एक संस्कृति का समाप्त होना,पलायन के कारण ज्यादातर भाषाएँ समाप्ति की कगार पर खड़ी है,

शनिवार, 29 जुलाई 2017

उत्तराखंड के राज्य वृक्ष का ये फूल आपको कई बीमारियों से राहत दिला सकता है।


आजकल हर कोई अलग-अलग प्रकार के रोगो से ग्रस्त है। यदि आप एनीमिया के रोगी है, और अत्यधिक टॉनिक और दवाइयां खाने के बावजूद भी आपको इस बिमारी से राहत नहीं मिल रहा तो आज हम आपको बताने जा रहे है एक लाल फूल के बारे में। ये लाल फूल उत्तराखंड का प्रसिद्ध फूल है। इसका नाम बुरांश है। 

उत्तराखंड के राज्य वृक्ष का ये फूल आपको कई बीमारियों से राहत दिला सकता है। बुरांश नाम के इस फूल में विटामिन ए, बी-1, बी-2, सी, ई और के मौजूद होने की वजह से ये व्यक्ति का वजन नहीं बढने देता साथ ही कोलेस्ट्रॉल को भी कंट्रोल रखता है।
विटामिन बी कॉम्पलैक्स व खांसी, बुखार जैसी बीमारियों में भी बुरांश का जूस दवा का काम करता है। बुरांश का सेवन करने से हृदय रोग नियंत्रण, खून बढ़ने के साथ शारीरिक विकास होता है।
दिल से जुड़ी समस्या इस लिंक पर देखिये गढ़वाली सुपर हिट फिल्म भाग-जोग
बुरांश का जूस हृदय रोग से पीड़ित लोगों के लिए बहुत लाभदायक है। इस फूल का जूस दिल से जुड़े सभी विकारों को दूर करने में मदद करता है। इस फूल में ​Quercetin और Rutin नामक पिंगमेंट पाए जाने के कारण बुरांश अचानक से होने वाले हार्ट अटैक के इस लिंक पर देखिये फ्युलोडिया ओर्जिनल गीत खतरे को भी कम कर देता है।


हड्डियों में दर्द
बढती उम्र के साथ जोड़ो में दर्द की समस्या भी होने लगती है हड्डियों में होने वाले दर्द के लिए भी बुरांश का रस बहुत लाभदायक है।
त्वचा रोगों से बचाता है इस लिंक पर देखिये नरेंद्र सिंह नेगी जी नया गीत जो जल्द आपके बीच आने वाला है
बुरांश के फूल का शर्बत पीने से रक्त कोशिकाओं के बढ़ने के साथ-साथ ये जूस दिमाग को भी ठंडक देता है। इतना ही नहीं ये जूस एक अच्छा एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण त्वचा रोगों से भी बचाता है। 
पोषक तत्वों की पूर्ति  
इस फूल का सेवन करने से शरीर में लौह तत्त्वों की कमी दूर होती है। साथ ही शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता

शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

तिमला Elephant Fig




वैसे तो उत्तराखण्ड में बहुत सारे बहुमूल्य जंगली फल बहुतायत मात्रा में पाये जाते हैं जिनको स्थानीय लोग, पर्यटक तथा चारावाह बडे चाव से खाते हैं, जो पोष्टिक एवं औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। इनमें से एक फल तिमला है जिसको हिन्दी में अंजीर तथा अंग्रेजी में Elephant Fig के नाम से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम फाईकस आरीकुलेटा है तथा मोरेसी कुल का पौधा है। उत्तराखण्ड में तिमला समुद्रतल से 800-2000 मीटर ऊंचाई तक पाया जाता है। वास्तविक रूप में तिमले का फल, फल नहीं बल्कि एक इन्वरटेड फूल है जिसमें ब्लॉज्म दिख नहीं पाता है। इस लिंक पर देखिये गढ़वाली फिल्म भाग-जोग पार्ट 1
उत्तराखण्ड में तिमले का न तो उत्पादन किया जाता है और न ही खेती की जाती है। यह एग्रो फोरेस्ट्री के अन्तर्गत अथवा स्वतः ही खेतो की मेड पर उग जाता है जिसको बड़े चाव से खाया जाता है। इसकी पत्तियां बड़े आकर की होने के कारण पशुचारे के लिये बहुतायत मात्रा में प्रयुक्त किया जाता है।
तिमला न केवल पोष्टिक एवं औषधीय महत्व रखता है अपितु पर्वतीय क्षेत्रों की पारिस्थितिकीय में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाता है। कई सारी पक्षियां तिमले के फल का आहार लेती हैं तथा इसी के तहत बीज को एक जगह से दूसरी जगह फैलाने में सहायक होती हैं एवं कई सारे Wasp प्रजातियां तिमले के परागण में सहायक होती हैं।


सम्पूर्ण विश्व में फाईकस जीनस के अन्तर्गत लगभग 800 प्रजातियां पायी जाती हैं। यह भारत, चीन, नेपाल, म्यांमार, भूटान, दक्षिणी अमेरिका, वियतनाम, इजिप्ट, ब्राजील, अल्जीरिया, टर्की तथा ईरान में पाया जाता है। जीवाश्म विज्ञान के एक अध्ययन के अनुसार यह माना जाता है कि फाईकस करीका अनाजों की खोज से लगभग 11000 वर्ष पूर्व माना जाता है। इस लिंक पर देखिये गढ़वाली फिल्म भाग-जोग पार्ट 2
पारम्परिक रूप से तिमले में कई शारीरिक विकारों को निवारण करने के लिये प्रयोग किया जाता है जैसे अतिसार, घाव भरने, हैजा तथा पीलिया जैसी गंभीर बीमारियों के रोकथाम हेतु। कई अध्ययनों के अनुसार तिमला का फल खाने से कई सारी बीमारियों के निवारण के साथ-साथ आवश्यक पोषकतत्व की भी पूर्ति भी हो जाती है। International Journal of Pharmaceutical Science Review Research के अनुसार तिमला व्यवसायिक रूप से उत्पादित सेब तथा आम से भी बेहतर गुणवत्तायुक्त होता है। वजन बढ़ाने के साथ-साथ इसमें पोटेशियम की बेहतर मात्रा होने के कारण सोडियम के दुष्प्रभाव को कम कर रक्तचाप को भी नियंत्रित करता है। नरेंद्र सिंह नेगी जी का 2017 का पहला गीत
Wealth of India के एक अध्ययन के अनुसार तिमला में प्रोटीन 5.3 प्रतिशत, कार्बोहाईड्रेड 27.09 प्रतिशत, फाईवर 16.96 प्रतिशत, कैल्शियम 1.35, मैग्नीशियम 0.90, पोटेशियम 2.11 तथा फास्फोरस 0.28 मि0ग्रा0 प्रति 100 ग्राम तक पाये जाते हैं। इसके साथ-साथ पके हुये तिमले का फल ग्लूकोज, फ्रूकट्रोज तथा सुक्रोज का भी बेहतर स्रोत माना जाता है जिसमें वसा तथा कोलस्ट्रोल नहीं होता है। अन्य फलों की तुलना में फाइवर भी काफी अधिक मात्रा में पाया जाता है तथा ग्लूकोज तो फल के वजन के अनुपात में 50 प्रतिशत तक पाया जाता है जिसकी वजह से कैलोरी भी बेहतर मात्रा में पायी जाती है। तिमला में सभी पोषक तत्वों के साथ-साथ फिनोलिक तत्व भी मौजूद होने के कारण इसमें जीवाणुनाशक गुण भी पाया जाता है तथा एण्टीऑक्सिडेंट प्रचुर मात्रा में होने की वजह से यह शरीर में टॉक्सिक फ्री रेडिकल्स को निष्क्रिय कर देता है तथा फार्मास्यूटिकल, न्यूट्रास्यूटिकल एवं बेकरी उद्योग में कई सारे उत्पादों को बनाने में मुख्य अवयव के रूप में प्रयोग किया जाता है। पोखरा विश्वविद्यालय, नेपाल 2009 के अनुसार तिमला में एण्टीऑक्सिडेंट की मात्रा 84.088 प्रतिशत (0.1 मि0ग्रा0 प्रति मि0ली0) तक पाया जाता है।
इस लिंक पर देखिये उत्तराखंड की संस्कृति की एक अहम् झलक मौरी मेले के माध्यम से

तिमला एक मौसमी फल होने के कारण कई सारे उद्योगों में इसको सुखा कर लम्बे समय तक प्रयोग किया जाता है। वर्तमान में तिमले का उपयोग सब्जी, जैम, जैली तथा फार्मास्यूटिकल, न्यूट्रास्यूटिकल एवं बेकरी उद्योग में बहुतायत मात्रा में उपयोग किया जाता है। चीन में तिमले की ही एक प्रजाति फाईकस करीका औद्योगिक रूप से उगायी जाती है तथा इसका फल बाजार में पिह के नाम से बेचा जाता है। पारम्परिक रूप से चीन में हजारो वर्षो से तिमले का औषधीय रूप में प्रयोग किया जाता है। FAOSTAT, 2013 के अनुसार विश्व भर में 1.1 मिलियन टन तिमले का उत्पादन पाया गया जिसमें सर्वाधिक टर्की 0.3, इजिप्ट 0.15, अल्जीरिया 0.12, मोरेक्को 0.1 तथा ईरान 0.08 मिलियन टन उत्पादन पाया गया।

यदि उत्तराखण्ड में इन पोष्टिक एवं औषधीय गुणों से भरपूर under utilized जंगली फलों हेतु value addition एवं मार्केट नेटवर्क उचित प्रकार से स्थापित कर फार्मास्यूटिकल, न्यूट्रास्यूटिकल एवं बेकरी उद्योग के लिये बाजार उपलब्ध कराया जाय तो ये under utilized जंगली फल प्रदेश की आर्थिकी एवं स्वरोजगार हेतु बेहतर विकल्प बन सकते हैं।

साभार

डा0 राजेन्द्र डोभाल
महानिदेशक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद्
उत्तराखण्ड।

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रविवार, 19 फ़रवरी 2017

( हींग का बाजार मूल्य 35 हजार रुपये किलो है) हींग उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और नेपाल से सटे यूपी के पहाड़ी इलाके में भी हींग उगाना चाहते हैं।


हर सब्जी में थोड़ी सी मात्रा में पड़ कर ज्यादा असर देने वाली हींग के इस्तेमाल में भारत पहले नंबर है। दुनिया में साल भर में पैदा की जाने वाली हींग का 40 प्रतिशत इस्तेमाल भारत में होता है। मसालों से लेकर दवाइयों में हींग का इस्तेमाल किया जाता है। आप को जान कर हैरानी होगी कि हमारी रसोई की पहचान बन गई हींग का उत्पादन भारत में नहीं होता है। Shagun uniyal - Video Dailymotion:
हींग के आयात पर हर साल करोड़ों रुपए की विदेशी करंसी बर्बाद होती है। अभी तक न ही किसी सरकार ने और न ही किसी कृषि विश्वविद्यालय ने हींग के उत्पादन की शुरुआत करने का सोचा। इस हालत से उबरने और भारत के किसानों को आय का नया विकल्प देने के लिए इंडियन कॉफी बोर्ड के सदस्य डॉ. विक्रम शर्मा ने अपनी ओर से पहल की है। डॉ. शर्मा को इसके लिए न तो सरकार की ओर से कोई मदद मिल रही है और न ही किसी निजी संगठन की ओर से। वह अपने दम पर इस मुहिम में जुटे हैं।
विक्रम ने इस काम को अंजाम देने के लिए हाल में ईरान से हींग के बीज मंगाए हैं। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर के पास पहाड़ी इलाके में हींग की खेती की शुरुआत की जाएगी। इसके साथ ही वह राज्य के सोलन, लाहौल-स्फीति, सिरमौर, कुल्लू, मंडी और चंबा में भी हींग की खेती कराना चाहते हैं। डॉ. शर्मा बताते हैं कि वह उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और नेपाल से सटे यूपी के पहाड़ी इलाके में भी हींग उगाना चाहते हैं।Shagun uniyal - Video Dailymotion:
उनका कहना है कि इस समय शुद्ध हींग का बाजार मूल्य 35 हजार रुपये किलो है। डॉ. शर्मा के मुताबिक, अगर भारत के किसान इसकी खेती करने लगें तो उनका कायाकल्प हो सकता है, क्योंकि देश में हींग की मांग बहुत ज्यादा है और उत्पादन जीरो। देश में जहां आयुर्वेद और अन्य भारतीय चिकित्सा पद्धति की दवाएं बनाने में हींग का काफी इस्तेमाल होता है। 2012 में जम्मू और कश्मीर के डॉ. गुलजार ने अपने राज्य में हींग की खेती की कोशिश की थी, लेकिन वह प्रयास कामयाब नहीं हो पाया।
डॉ. शर्मा कहते हैं कि हींग का पौधा जीरो से 35 डिग्री सेल्सियस का तापमान सहन कर सकता है। इस लिहाज से देश के पहाड़ी राज्यों के कई इलाके हींग की खेती के लिए मुफीद हैं। इन राज्यों में किसान अब भी परंपरागत खेती कर रहे हैं और इसे जंगली और आवारा पशु भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। डॉ. शर्मा के मुताबिक, हींग को जंगली और आवारा पशु नुकसान नहीं पहुंचाते। इससे किसानों को उनकी मेहनत का पूरा मू्ल्य मिल सकेगा। हींग की खेती आसान नहीं है, क्योंकि इसका बीज हासिल करना बहुत मुश्किल काम है। दुनिया में इसकी खेती मुख्य रूप से अफगानिस्तान, ईरान, इराक, तुर्कमेनिस्तान और बलूचिस्तान में होती है। वहां हींग का बीज किसी विदेशी को बेचने पर मौत की सजा तक सुनाई जा सकती है। डॉ. शर्मा कहते हैं कि उन्होंने रिसर्च के लिए बड़ी मुश्किल से इसका बीज ईरान से मंगाया है। इसे ही वह अलग-अलग जगहों पर उगाएंगे।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

भारत मे मडुवें की मुख्य रुप से 2 प्रजातियां पायी जाती है जिसे Eleusine indica जंगली तथा Eleusine coracana प्रमुख रुप से उगाई जाती है,

अनाजों में राजा माना जाने वाला मंडुवा आज से ही नहीं ऋषि मुनियों के काल से ही अपने महत्वपूर्ण गुणों के लिए जाना जाता है। भारत वर्ष में मंडुवे का इतिहास 3000 ई0पूर्व से है। पाश्चात्य की भेंट चढनें वाले इस अनाज को सिर्फ अनाज ही नही अनाज औषधि भी कहा जा सकता है।
इन्ही अनाज औषधीय गुणों के कारणः वापस आधुनिक युग में इसे पुनः राष्ट्रीय एंव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थान मिलने लगा है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय journals तथा मैग्जीन्स इसे आज पावर हाउस नाम से भी वैज्ञानिक तथा शोध जगत में स्थान दे रहे है। इसका वैज्ञानिक नाम इल्यूसीन कोराकाना जो कि पोएसी कुल का पौधा है। इसे देश दुनिया में विभिन्न नामों से जाना जाता है। जैसे कि अंग्रजी में प्रसिद्व नाम फिंगर मिलेट, कोदा, मंडुवा, रागी, मारवा, मंडल नाचनी, मांडिया, नागली आदि।
भारत मे मडुवें की मुख्य रुप से 2 प्रजातियां पायी जाती है जिसे Eleusine indica जंगली तथा Eleusine coracana प्रमुख रुप से उगाई जाती है, जो कि सामान्यतः 2,300 मीटर (समुद्र तल से) की ऊंचाई तक उगाया जाता है। मंडवें की खेती बहुत ही आसानी से कम लागत, बिना किसी भारीभरकम तकनीकी के ही सामान्य जलवायु तथा मिटटी में आसानी से उग जाती है।
मडुवा C4 कैटेगरी का पौधा होने के कारण इसमें बहुत ही आसानी से प्रकाश संश्लेषण हो जाता है तथा दिनरात प्रकाष संश्लेषण कर सकता है। जिसके कारण इसमे चार कार्बन कमपाउड बनने की वजह से ही मंडुवे का पौधा किसी भी विषम परिस्थिति में उत्पादन देने की क्षमता रखता है और ईसी गुण के कारण इसे Climate Smart Crop का भी नाम भी दिया गया है।
कई वैज्ञानिक अध्ययनो के अनुसार यह माना गया है की मडुवा में गहरी जडों की वजह से सुखा सहने करने की क्षमता तथा विपरीत वातावरण जहां वर्षा 300mm से भी कम पाई जाती है। वस्तुतः सभी Millets में Seed coat, embryo तथा Endosperm आटे के मुख्य अवयव होते है। जहां तक मडुवा का वैज्ञानिक विश्लेषण है कि मडुवे के Multilayered seed coat (5 layers) पाया जाता है जो इसे अन्य Millet से Dietary Fiber की तुलना में सर्वश्रेश्ठ बनाता है। FAO के 1995 के अध्ययन के अनुसार मंडुवे में Starch Granules का आकार भी बडा (3से 21µm) पाया जाता है जो इसे Enzymatic digestion के लिए बेहतर बनाता है।
यद्यपि मंडुवे की उत्पति इथूपिया हॉलैंड से माना जाता है लेकिन भारत विश्व का सबसे ज्यादा मडुवा उत्पादक देश है, जो विश्व मे 40 प्रतिशत का योगदान रखता है तथा विश्व का 25प्रतिशत सर्वाधिक क्षेत्रफल भारत में पाया जाता है। भारत के अलावा मंडवे की खेती प्रतिशतमे अफ्रीका से जापान और ऑस्ट्रेलिया तक की जाती है। दुनिया में लगभग 2.5 मिलियन टन मंडुवे का उत्पादन किया जाता है। भारत में मुख्य फसलों मे शामिल मंडुवे की खेती लगभग 2.0 मिलियन हेक्टेयर पर की जाती है जिसमे औसतन 2.15 मिलियन टन मंडुवे का उत्पादन होता है जो कि दुनिया के कुल उत्पादन का लगभग 40 से 50 प्रतिशत है।
पोषक तत्वों से भरपूर मंडुवे मे औसतन 329 किलो0 कैलोरी, 7.3 ग्राम प्रोटीन, 1.3 ग्राम फैट, 72.0 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 3.6 ग्राम फाइबर, 104 मि0ग्राम आयोडीन, 42 माइक्रो ग्राम कुल कैरोटीन पाया जाता है। इसके अलावा यह प्राकृतिक मिनरल का भी अच्छा स्रोत है।
इसमें कैल्शियम 344Mg तथा फासफोरस 283 Mg प्रति 100 ग्राम में पाया जाता है। मंडंवे में Ca की मात्रा चावल और मक्की की अपेक्षा 40 गुना तथा गेहु के अपेक्षा 10 गुना ज्यादा है। जिसकी वजह से यह हडिडयों को मजबूत करने में उपयोगी है। प्रोटीन , एमिनो एसिड, कार्बोहाइड्रेट तथा फीनोलिक्स की अच्छी मात्रा होने के कारण इसका उपयोग वजन करने से पाचन शक्ति बढाने में तथा एंटी एजिंग में भी किया जाता है। मंडुवे का कम ग्लाइसिमिक इंडेक्स तथा ग्लूटोन के कारण टाइप-2 डायविटीज में भी अच्छा उपयोग माना जाता है जिससे कि यह रक्त में शुगर की मात्रा नही बढने देता है।
अत्यधिक न्यूट्रेटिव गुण होने के कारण मंडवे की डिंमाड विश्वस्तर पर लगातार बढती जा रही है जैसे कि आज यू0एस0ए0, कनाडा, यू0के०, नॉर्वे, ऑस्ट्रेलिया, ओमान] कुवैत तथा जापान में इसकी बहुत डिमांड है। भारत के कुल निर्यात वर्ष 2004-2005 के आकडों के अनुसार 58 प्रतिशत उत्पादन सिर्फ कर्नाटक में होता है। कर्नाटक मे लगभग 1,733 हजार टन जबकि उत्तराखण्ड में 190 हजार टन उत्पादन हुआ था जबकि 2008-2009 में भारत के कुल 1477 किलोग्राम हैक्टेयर औसत उत्पादन रहा। अनाज के साथ-साथ मडवे को पशुओ के चारे के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता हैं जो कि लगभग 3 से 9 टन/हैक्टेयर की दर से मिल जाता है।  इस लिंक पर देखिये । एक ऐसा गीत जिस सुनकर आपको अपने खोये हुए लोग की याद आ जाएगी।
वर्ष 2004 में मंडुवे के बिस्किट बनाने तथा विधि को पेटेंट कराया गया था तथा 2011 में मंडुवे के रेडीमेड फूड प्रोडक्टस बनाने कि लिए पेटेन्ट किया गया था। दुनिया भर में मंडुवे का उपयोग मुख्य रूप से न्यूट्रेटिव डाइट प्रोडक्ट्स के लिए किया जाता है। एशिया तथा अफ़्रीकी देशो में मंडुवे को मुख्य भोजन के रूप में खूब इस्तेमाल किया जाता है जबकि अन्य विकिसत देशो में भी इसकी मुख्य न्यूट्रेटिभ गुणों के कारण अच्छी डिमांड है और खूब सारे फूड प्रोडक्टस जैसें कि न्यूडलस, बिस्किट्स, ब्रेड, पास्ता आदि मे मुख्य अवयव के रूप मे उपयोग किया जाता है। जापान द्वारा उत्तराखण्ड से अच्छी मात्रा में मंडवे का आयात किया जाता है।
इण्डिया मार्ट में मडुवा 30 से 40 रू0 प्रति कि0ग्राम की दर से बिक रहा है। 26 अगस्त 2013 के द टाइम्स ऑफ इण्डिया के अनुसार इण्डिया की सबसे सस्ती फसल (मडुवा) इसके न्यूट्रिशनल गुणों के कारण अमेरिका में सबसे महंगी है। मंडुवा अमेरिका मे भारत से 500 गुना मंहगा बिकता है। यू0एस0ए0 मे इसकी कीमत लगभग 10US डॉलर प्रति किलोग्राम है जो कि यहां 630 रू0 के बराबर है। जैविक मडुवे का आटा बाजार में 150 किलोग्राम तक बेचा जाता है। भारत से कई देशो -अमेरीका, कनाडा , नार्वे, ऑस्ट्रेलिया, कुवैत, ओमान को मंडुवा निर्यात किया गया। केन्या में भी बाजरा तथा मक्का की अपेक्षा मंडुवे की कीमत लगभग दुगुनी है जबकि यूगाण्डा में कुल फसल उत्पादित क्षेत्रफल के आधें में केवल मंडुवे का ही उत्पादन किया जाता है। जबकि भारत में इसका महत्व निर्यात की बढती मांग को देखते हुए विगत 50 वर्षो से 50 प्रतिशत उत्पादन मे बढोतरी हुयी है जबकि नेपाल में मंडुवा उत्पादित क्षेत्रफल 8 प्रतिषत प्रतिशत की दर से बढ रहा है।  इस लिंक पर देखिये। जगा रे उत्तराखंडवास्यूं जगा रे जाग्रति गीत क्या हलात हो गयी है रमणीय प्रदेश की जरुर सुने।
चूँकि उत्तराखण्ड प्रदेश का अधिकतम खेती योग्य भूमी असिंचित है तथा मडुवा असिंचित देशो मे उगाये जाने के लिये एक उपयुक्त फसल है जिसका राष्ट्रीय एवम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न पोष्टिक उत्पाद बनाने मे प्रयोग किया जाता है। मंडुवा प्रदेश की आर्थिकी का बेहतर स्रोत बन सकता है

डॉ राजेंद्र डोभाल
महानिदेशक
विज्ञान एवम प्रौद्योगिकी परिषद्
उत्तराखंड।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

क्या आप इस बात से सहमत है कि आज के उत्तराखंड के पर्वतीय जिलो को हिमाचल के साथ मिलाकर एक बड़ा पर्वतीय राज्य बनाया जाये।



उत्तराखंड की बदकिस्मती थी की 20001 में राज्य तो मिल गया पर हिमाचल की तरह डॉ यशवंत परमार जैसा महान तपस्वी राजनेता और दूरदृष्टि मुख्यमंत्री नही मिला।
हिमाचल को पूर्ण राज्य बनाने की कशमकश के बीच डॉ परमार ने दिल्ली और लखनऊ में इस बात की लोबिंग की थी कि आज के उत्तराखंड के पर्वतीय जिलो को हिमाचल के साथ मिलाकर एक बड़ा पर्वतीय राज्य बनाया जाये। लेकिन कांग्रेस के तत्कालीन ताकतवार नेताओं के आगे उनकी कुछ नहीं चली।  काश तब ऐसा हो पाता तो उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में भी सुख समृद्धी की रौनक मिलती

उमाकांत लखेड़ा- नवोदय टाइम्स से


गुरुवार, 24 नवंबर 2016

आज की महेमान पोस्ट में पढ़िए आंग्वाल के माध्यम से



नैनीताल के रामगढ़ में बन सकती है उत्तराखंड की फिल्म सिटी,बॉलीवुड में भी दिखेगा देवभूमि का सौंदर्य देहरादून । उत्तराखंड फिल्म जगत के लिए एक बड़ी खबर है। अब वो दिन दूर नहीं जब उत्तराखंड में बॉलीवुड के बड़े निर्देशक अपनी फिल्मों के प्रोजेक्ट को लेकर शिरकत करते नजर आएंगे। असल में उत्तराखंड फिल्म विकास बोर्ड ने नैनीताल के रामगढ़ में एक बड़ी फिल्म सिटी बनाने का निर्णय लिया है। इस संबंध में जल्द ही मुख्यमंत्री हरीश रावत के सामने इस प्रस्ताव को रखा जाएगा। बोर्ड ने उम्मीद जताई है कि राज्य में रोजगार के बड़े मौके लेकर आने वाली इस फिल्म सिटी के लिए सीएम अपनी सहमति देंगे। रामगढ़ ब्लॉक के गागर में जगह चुनी गई फिल्म बोर्ड से जुड़े अधिकारियों की मानें तो उनके इस प्रस्ताव से एक्टिंग, फिल्म निर्माण व तकनीक से जुड़ने वाले सैकड़ों युवाओं के लिए रोजगार की अपार संभावनाएं बनेंगी। फिल्म सिटी के लिए उन्होंने रामगढ़ ब्लॉग के गागर में उद्यान विभाग की लंबे समय से खाली पड़ी 6000 नाली जमीन पड़ी है। हालांकि बोर्ड ने इसे चुना है लेकिन अगर शासन स्तर से मंजूरी मिली तो उद्यान विभाग से इसे हस्तांतिरित करवाना होगा। बता दें कि कुछ समय पहले सीएम ने बोर्ड के उपाध्यक्ष और बॉलीवुड के चरित्र अभिनेता हेमंत पांडे को फिल्म सिटी के लिए जगह चुनने की जिम्मेदारी सौंपी थी। रामगढ़ के सौंदर्य के जादू से बचना मुश्किल

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

उत्तराखंड राज्य सरकार आपकी समस्याओं के निवारण हेतु इस पोर्टल पर आपका स्वागत करती है, आप अपनी समस्यों को घर बैठे- बैठे अपनी राज्य सरकार तक पहुँचा सकते है,

आपकी शिकायतों/समस्याओं/आग्रहों के त्वरित निस्तारण हेतु राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे विभिन्न प्रयासों में से यह एक महत्वपूर्ण एवं गम्भीर प्रयास है। यह प्रयास आपके लिए उपयोगी होगा ऐसा हमारा विश्वास है। आप ऐसी समस्याओं / शिकायतों को इस पोर्टल पर दर्ज कर सकते हैं, जो उत्तराखण्ड राज्य की सीमा अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत हों। शिकायत / समस्याओं को आप जिलाधिकारी अथवा विभागाध्यक्ष अथवा सचिव / प्रमुख सचिव स्तर पर दर्ज कर सकते हैं, जिस पर निर्धारित अवधि में कार्यवाही कर कृत कार्यवाही की सूचना आपको इस पोर्टल के माध्यम से ही प्राप्त होगी।
http://samadhan.uk.gov.in/





बुधवार, 20 जुलाई 2016

ममता सिंह का लेखः हिमालय का बिगड़ता मिजाज, Most Popular Hindi Blog Uttarakhand



जनसत्ता नई दिल्ली | July 20, 2016


हिमालय की अनदेखी शुरू से ही हो रही है। बार-बार केंद्र पर निर्भर हिमालयी राज्यों का तंत्र हिमालय की गंभीरता और हिमालय से चल सकने वाली स्थायी जीवन शैली और जीविका को भी भुलाते जा रहे हैं। आयातित परियोजनाओं ने हिमालय में अतिक्रमण, प्रदूषण और आपदा की स्थिति पैदा कर दी है जिसके फलस्वरूप हिमालय की अनदेखी शुरू से ही हो रही है। बार-बार केंद्र पर निर्भर हिमालयी राज्यों का तंत्र हिमालय की गंभीरता और हिमालय से चल सकने वाली स्थायी जीवन शैली और जीविका को भी भुलाते जा रहे हैं। आयातित परियोजनाओं ने हिमालय में अतिक्रमण, प्रदूषण और आपदा की स्थिति पैदा कर दी है जिसके फलस्वरूप हिमालय टूट रहा है। हिमालय न केवल भारत, बल्कि दक्षिण एशिया के सभी देशों के लिए जल स्रोत है। दरअसल, हिमालय से भारत सहित उन सभी देशों की जलवायु तय होती है जो हिमालय को स्पर्श करते हैं। अगर जलवायु प्रभावित हुई तो इसका सीधा असर कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। लिहाजा, हिमालय में बसे सभी देशों के लिए एक नीति तो बननी ही चाहिए, जो सभी देशों को मान्य हो। इस दिशा में भारत की ओर से पहल की जानी चाहिए। हालांकि भारत में काफी लंबे अरसे से हिमालयन नीति और अलग मंत्रालय की मांग चल रही है, पर अब तक इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं दिखी है।
अगर हिमालय की पीड़ा समझने की कोशिश नहीं की गई तो इसका खमियाजा सभी को भुगतना पड़ेगा। ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा बांध बनाने की चर्चा लंबे समय से चल रही है। इसके अलावा हिमालय के ठीक नीचे एक सुरंग बनाने की भी योजना चीन की है। करीब तेरह अरब डॉलर की लागत से यह सुरंग चीन के तिब्बत को सीधे काठमांडो से जोड़ने की योजना है। भारी खर्च और जोखिम होने की वजह से चीन सरकार अभी इस पर मंथन कर रही है। असल में हिमालय आक्सीजन का भंडार है, जो जलवायु को नियंत्रित करने के अलावा यहां से निकलने वाले गदेरों, नदियों और ग्लेशियरों को भी जीवित रखता है। हर साल पचास लाख घन मीटर पानी हिमालय की नदियों से बहता है, जो पूरे देश में पैंतालीस फीसद जलापूर्ति करता है। भारत सरकार और अन्य प्रांतों की सरकारों द्वारा हिमालय संरक्षण पर ध्यान नहीं देने से हिमालय प्रलय की ओर अग्रसर है। हिमालय की पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर इंडस और ब्रह्मपुत्र नदियों का विस्तार है। करीब ढाई हजार किलोमीटर तक पहाड़ी रेंज, जो कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम से पूर्व तक भारत के प्रहरी के रूप में कार्य करता है। हिमालय को बचाने की बात तो सभी करते हैं, लेकिन सब कुछ कागजों पर अंकित होकर रह गया है।

सोमवार, 18 जुलाई 2016

ममता की छांव में लहलहा रही हरियाली Most Popular Hindi Blog Uttarakhand

ममता की छांव में लहलहा रही हरियाली

चमोली से जिला मुख्यालय गोपेश्वर स्थानांतरित होने के बाद काट दिया गया था गोपेश्वर गांव का सारा जंगल

1972 में पार्वती देवी, श्यामा देवी व सुदामा देवी के प्रयासों से अस्तित्व में आया था बंज्याणी का जंगल


हरीश बिष्ट, गोपेश्वर,
धरा को हरा-भरा रखने के लिए हर साल भारी मात्र पौधे रोपे जाते हैं और फिर लोग आदतानुसार उनकी देखरेख करना भूल जाते हैं। मगर हिमालय के आंचल में बसे गोपेश्वर गांव की महिलाओं ने गांव के निकट बंज्याणी में पौधे रोपने के बाद उन्हें अपनी ममता की छांव भी प्रदान की। और..फिर सख्त होते हुए पेड़ काटने वालों पर जुर्माना लगाने का प्राविधान भी कर दिया। तब से अब तक 44 बरस हो गए हैं और फैलता ही जा रहा है मातृशक्ति का लगाया यह बांज का जंगल। जो उत्तराखंड ही नहीं अन्य प्रदेशों के लिए भी अनुकरणीय उदाहरण है।1जिस जगह आज गोपेश्वर नगर है, वहां कभी बांज-बुरांश समेत अन्य प्रजातियों का घना जंगल हुआ था। गांव के लोग इस जंगल का उपयोग चारापत्ती, जलौनी व इमारती लकड़ियों के लिए किया करते थे। 1971-72 में जब जिले का मुख्यालय चमोली कस्बे से गोपेश्वर स्थानांतरित हुआ, तब सड़क व भवनों के निर्माण के लिए पूरा का पूरा जंगल साफ कर दिया गया। लेकिन, मातृशक्ति को मालूम था कि जंगल तो जीवन का पर्याय है, इसलिए उसने नए सिरे से जंगल लगाने का संकल्प लिया। 1972 में गोपेश्वर गांव की महिलाओं पार्वती देवी, श्यामा देवी व सुदामा देवी ने फिर से गोपेश्वर के निकट जंगल बनाने की ठानी। 

इन महिलाओं ने गांव में बैठक कर इस कार्य में अन्य महिलाओं को भी साथ लिया। गांव के पदम सिंह ने पौड़ी से लाए गए बांज के बीजों से नई पौध तैयार की और फिर इन पौधों को गोपेश्वर गांव के निकट की बंजर भूमि पर रोपा गया। इसके साथ ही पौधों की देखरेख की शपथ भी महिलाओं ने उठाई।1धीरे-धीरे बांज के ये पौधे पेड़ के रूप में तब्दील होने लगे और बसता चला गया बांज का घना जंगल। मातृशक्ति को इतने पर ही संतोष नहीं हुआ, सो बैठक बुलाकर निर्णय लिया कि चारापत्ती व जलौनी लकड़ी समेत अन्य किसी भी उपयोग में इस जंगल को नहीं लाया जाएगा। यह भी तय हुआ कि बांज के जंगल में कोई पेड़ों को नुकसान पहुंचाएगा तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा। नतीजा, बीते छह दशक से यह जंगल लगातार समृद्ध होता जा रहा है।1गांव के वन पंचायत सरपंच सुनील कुमार भट्ट बताते हैं, बंज्याणी के जंगल का संरक्षण सारे गांव वाले करते हैं। इस जंगल के कारण ही वैतरणी नदी का स्नोत वर्षभर जीवित रहता है। गांव के ही धन सिंह नेगी का कहना है कि बांज के जंगल के इर्द-गिर्द हमेशा ठंडा व स्वच्छ पानी बहता रहता है। जंगल के निकट वर्षो पहले जो भूस्खलन हो रहा था, अब वह भी थम गया है।गोपेश्वर गांव के पास बांज का जंगल।
 जागरण

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

विजय ने लौटायी प्रकृति की मुस्कान विजय जड़धारी पर्यावरणविद् vijay jaddhari

विजय ने लौटायी प्रकृति की मुस्कान

संवाद सहयोगी, चम्बा : पर्यावरण संरक्षण की दावे करने वाले तमाम हैं पर उन्हें धरातल पर उतारने का हौसला रखने वाले कम ही लोग देखने को मिलते हैं। पर्यावरणविद् विजय जड़धारी भी ऐसी ही शख्सियत हैं जिन्होंने अपने प्रयासों से न केवल नंगे होते पहाड़ों को हराभरा बनाया बल्कि तमाम ग्रामीणों को इस दिशा में जागरूक भी किया। ग्रामीणों ने उनके प्रयासों से सीख ली और आज वे भी जंगल का संरक्षण करने में जुटे हैं। 1यहां बात हो रही है जनपद के चम्बा प्रखण्ड के सबसे बड़े गांव जड़धार के जंगलों की, जहां की हरियाली हर किसी को भाती है, पर पहले ऐसा नहीं था। यह संभव हुआ पर्यावरणविद् व गांव निवासी विजय जड़धारी के अथक प्रयासों से।
जड़धार गांव
 उन्होंने वृक्षविहीन पहाड़ी पर हरियाली लौटाने की जो मुहिम शुरू की थी वह ग्रामीणों के सहयोग से परवान चढ़ी और धीरे-धीरे वहां हरा भरा जंगल तैयार हो गया। सन् सत्तर के दशक में विजय जड़धारी ने चिपको आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। आंदोलन की सफलता के बाद जब वे गांव लौटे तो देखा कि अनियोजित दोहन के कारण गांव का नजदीकी जंगल कम होता जा रहा है और पहाड़ नंगे हो रहे हैं। इस पर उन्होंने चिंतन किया कि चिपको आंदोलन चलाकर वनों के व्यापारिक कटान पर तो रोक लगा दी लेकिन अपने गांव का नजदीकी जंगल खत्म हो रहा है और उसे अगर नहीं बचा सके तो चिपको आंदोलन का भी कोई महत्व नहीं रह जाएगा। बस फिर क्या था। सन् 1989-90 में उन्होंने गांव में वन सुरक्षा समिति का गठन कराया। समिति ने गांव की खाली भूमि पर ग्रामीणों के सहयोग से दस हजार से अधिक बांज, काफल, पयां, सिंस्यारू आदि चारापत्ती वाले पौधों का रोपण करवाया। जो कुदरती जंगल बचा था उसके संरक्षण के लिए चौकीदार नियुक्त किए और उनका मानदेय देने के लिए गांव के हर परिवार से आर्थिक सहयोग लिया गया। समिति ने तय किया कि जंगल से कोई भी कच्ची लकड़ी नहीं काटेगा न ही कोई अपने पशु जंगल में चुगाने ले जाएगा। केवल गिरी पड़ी लकड़ी ही जंगल से ली जायेगी। घास का कटान होगा, लेकिन पेड़-पौधों को क्षति नही पहुंचाई जाएगी। लोगों ने इसका पालन भी किया और देखते ही देखते एक दशक में ही गांव की नजदीकी पहाड़ियां हरी-भरी हो गई। तब से गांव में यही व्यवस्था चली आ रही है। आज करीब दस वर्ग किमी क्षेत्रफल में बांज-बुरांश, काफल आदि का जंगल लहलहा रहा है। इससे लोगों की घास लकड़ी की जरूरतें भी पूरी हो रही हैं तो पेयजल की स्रोत भी रीचार्ज हुए हैं। जंगल के संरक्षण की कमान विजय जड़धारी आज भी संभाले हुए हैं और ग्रामीणों को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित कर रहे हैं। आज करीब अट्ठाइस साल हो गये हैं इस मुहिम को शुरू हुए और ग्रामीण इसे आगे बढ़ा रहे हैं। खास बात यह है कि गर्मियों के सीजन में जब जंगल में आग लगती है तो ग्रामीण स्वयं आग बुझाने दौड़ पड़ते हैं और जान जोखिम में डालकर आग बुझाते हैं। यहां के जंगल में वन विभाग का भी हस्तक्षेप नही है। विभाग को पता है कि गांव वाले खुद जंगल का संरक्षण कर रहे हैं, इसलिए वे अनावश्यक हस्तक्षेप कभी नहीं करते।संवाद सहयोगी, चम्बा : पर्यावरण संरक्षण की दावे करने वाले तमाम हैं पर उन्हें धरातल पर उतारने का हौसला रखने वाले कम ही लोग देखने को मिलते हैं। पर्यावरणविद् विजय जड़धारी भी ऐसी ही शख्सियत हैं जिन्होंने अपने प्रयासों से न केवल नंगे होते पहाड़ों को हराभरा बनाया बल्कि तमाम ग्रामीणों को इस दिशा में जागरूक भी किया। ग्रामीणों ने उनके प्रयासों से सीख ली और आज वे भी जंगल का संरक्षण करने में जुटे हैं। 
एक मुलाकात विजय जड़धारी पर्यावरणविद्
1यहां बात हो रही है जनपद के चम्बा प्रखण्ड के सबसे बड़े गांव जड़धार के जंगलों की, जहां की हरियाली हर किसी को भाती है, पर पहले ऐसा नहीं था। यह संभव हुआ पर्यावरणविद् व गांव निवासी विजय जड़धारी के अथक प्रयासों से। उन्होंने वृक्षविहीन पहाड़ी पर हरियाली लौटाने की जो मुहिम शुरू की थी वह ग्रामीणों के सहयोग से परवान चढ़ी और धीरे-धीरे वहां हरा भरा जंगल तैयार हो गया। सन् सत्तर के दशक में विजय जड़धारी ने चिपको आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। आंदोलन की सफलता के बाद जब वे गांव लौटे तो देखा कि अनियोजित दोहन के कारण गांव का नजदीकी जंगल कम होता जा रहा है और पहाड़ नंगे हो रहे हैं। इस पर उन्होंने चिंतन किया कि चिपको आंदोलन चलाकर वनों के व्यापारिक कटान पर तो रोक लगा दी लेकिन अपने गांव का नजदीकी जंगल खत्म हो रहा है और उसे अगर नहीं बचा सके तो चिपको आंदोलन का भी कोई महत्व नहीं रह जाएगा। बस फिर क्या था। सन् 1989-90 में उन्होंने गांव में वन सुरक्षा समिति का गठन कराया। समिति ने गांव की खाली भूमि पर ग्रामीणों के सहयोग से दस हजार से अधिक बांज, काफल, पयां, सिंस्यारू आदि चारापत्ती वाले पौधों का रोपण करवाया। जो कुदरती जंगल बचा था उसके संरक्षण के लिए चौकीदार नियुक्त किए और उनका मानदेय देने के लिए गांव के हर परिवार से आर्थिक सहयोग लिया गया। समिति ने तय किया कि जंगल से कोई भी कच्ची लकड़ी नहीं काटेगा न ही कोई अपने पशु जंगल में चुगाने ले जाएगा। केवल गिरी पड़ी लकड़ी ही जंगल से ली जायेगी। घास का कटान होगा, लेकिन पेड़-पौधों को क्षति नही पहुंचाई जाएगी। लोगों ने इसका पालन भी किया और देखते ही देखते एक दशक में ही गांव की नजदीकी पहाड़ियां हरी-भरी हो गई। तब से गांव में यही व्यवस्था चली आ रही है। आज करीब दस वर्ग किमी क्षेत्रफल में बांज-बुरांश, काफल आदि का जंगल लहलहा रहा है। इससे लोगों की घास लकड़ी की जरूरतें भी पूरी हो रही हैं तो पेयजल की स्रोत भी रीचार्ज हुए हैं। जंगल के संरक्षण की कमान विजय जड़धारी आज भी संभाले हुए हैं और ग्रामीणों को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित कर रहे हैं। आज करीब अट्ठाइस साल हो गये हैं इस मुहिम को शुरू हुए और ग्रामीण इसे आगे बढ़ा रहे हैं। खास बात यह है कि गर्मियों के सीजन में जब जंगल में आग लगती है तो ग्रामीण स्वयं आग बुझाने दौड़ पड़ते हैं और जान जोखिम में डालकर आग बुझाते हैं। यहां के जंगल में वन विभाग का भी हस्तक्षेप नही है। विभाग को पता है कि गांव वाले खुद जंगल का संरक्षण कर रहे हैं, इसलिए वे अनावश्यक हस्तक्षेप कभी नहीं करते।
विजय जड़धारी1पर्यावरणविद्

 आंदोलन में भागीदारी कर पर्यावरण संरक्षण की सीख मिली। जंगल पैसों से नही समुदाय की भागीदारी से बचाए जा सकते हैं। प्रकृति अपने घाव खुद भरती है, उससे अनावश्यक छेड़छाड़ नही करनी चाहिए। हमने भी यही किया, और यह जंगल इसका परिणाम है। 1

दैनिक जागरण 16.07.2016 


गढ़वाल के राजवंश की भाषा थी गढ़वाली

 गढ़वाल के राजवंश की भाषा थी गढ़वाली        गढ़वाली भाषा का प्रारम्भ कब से हुआ इसके प्रमाण नहीं मिलते हैं। गढ़वाली का बोलचाल या मौखिक रूप तब स...