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गुरुवार, 17 अगस्त 2017

"ढोल" - सत्य घटना पर आधारित आँखों देखी By Devesh Rawat


घटना तिथि-:30/07/1983
शनिवार रात्रि 7 बजे
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यह एक सत्य घटना पर आधारित पात्रों के नाम वही है जो थे पर घटना के घटित गाँव का नाम बदला हुआ है। बाकी घटना की तिथि बार दिन समय और ग्रामीण परिवेश यथार्त तथाकथित है।

आम दिनों की तरह आज का दिन भी मेरा थकावट भरा था !! मै शिवू भाई, प्रभु काका, जमना दास, ताऊ, छैला भाभी, हरी भाई, ध्याडी करके बगल ढुङ्गदार गाँव से लौट ही रहा थे !! कि जोर-जोर की आवाजें सुनाई देने लगी। कुछ औरतों की कुछ पुरूषों की, वैसे हमारे गाँव में ये कोई नयी बात नही है!! झगड़े होते ही रहते है ! पर आज किसी औरत की आवाज में दर्द सुनाई दे रहा था। कुछ अजीब सा लगा। पर लपक के मैने भी कदम तेज कर दिए। वैसे मेरे गाँव का रास्ता पत्थरों को बिछा कर बनाया हुआ है चौड़ाई करीब तीन फिट है कुछ सीडीनुमा तो कुछ समतल है जैसे जमीन वैसा रास्ता।

रास्ते के दोनों तरफ लोगों के खेत है किसी खेत में झंगोरा है किसी में क्वाद (मंडवा) गन्दरू, कोणि, मुंगरी, मूली,राई, लगभग सब प्रकार की खेती है । उखड़ी (उपराड) की खेती है पूरी सोणी (रोपाई) की कुछ खेती है पर बहुत दूर है । लोगों की ठंगरी में कखड़ी, गुदड़ी, चचिंडा, लगे हुए थे भादौ के महीनों में अक्सर हमारे गाँव में सब्जी की बहार आ जाती थी। बाकी दिनों में सुकसा ही खाने पड़ते थे । वैसे कल तक तो झेड (लगातार बारिश) पड़ी रही थी आठ दिन तक बारिश बंद नही हुई थी। पर कल से मौसम ठीक था। हम ध्याडी वालों के लिए अच्छा मौसम था।
सब से नीचे गाँव के दो परिवार पण्डितों के थे जो कि मलाण गाँव से किसी जमाने में हमारे गाँव के पदान जी लाये थे। वही हम लोगों के पित्र बामण (पण्डित) थे। फिर कुछ खेत छोड़ने के बाद तीन खड़ीक के पेड़ है। इन पेड़ों के चक्कर में कही बार मुकदमा भी हो चुका है पर पेड़ वैसे ही है जैसे थे। मुकदमे चल ही रहे थे।
गाँव में कुल सतावन परिवार है । जिनमें से चार परिवार हरिजन (औजी) दो पण्डित एक परिवार जोगी समाज का है । बाकी पचास परिवार ठाकुर के थे। ठाकुर में कुकल्याल रावत और रिखोला नेगी थे। पर दबदबा रावतों का ही था क्यों कि वह चालीस परिवार थे इस गाँव के मूलनिवासी रावत ही थे बाकि बहार से आकर बसे थे (रावतों ने ही गांव बसाया)
पदान और सरपंच भी रावत ही थे। उनको अपने ज्यादा होने का घमंड।

मैं अपने बारे में बताऊं तो मेरा नाम चमन लाल है!! बाकी बताने की जरूरत नही कि मै किस जाति का हूँ। पीछे लाल लगने से आप समझ गए होंगे!!

हमारे गाँव में दो पंदेरा थे । एक गाँव के नीचे जो कि गर्मियों में सूख जाता था । और एक गाँव से ऊपर जो कि हर मौसम में पानी देता था। पर हम लोग एक ही पंदेरा का पानी पीते थे । जिसमें गर्मी में पानी नही आता था। तब हम गर्मीयों में पानी गदेरे से लाकर पीते थे। जहाँ पानी तो भरपूर था पर नजाने कितने गाँवों का मैला आता होगा। गर्मी में लोग क्याडा (भीमल की लकड़ी जिस की चाल से रस्सी बनती है और डंठल से आग जलाने का काम डालते है ) जिस में कीड़े पड़े हुए रहते थे और दुर्गंद भी बहुत आती थी। पर करें तो क्या करें हम औजी है छुआ छूत अपने चरम पर थी। भले आज़ादी मिल गयी थी पर अभी भी हमारे साथ वैसा ही सलूक होता था। जैसे आजादी से पहले।

हम लोगों का घर गाँव से दूर था !! पर रास्ता गाँव के बीच से होकर जाता था। कही बार हमें ठाकुर लोगों को अनचाहे बिनचाहे रास्ता देना पड़ता था । चाहे कुछ भी हो पर किसी को छू नही सकते है वरना हाल वो होगा जो मेरे पिताजी का हुआ था। मेरे बुबा (पिताजी) ने गलती से एक दिन किसी छः साल की ठाकुरों की एक लड़की को पानी पिला दिया था वो लड़की शाम को खेल के आ रही थी तो रास्ते में हमारे घर पर उस ने पानी मांग लिया बुबा जी के मना करने के बाद भी वह नहीं मानी तो हमारे चौक में पानी का गगरा (कलश) रखा हुआ था उस ने उसमें से पानी पी लिया। किसी निर्दयी ऊंची नाक वाले आदमी ने देख लिया उस दिन से हमारा हुक्का पानी बंद हो गया। और बुबा जी (पिताजी) को मार अलग पड़ी सो अलग। उसी मार से बुबा जी की जांघ की हड्डी टूट गई थी चार साल वह वैसे ही झेलते रहे आखिर बल कैंसर हो गया था उस के साथ वह पिछले ह्युन्द(सर्दी) में सारे दुःख दर्द को साथ लेकर परलोक सिधार गए।

उस दौर में वहां हॉस्पिटल की सोच भी नहीं सकते थे कि उन्हें वहां दिखाते पर मेरे मामा उन को एक बार चंडीगढ़ ले गए थे कुछ इलाज तो हुआ। इलाज के पैसे के लिए मामा जी चंडीगढ़ में किसी कोठी में काम करने लगे। तब परिवार में मै और मेरी माँ थी । पर छोड़ो पुरानी बात ये तो एक ब्यथा है सब गाँव में अधितर परिवारों की यही ब्यथा थी।
तब हमारे गाँव में स्कूल तो नही था पर बुलेखा गांव में स्कूल था । जो दर्जा पांच तक था। बाकी की पढ़ाई के लिए बमण गाँव जाना पड़ता था । और अगर किसी ने उससे आगे की पढाई करनी है तो रिखणीखाल जाना पड़ता था। जब मै तीसरी कक्षा में पढ़ता था तो दलिया खाने और मीठा भात खाने के लिए मेरी भी एक ऊँची जाती के लड़के से लड़ाई हुई थी । मैने किसी के बोतल से पानी पी लिया था वो गुरु जी का बेटा था पर अब तीस (प्यास) लग गई थी तो मै करता भी तो क्या ? दलिया खाने के लिए हरिजनों को अलग बिठाया जाता था। पानी भी हमें अपने लिए घर से लाना पड़ता था। स्कूल का पानी नहीं पी सकते थे। मैंने पानी क्या पीया था उसकी बोतल से बस उसके बाद तो हम स्कूल में कुछ साल पहले चुना (सफेदी) करने गए थे।

जैसे-जैसे मैने गाँव में प्रवेश किया लडाई की आवाजें बहुत तेज आने लगी। मै भागा-भागा गया तो सामने का नजारा देख के दंग रह गया मालगुजार बूबा जी मेरी चैता काकी के बाल खींच कर उन्हें डंडे से मार रहे थे। भरतू काका का पटोल छण भंयरा मकान था (पठाल वाला ग्राउंड फ्लोर) इस घटना के मूकदर्शक तो बहुत थे पर कोई बिरोध करने वाला नही था किसी के पास इतनी हिम्मत नही थी कि कुछ बोल दे। सब दर्शक बने हुए है।

चैता काकी के तीन बेटियां (जो उम्र में बहुत छोटी थी)।अपनी मां से लिपट हुए लिपट कर रो रही थी। किसी ने भी सुलार नही पहनी तो किसी ने झगुला नही पहना है। पर मालगुजार बूबा जी उन बच्चों को भी लात मार के इधर उधर फेंक रहे थे। काकी की गत्तीदार ख़दर की धोती के दोनों पल्ले खुल गए काकी का ब्लाउज भी फट गया था। काकी चिल्ला रही थी पर किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। मालगुजार काका का गुस्सा कहें या दादागिरी लोगों ने पहले भी देखा था पर आज किसी औरत के साथ होता इतना जघन्य अपराध सब की रूह कंपकपा रही थी।
मैने मालगुजार बूबा के आगे घुटने के बल जमीन में बैठकर हाथ जोड़े और काकी को छुड़वाने की कोशिश की। पर माल गुजार ने मुझे भी लात मार दी चल हट डुमडे की औलाद कहकर मुझे चुप रहने को कहा। मै जमीन पर गिर पड़ा। उन्होंने अभी तक काकी के बाल नही छोड़े थे। मैने दोबारा कोशिश की और फिर नाकाम रहा अपनी काकी को उनके चुंगल से छुड़ाने में। मै मिन्नत कर कह रहा था कि काकी को छोड़ दें चाहे मुझे मार लें। वैसे मै पहली बार ही गाँव में लात नही खा रहा था मुझे आदत सी हो गयी थी गाँव वालों के लात खाने की । पर आज कुछ गजब ही हो गया था। बूबा जी ने जैसे ही काकी को लात मार के कोने में फेंका काकी की धोती खुल गई और गरीबी में जहां सात बच्चों के लिए दो जून की रोटी नही जुटा पाते वहाँ पेटिकोट कहाँ से नसीब होता। पूरे बदन पर दो ही कपडे तो थे एक खुल गया दूजा फट गया। लोग हँसी उड़ा रहे है । काकी अपनी लाज बटोर रही थी। नाकाम कोशिश मैने भी की पर तब तक तो बिना बाजार भाव के इज्जत नीलाम हो चुकी थी। जैसे-तैसे हम ने स्थिति को नियंत्रण में लिया।
और मैने काकी को धोती लपेटी काकी को दूर ले जाने की कोशीश की पर बूबा जी ने मुझे भी पीछे से लात मारी और जमीदोज कर दिया फिर काकी की उलझी हुई धोती खोली ओर छिटगा के बदन से दूर चौक से नीचे मुंगरेटा (मक्के का खेत) में फेंक दी। काकी अब निर्वस्त्र बैठी थी तमाशबीनों के जैसे दिल की हो गई आज उन के लिए मदारी का खेल चल रहा था। तब तक काकी के बच्चों के रो-रो के बुरा हाल हो चुका था। बड़ा बेटा रोशन भाग के काका जी को बुलाने भागा जो कि नीचे से आते हुए दिख रहे थे। वैसे काका जी का काम बाँस की टोकरियाँ,सुप्पु (फटगेणु) बनाने का काम था। और बाकी काका जी शादी ब्याह के समय ढोल दमाऊ बजाने का काम थे।
वैसे किसी जमाने में मेरे बुबा (पापा) भी यही काम करते थे कास्तकारी और शिल्पकारी का वो मण, ठेकी, नाली,प्रर्या बनाते थे बदले में लोग हम को डड्वार (मजदूरी के बदले अनाज देना) देते थे और आज भी वही है पर कोई इज्जत दे दे तो समझौ चाँद मिल गया।..........


इतने में काका जी भी पहुंच गए थे काका जी ने फ़्तगी और कुर्ता पहना हुआ था कांधे पर पीछे फ़्तगी में लांठी टँगी थी सुलार (पजामा) का एक बाजू नीचे, एक बाजू ऊपर हो रखा है । हांपते-हांपते काका चौक में नग्न पड़ी काकी पर लिपट के अपनी फ़्तगी से काकी को ढक दिया। काकी की धोती लाये खेत से और काकी के सिर पर फेंक के मालगुजार बूबा के पांव पर अपनी टोपी रख दी । काका जी छोड़ दो ब्वारी को क्या कोई गलती हुई है तो मुझे मार लो पर उसे छोड़ दो क्या गलती हुई है उससे बोलो काका जी,,,? मेरे काका जी रो रहे थे चिल्ला रहे थे उन की उम्र भी करीब 35 साल थी पर बदहाली और दमें की बीमारी नें उन को इस कगार पर ला के खड़ा कर दिया कि वो 50 साल के लगते थे फिर अनपढ़ और बेरोजगारी ने परिवार का लाकर सीमा रेखा के पार पहुंचा दिया था।
मालगुजार बूबा ने काका जी को बोला !! तुझे मैने पहले ही बोला था कि ढोल जहां मै बोलूंगा वहीं ढोल बजेगा तो तूने मेरे दुशमन के घर में उसके बेटे की शादी में ढोल क्यों बजाया ?? तूने मेरा कहना नही माना तो अब भुगत उसकी सजा। तब पहाड़ों में औजी समाज को ढोल गाँव वाले देते है बजाने के लिए वो उससे ही वह अपनी जीविका चलाते थे। पर ढोल पर मालिकाना हक़ गाँव वालों का होता था। ढोल तांबे से बना हुआ एक बाद्य यंत्र होता है जिस पर बकरे की खाल लगाई जाती है पूजा मंत्रणा से ढोल बनता है बहुत ही खर्चीला काम है ये इस ढोल में 12 ताल होते है जो कि अलग अलग मौकों पर अलग अलग समय पर बजाए जाते है ढोल की सब से बड़ी बिद्या ढोल सागर है जिस किसी को इस बिद्या का पूर्ण ज्ञान हो गया समझो वो पूर्ण अनुरागी है। ढोल के साथ दमाऊ होता है जिस के बिना ढोल अधूरा है जैसे शक्ति के बिना शिव वैसे ही दमाऊ के बिना ढोल।

पर आज ये ढोल जान का दुश्मन बन गया था!!
इतने में मैने जैसे -तैसे काकी की धोती संभाली सभी बच्चों को चुप कराया और चुपके से काकी को घर की और जाने को कहा। पर काकी कह रही थी चमन तू अपने काका का ख्याल रख मुझे मत देख कोई बात नही मेरे को मारा पर तेरे काका जी कमजोर है उन को कल ही खून की उल्टी भी हुई थी बाबू तू काका का ख्याल कर छोड़ दे मुझे मै ठीक हूँ।
मै भी काकी की बात मान गया और भाग के फिर चौक में काका के पास गया मालगुजार बूबा जी मेरे काका को पीट रहे थे । काका सिवाय मार खाने के कुछ भी नही कर पा रहे थे। वो सिर्फ गरीबी लाचारी से बंधे हुए थे इतना मार खाने के बाद भी काका ने एक आंसू नही गिराया । मालगुजार जी ने काका को एक लात मारी और काका का कुर्ता मालगुजार जी के हाथ में और काका चौक किनारे बने दीवार पर जा गिरे और काका जी का सिर पत्थरों पर जा लगा । दीवार नई थी पत्थर नुकीले थे और काका गिरते ही बेहोश हो गए खून जैसे कि फवारा बन गया।
मेरी आँखें फटी की फटी रह गई। मेरा मुहँ खुला का खुला रह गया जीवन में दुखः बहुत देखा पर खून आज पहली बार देखा था। मार खाने का तजुर्बा बचपन्न से था पर खून नही देखा था। मौके की नजाकत को भांपते हुए तमाशबीन लोग उल्टे पाँव चलने लगे गए मालगुजार जी भी अपनी मूंछों को ताव तो दे रहे थे पर डर से पीछे हट रहे थे । अब तक मेरे काका जी खून में सन गए थे । मै उन से लिपट गया अपने गले से गमछा निकाला और काका के सिर से निकल रहे खून को दबाने लग गया। सभी लोग भाग चुके थे और मै अकेला काका को संभाल रहा था। काकी को आवाज लगाई पर घर दूर होने की वजह से किसी ने नही सुनी........

अब आगे जारी है
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लेखन-:देवेश आदमी (प्रवासी)
पट्टी पैनो रिखणीखाल
(देवभूमि उत्तराखंड)
सम्पर्क-:8090233797

बुधवार, 16 अगस्त 2017

सत्य घटना पर आधारित - सोणी ताई की प्रसव पीड़ा भाग - तीन लेखक -देवेश रावत आदमी


जैसे कि मैने कल बताया था कि हम लोग छन्नि (गौशाला) में उत्सुकता से जाते है कि सोणी ताई को दो बच्चे हुए है और हम वहां पहुंचे ही थे कि वहाँ का मंजर देख के हमारे पैरों तले जमीन खिसक गई हम सन्न रहे गए । हम सब निशब्द हो गए थे। भुत की तरह पदान दादा जी खड़े थे। कुछ औरतें रो रही थी कुछ सनसनाहट कर रही थी ताई एक रस्सी वाली खटिया पर लेटी हुई थी। उन के पांव हम को छन्नि के बाहर से दिखाई दे रहे थे, उनकी खाट के बगल में छोटी से खटिया थी जिस पर दोनों बच्चे जिन्हें खाकी रंग के कपड़े पहनाये हुए थे। नर्स उन को गर्म पानी से धो रही थी, कोई किसी से कुछ नही बोल रहा था। माहौल बडा डरावना बिचित्र हो रखा था। हम गौशाला के बाहर से अंदर झाँक रहे थे। उनके गाय बच्छी, बैल, भैंस वहीं बाहर बंधी हुई थी। दरवाजे के ही दाहिन् ओर बने जवठ में एक चिमनी जल रही थी,बांयी ओर दरवाजे के एक घुगति (खुंटी) दीवार पर थी जिस में ताई जी के कपड़े टंगे हुए थे। हम उत्सुकता से अंदर झांक कर देख रहे थे। गौशाला का दरवाजा करीब 4 फिट रहा होगा। और गौशाला के अंदर की ऊँचाई 5 फिट कोई खिड़की नही को रोशनदान नही पर आज ये परिस्थिति का मारा गौशाला हम को जीवनदायनी सी लग रही थी। हम जैसे रजवाड़ों में खड़े थे हम को गोर्वांगित होने का शुभ अवसर जो मिलने वाला था पर अभी भी जान वहीं अटकी हुई थी जहां पिछली रात 5 बजे अटकी हुई थी।
इतने में डॉ गौशाला से बाहर आया और एक कपड़े से हाथ साफ़ करते हुए बोला.....
 
इन के साथ कौन है...? हम सब ने कांपते हुए लड़खड़ाती जुबान में बोला हम है। और झबरू ताऊ जी है जो कि अंदर ही है ताई जी के पास।

वह बोलें झबरू जी अब इस हालत में नही रहे कि कुछ समझ पाए।

मरीज इस दुनियां में न ही रहा उन्होंने दूसरा बच्चा पैदा होते ही दम तोड़ दिया। हम लोग दहाड़ के रोने लगे कोई इधर गिरा कोई उधर गिरा । दादा जी भी सिर पकड़ के रो रहे थे। सब बेसुध हो गए हमारे साथ एक मात्र महिला शीशिला भाभी थी जो सोणी ताई की सहेली भी थी वो पहले से ही बेहोशी की हालत में पड़ी हुई थी।
झबरू ताऊ को खोजा तो वह ताई का सिर मलास रहे थे (सहलाना) वह अभी भी ताई जी को ढांढस बंधा रहे थे कि सब ठीक हो जाएगा तो कुछ देर हिम्मत और रख।
सत्य घटना पर आधारित सोणी ताई की प्रसव पीड़ा भाग - 1 इस लिंक पर पढ़िए
ताऊ जी जैसे अब दूसरी दुनियाँ में थे वह समझना ही नही चाहते थे कि हुआ क्या है वह बस ताई के सिर को सहला रहे थे। हम अंदर गए तो ताऊ जी मेरे से बोले क्या हुआ बेटा सब कुछ ठीक है तू रो मत तुम लोगों ने बहुत मेहनत की है । भगवान तुम सब को लम्बी उम्र देगा तुम पर मुझे गर्व है तुम को मेरी और तुम्हारी ताई दोनों की उम्र लग जाये इस दुनियां में मैने कभी किसी का बुरा नही किया हमारा भी कोई बुरा नही चाहेगा।
सब मेरे हितैषी है पर तुम्हारी ताई बस एक बार आंखे खोल ले.......
ताऊ जी ताई को सुरु नाम से बुलाते थे उन लोगों ने कसम खाई थी कि पहला बेटा हो या बेटी नाम सुरेंद्र या सुनीता रखेगे जैसे सब लोग नव जीवन की आस लगा के भविष्य के सपने देखते है। भविष्य के ताने बाने बुनते है। ख़्वाबों की दुनिया सजाते है। सुखी नदी में भी नाव उतारते है। वैसे ही उन लोगों ने भी सोचा था। पर प्रकृति को उन की नियति को शायद ये मंजूर न था। साथ यहीं तक था ताई के पास । सांसे इतनी ही थी। ताई जैसे अपनी सांसे दोनों बच्चों को देकर चली गई थी ताऊ जी को वो दर्द दे गई जिस की उन्हों ने कल्पना भी नही की थी......
ताऊ जी बोल रहे थे सुरु देख दो बच्चे हो गए हमारे हम ने मांगा एक था पर बूंगी देवी ने हम को दो दे दिये। तुम बोलती थी मुझे लड़का चाहिए और में बोलता था लड़की देख सुरु तू शर्त जीत गई मै हार गया अब तो जो मांगेगी वह खरीद के दूंगा पर तू आंखे खोल सुरु !! आंखे खोल!! देख कितने लोग आए है तुझे देखने के लिए बहुत भीड़ हुई है इक्ट्ठा सुरु देख बाबा देख।.......
पर कुछ नही हुआ ताऊ जी की आंसुओं का ताई के बे-जान शरीर पर ताऊ लगभग पागल की स्थिति में पहुंच गए थे। ताऊ के चप्पल और लांठी तो रास्ते में ही छूट गए थे टोपी भी कहीं झाड़ियों में अटक गई थी सुलार (पजामा) कमर तक गीला था नीचे से पजामा फट भी चुका था। फ़्तगी और गमछा ताई के खून से तर था ताऊ को कुछ भी होश नही था।

सोमवार, 7 अगस्त 2017

रिखणीखाल...... भाग-4 by Devesh Rawat


प्रणाम मैं देवेश आदमी ग्राम सभा कोटरी सैण पट्टी पैनो रिखणीखाल आप को फिर से रिखणीखाल की यात्रा पर ले जाता हूँ सर्वप्रथम सभी पाठकों से माफी मांगता हूं कि मेरे रिसर्च के मुताबित आप अपना मत Gk न बना देना मैने जो तथ्य पेश किए है वो सब मैने लोगों से एकत्रित किये है कुछ सरकारी कुछ गैर सरकारी आंकड़ें है इन में कुछ कमियाँ भी हो सकती है। तो चलो सफर में रिखणीखाल................
 
है इस छोटे से क्षेत्र  मे इक्यासी ग्राम प्रधान (ग्राम सभा, तेईस क्षेत्र  पंचायत सदस्य और एक ब्लॉक प्रमुख है  वर्तमान में श्रीमती लक्ष्मी देवी जी W/o सतेन्द्र सिंह जी (धेड़गाँव) से ब्लॉक प्रमुख है।

आप लोगों के सामने रिखणीखाल एक बहुत बड़ा बिषय लेकर फिर हाजिर हूँ ये एक ऐसा बिषय है जिस को लोग लगभग कन्त्युरा राज से सुलझा रहे है बात ईशा शदी से पहले की है पर उतनी दूर की बात आज के भौतिक सभ्य और चलायमान जिन्दगी जीने वालों के समझ में नही आएगी कोई 80 साल पुराना जन्तु समझ भी लेगा पर उन के पास फेशबुक या व्हाट्सएप कहाँ है माफ करना जन्तु इस लिए बोला क्यों कि नई पीढ़ी के लिए बूढ़ा आदमी जन्तु के समान है अगर उस बूढ़े की पेन्सन है तो नारंकार,धामदयौ या भैरव के समान है वरना जन्तु ही है।
मै देवेश आदमी आप को पद यात्रा करवाता हूँ रिखणीखाल पर आज का बिषय मै मनोरंजन और क्षेत्र की संस्कृति से जोड़कर लाया हूँ। इस से पहले भी मैने 3 लेख रिखणीखाल के पोस्ट किए थे पर बहुत लोगों ने उन को अपना नाम दे दिया 5 साल के गहन शोध के बाद लिखा गया है ये सब मेरे द्वारा इस वजह से अब लेखकों और पाठकों की राय से अपने नाम को मुझे बार बार आप को बताना पड रहा है।

जैसे कि पूर्व में मैने बताया था इस क्षेत्र  की समस्या  पर आज कुछ रोचक पहलू।  
 
मेले
मेले इस क्षेत्र में बहुत होते है जैसे-: बैसाख 3 गते बूंगी देवी (बूंगी देवी नैनीडांडा में है) और ढोंटयाल (गाड़ियों पुल) जेठ 2 गते छोटा ताड़केश्वर सांदड धार,जेठ 2 गते ताड़केश्वर धाम,कठुल्या,जेठ 8 गते मुछेल गाँव , जेठ 10 गते माला बास (माला बास में लगभग 10 ग्राम सभा का समसान घाट है) जेठ 11 गते मंजुली जेठ 12 गते देवू खाल,गुंडल खेत और शिमला सैण,जेठ 13 सिरौणा डगु और नोशेणा देवी,अंगणी सैण (पानीसेन) जेठ 14 गते खनेता, ढोंटयाल गाडियों पुल के पास शिरवाणा डगु, कठुल्या सारी वैसे एक बात औऱ है ढोंटयाल शिद्ध पीठ महादेव का है और 2 महीने में यहाँ 2 बार मेला लगता है बैशाख में शिव अवतारी पशुपति नाथ की और दूसरी बार रुद्रवतारी शिव की। उल्लेखनीय है कि किसी जमाने में जब गोठ होते थे तो पैनो ग्राम वाशी बैशाख 2 गते से ही गोठ लगाना सुरु करते थे और मंगसीर अमावशि यानि दीपावली के दिन अपने मवेशियों को घर लाते थे।पर अब न मवेशी है न मवशी (परिवार)। 18 गते जेठ मुँडेणा सारी 15 मई तिमल सैण महादेव, जेठ महीने का पहला सोम्बार बंजा देवी का मेला इस देवी पर तल्ला पैनो वालो की बड़ी आस्था है किसी भी शुभः कार्य में माता का आशिर्बाद लेना नही भूलते लोग। नोशेना देवी ,भोना देवी, बंजादेवी, बूंगी देवी को इस छेत्र के लोग बहिनें मानते एक बात की समानता है इन सब मंदिरों में वो ये कि इन मंदिरों के पास एक सुरंग है जो इन मंदिरों को जोड़ती है और चंडी घाट हरिद्वार निकलती है) जेठ 20 गते कार्तिकेश्वर क्त्याड नदी के किनारे जवड़ी रौला,जेठ 16 गते कालिंका देवी दियोड पुल,3 गते जेठ भोना देवी भवन यह छेत्र वैसे रिखणीखाल में नही आता पर शरहदें एक ही है। *खेती,सिंचाई और इतिहास-:* खेती के हिसाब से बात करूं तो मुझे 200 साल पीछे का इतिहास देखना पड़ा कुछ स्थानीय लोगों से बात की मैने जैसे-: श्री उम्मेद सिंह (चेरियों) श्री चन्दन सिंह रावत (कोटरी) 104 साल उम्र श्री जूठा सिंह (बडियार गाँव) श्री गबर सिंह (गाड़ियों) श्री गबर सिंह (जुई) श्री त्रिलोक सिंह (लेकुली) श्री दाता राम (बएला) श्रीमती मखुली देवी (कोटरी) और मेरे गाँव में एक दादा जी थे जिन का देहांत 11/02/2011 को हुआ था नाम था श्री नंदन सिंह रावत (ज्याठा) 89 साल की उम्र में उन्हों ने ये कहानी मुझे बताई थी और श्री ख्यात सिंह चौहान जी (अंदरसों) वालों की किताब में भी इस का कुछ कुछ उल्लेख हुआ है बाकी जानकारी बाकी इतिहास कुछ मैने रिखणीखाल के 2003 में खण्ड बिकाश अधिकारी श्री राणा जी ने प्राप्त किया।
कुमाऊ के रास्ते गढ़वाल पर अपना आधिपत्य स्थापित करने जब पृथ्वी नारायण साह आये तो उन का रात्रि विश्राम इसी क्षेत्र कुमालडी में हुआ था। 25 sep 1768 पृथ्वी नारायण साह नेपाल राजा थे। और उन्हों ने इस क्षेत्र को अपनी राजधानी बनाने की बात भी की थी पवित्रधाम ताड़केश्वर भगवान में उन की अटूट आस्था तब जगी जब उन्हें यहाँ सक्षात शेषनाग के दर्शन हुए। सन 1935,40 तक धौला उडेरी के गुफा में कुछ पांडुलिपि थे कुछ कपड़े पर और कुछ पागजों पर लिखा इतिहास था पर कालांतर में ये कहाँ गई ये भी एक रहस्य है (धौला उडेरी एक पवित्र गुफा है मुड़ियापानी के जंगलों में) कभी किसी जमाने में जंगलों में कोज लकड़ी के चिरान करने ठाट में जाते थे तब लोग इस धौला उडेरी की शरण में रहते थे ईस्ट देव जी तरह बिश्वास था लोगों को इस देव गुफा में।
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बात उस जमाने की है जब अंग्रेजी शासक और नेपाल के राजाओ के बीच में एंग्लो नेपाली युद्ध हुआ 1803 में ओर 1815 में सुगौली संधि हुई थी। और उसी दौरान 1803 की है जब गोरखा आक्रमण चरम पर था और गोरखाओं ने समूचे गढ़वाल पर आक्रमण किया था तब मात्र 39 गढ़ थे गढ़वाल में बाकी के 13 गढ़ नेपाल में थे वैसे जानकारी के लिए बता दूं कि,,कि नेपाल के 13 जिले भारत के अधीन अभी भी है वो 13 जिल्ले कुमाऊ,और टिहरी जिले में है अभी बात 1814 से 16 की है अंग्रेजों के साथ सीमा संधि के हिसाब से भारत में नेपाल का कुछ हिस्सा है तब नेपाल।में शाह खानदान का राज था और टिहरी रियासतें भी शाह खानदान के अधीन थीं ।
और उसी दौरान 1803 में गोरखाओ के दूसरी बार आक्रमण ने हम लोगों को अनजाने में खेती का एक तरीका सिखा दिया । वो मौसम बरसात का था धान मंडवे की खेती थी उस वक़्त सिंचाई का कोई साधन नही था तो बिना पानी वाले अनाज बोते थे सभी और (उपराद, उखिड़ी) की खेती में मंडवा धान झंगोरा उडद गहत की खेती थी गोरखाओ ने उन मे हल चला दिया ताकि सब भूखे मर जाये लोग बिन अनाज मर जाये पर उन के जाने के कुछ वक्त बाद लोगों ने उस खेती को सँजोया तो कुछ समय पश्चात वो खेती इतनी फलदाई हुई कि लोगों ने उसी तरीके से हर साल खेती करनी सुरु कर दी।
अगर मैं अपने गाँव कोटरी की बात करूं तो एक मात्र पानी की नहर है जो छाड़ियानी गिजार और बडियार गाँव की शरहद से आता है समूचे कोटरी ग्राम सभा को पानी की पूर्ति करता है। माला बास धामधार से आने वाली नहर धामधार, सिमल खेत,ढिगी चौड, झरत,गोलीचोड,रथुवा ढाब, छार गड्डी, करतिया,नोदानु, को पानी की आपूर्ति करता है पर सिर्फ बरसात के दिनों में बाकी के दिनों में बड़ी मेहनत है पानी की पूर्ति करने यहाँ के लोग संयुंक्त में सिंचाई करते है 8km लम्बी नहर में सब ग्राम सभा के हिसाब से सिंचाई करेंगे तो सही है वरना किसी के खेत में पानी नही पहुंच पाता। खदरासी में सिंचाई के पानी की बहुत दिक्कत है जब कि ये गॉँव मंदाल नदी के सब से करीब है पर 200mtr उपर इस लिए खदरासी का पानी कालयों और लुंठिया से आता है। पातल,उपगाँव, सिलगांव,द्वारी,गवाणा, सौंफ खाल,तेला गाँव,मैला गांव,रोनेड़ी,सकनेड़ी, डबराड,भंडू खाल,हड़पाल,चेबड़,चैड, मर गॉँव, जलेबी गॉँव, डल्ला, बिष्णु गळ्या,कलोनी, के लिए फील गुड की ब्यवस्था नही है कुछ कुछ लोगों के प्रयास से बना भी है पर वो काफी नही है। या फिर उस पर पानी की पर्याप्त मात्रा नही है ये जितने भी गॉँव है पहाड़ी है। दुर्गम इलाके है इन गाँव को प्रदेश के हिस्सों से जोड़ने के लिए सड़क मार्ग अब कुछ साल पहले बना है पर बरसात के दिनों में वो भी क्षतिग्रस्त रहता है कच्चा सड़क मार्ग है और नया भी है।

क्षेत्र जयकोट,चुरानी,कलवाड़ी,चौकडी, वालों की खेती नयार नदी के किनारे से लगी है खेती उपजाऊ है नयार नदी के डेल्टा से बनी हुई जमीन है ये 1775 और 1813 के आपदा के वक्त ये डेल्टा बना था। पर आज इस जगह खेती नाम मात्र का है जय कोट तो उस क्षेत्र का भाबर (तराई छेत्र) था पर पलायन और अनदेखी बदहाली से बन्जर पड़ी है। यहाँ भी फीलगुड की कोई सुविधा नजर नही आती है किसी जमाने में 1990 से 2000 तक तो कुछ खेती अच्छी थी यहाँ पर अब हिरोली,किनगोड़ी,गाजर घास उगा है। ह्युंदी,वलसा सिरवाना, में खेती दूर है पर लोग अभी हिम्मत कर रहे है खेती करने की। पाँच गाँव एली गाँव,पिपला सारी, कंडिया, पडेर गाँव,बामसु, गुनेड़ी,किमाड,सिरस्वाडि, गोंछेणा, सीधी,हिटोली, जोशी डाँड़,बल्ली, मेंदनी,में खेती थोड़ा ठीक है पर सिंचाई का साधन नही है। जंगली जानवरों का आतंक है। खिंकर्यों,टांड़यों,चिमना, द्योखर,ढुङ्गदार,मलाण,नावे तल्ली(नाड़ गाँव) लयकुली,बमण खोल,टकोली,किलबो, सुन्दरोली, किमगांव, ढिमकी,मंजखोला,सिलबेड़ि,सुलमोडी, रेवा,खांदवारी,पटेर खिल,उनेरी,ढाबखाल, घोटला,सिनोला,सोली,पलिगांव, अंदरसों, तल्ला मल्ला खनेता,रोता, नुनेरा,बसे,मज्याडी, बुलेखा,भुजकाली,ये गाँव जितने बड़े है उतनी बिरानियाँ सड़क मार्ग न होने और पलायन की वजह से।

सन 1970 से 1980 के दशक में मध्य इस छेत्र को अभूतपूर्व, अबिष्मरणीय, अतुल्य दो सौगाते मिली वो थी सड़क और बिजली तब के ठेकेदारों में श्री मात सिंह श्री जैन लाला मंगत सिंह,श्री केदार सिंह श्री अनसूया भारद्वाज जी इस छेत्र के ठेकेदार थे दिगड्डा से रथुवाढाब गाड़ियों पुल कोटरी सैण पानी सैण होते हुए गाड़ी रिखणीखाल पनास दुनाव होते हुए बीरोंखाल जाती है। दूसरी रोड़ दुगड्डा से चुंडाई सिसलडी चखोली खाल से देवूखाल में मिलती है। छेत्र में बिजली की समस्या उतनी नही जितनी अन्य भौतिक जरूरतों की है देवूखाल में बिधुत सबस्टेशन बन जाने से जयहरीखाल से आने वाली 11000 वाल्ट की योजना से क्षेत्र को अतिरिक्त सबिधा प्राप्त हुई है। वैसे देवूखाल ताड़केश्वर तक तो प्रथम गवर्नल जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स 20 ऑक्टूबर 1773 से 1 फ़रवरी  1785 तक रहे वो भी इस क्षेत्र में आये थे।फिर 9 वें वाइसरॉय द लॉर्ड मिंटों 31 जुलाई  1807 से 4 oct 1813 तक रहे वो भी इस क्षेत्र का दौरा कर चुके थे। और अंतिम बार भारतीय संघ में गवर्नल जनरल विकांट माउंटबेटन 15 अगस्त 1947 से 21 जून 1948 तक ने भी इस क्षेत्र का दौरा किया था।
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शनिवार, 5 अगस्त 2017

रिखणीखाल...... भाग-3 by Devesh Rawat


अन्य भागों की तरह ही ये भाग भी बड़ा रोचक है परन्तु इस भाग में मै कमियां कम दिखाऊंगा उपाय ज्यादा बताऊंगा जो मै क्षेत्र के हिसाब से उचित समझता हूं। और कुछ लोगों से आप को रूबरू करवाऊंगा। लोगों की समस्या कम और उपाय ज्यादा | कही मेरे पाठक मित्र या कवि मित्र है जो बोल रहे थे कि उपाय क्या है वो बताओ समस्या तो पूरे उत्तराखंड़ में है कहीं कम तो कहीं ज्यादा पर उपाय तो बताएं कोई है क्या। पर उपाय पर बाद में जाऊंगा पहले कुछ बातें वहां के बारे में।

साहित्य-:इस क्षेत्र में साहित्य का भी कुछ खास बोलबाला नही है 1997 में राकेश चमोली जी द्वारा एक नागराजा टोली थियेटर का इस क्षेत्र में 3 महीने का भर्मण हुआ था एक चलता फिरता सिनेमा हॉल लेकर आये थे वो तो तब लोगों ने पहली बार फिल्में देखी बाकी कोई एक फ़िल्म बनी थी 12 साल पहले गढ़वाली में अंछरी जिस के संयोजक बिक्रम आठबाखल थे बस उस के बाद घन्ना भाई एम् बी बी एस बनी थी पन्नु गुसाईं और घनानंद जी द्वारा अभिनीत फिल्म थी ये। बाकी शायद मेरी नजर में तो नही है। वैसे इस क्षेत्र से कुछ गुणी
लेखक हुए है
जैसे-: श्री ख्यात सिंह जी (उनेरी) श्री चिन्मयानन्द जी (आदरसों) श्री मदन मोहन डुकलांण जी (खनेता)
भाई मलय चौहान जी (अंदरसों) श्री धर्मेंद्र सिंह नेगी (चुरानी) श्री बिक्रम आठबाखल (आठबाखल) भाई अंकित रावत (वलसा) श्री गकुल नेगी (चौकड़ी) श्री सुरेंद्र सिंह रावत (टांडियों) श्री विष्णु पाल सिंह नेगी (धामधार) देव सिंह रावत (सिलबेड़ि) राम लाल भारती (आठबाखल) श्री रामलाल जी को ढोलसागर और संगीत बाधक यंत्रों का बहुत गहरा ज्ञान है रामायण और रंचरितमासन का उन्हों ने अच्छा अध्यन किया है। और अब कुछ सालों से नोसिखिया लेखक हम है देवेश आदमी (कोटरी सैण) से। और भी कोई अन्य लेखक होगा तो मेरी वदनसीबी है कि मै उस महान फनकार को जानता नही हूँ या ये समझलो मै अपने क्षेत्र के लोगों से अनभिज्ञ हूँ। पर आज कहाँ कुछ चंद लेखकों पर मुझे गर्व है वहीं पर एक ग्लानि और अफसोस कि बात ये हुई है कि जहां पुरुष समाज में से कुछ लोग निकलें है वहीं महिलाओं ने साहित्य के क्षेत्र में सोचा तक नही। वैसे ये जितने भी लेखक है सिर्फ लेखनी पर ही आश्रित नही है जीविका के अन्य साधन भी है इन के पास।

वैसे मैने या मेरी तरह के किसी ने भी लेखनी के गुण गॉँव में नही सीखी कुछ ब्याकरण का ज्ञान स्कूल से था बाकी महानगरों में लेखकों के साथ सीखी वैसे मेरे हिसाब तो महिला समाज का साहित्यिक क्षेत्र में न आना एक मुख्य कारण ये रहा कि यहां कोई महाविद्यालय नही था, और न पुस्तकालय, तो वह माहौल नही मिल पाया उन को और जब उन की शादी हुई तो वो परिवार में फंस के रह गई। परिवार की जिम्मेदारी और लेखनी का अल्प ज्ञान बस यही वो वजह रही है। थोड़ा शर्म हया भी हम को मार जाती है 18 साल के बाद
तो जाती  समाज-:जाति की बात वैसे नही करनी चाहिए थी पर भारतीय संबिधान में भी जाति के बिना कोई लेख नही लिखा गया था इसी जाति भेद की वजह से संबिधान निर्मात्री कमेटी के 7 सदस्यों में से 6 ने किसी न किसी बहाने से अपना हाथ पीछे  खींच लिया था वो लोग कमेटी में तो थे पर सिर्फ कलम से दस्तख़त करने को बाकी सारा काम भीमराव अंबेडकर जी ने 2 साल 11 महीने 18 दिन में कर दिखाया।
यहाँ कहीं जातीयं है शिल्पकार (औजी,कोली,मिरसि, नाथ,शाह,लोहार) शिल्पकार समाज की पूरे देश की तरह इस क्षेत्र में भी अन्देखी हुई है पर ये सामाज मेरी नजरों में बड़े गुणी है अगर सच्चे मायने ज्ञान की देवी और कला की देवी के कहीं स्थापित हुए है तो शिल्पकार समाज में हुए है इन लोगों के खून में सरलता सजगता ज्ञान कला होती है। ब्राह्मण समाज में (जखमोला,देवरानी,बडोला,मैंदोला,सुन्द्रियाल,भारद्वाज,खुकसाल,चतुरबेदि, ढोंडियाल,उनियाल,जुयाल,थपल्याल) है और क्षत्रिय समाज में यहां सब से ज्यादा जातियों के लोग है पर एक बात जो इस क्षेत्र की अच्छी है वो है कि यहां वैसे भेदभाव प्रदेश के अन्य क्षेत्र की तरह है पर यहाँ ठाकुर या बड़ी जाति पैसों से होता है । वैसे मन ही मन में लोग पैसे वाले को बड़ा आदमी मानते है स्वर श्री भवानी सिंह (आठबाखल) के इस क्षेत्र के अकेले शिल्पकार समाज के प्रत्यक्षी थे जो आजीवन BSP की सीट से चुनाव लड़ते थे पर कभी जीते नही।

रंग मंच औऱ मनोरंजन-: यहाँ लोगों का समय बिताने का मुख्य साधनों में तास खेलना है *(कोटरी सैण, सोली खांद,पानी सैण, गाड़ियों पुक,नोदानु,करतिया,दियोड, धंधार,रिखणीखाल, डाबरी सैण, देवूखाल, खिम्मा
खेत,तकोलिखाल, शिद्ध खाल,किलबो खाल,जाली खान, ढाबखाल, कुलानी खाल,चखोली खाल,घ्वटुला,द्वारी,गाजा,मुछेल गाँव,तिमल सैण, बुंगलगड़ी,सौप खाल,नोदानु,झरत,खदरासी,शिद्धखाल,खालयूं डाँडा,चपडेत,मठाली, कुलानी खाल,लेयर सैण, बराई) इन जगहों पर लोग तास खेलते हुए मिल जाएंगे आप को और ये काम मर्द जात का है औरतों के मुख्य मनोरंजन है-: झुमेलों,थडिया,चोंफ्ला,बाजुबंद और युवा पीढ़ी बॉलीबॉल खेलती है या आठबाखल, कुमालडी, करतिया, जैसी जगहों में फील्ड होने के वजह से क्रिकेट भी खेलते है।
वैसे एक जमाने में इस क्षेत्र में राम लीला मंचन बहुत ज्यादा होता था पर भौतिकता ने भगवान को भी पीछे छोड़ दिया या यूं कहें पलायन की वजह से अब आस्थाओं के मंचन के लिए पात्र नही मिलते है कुछ राम लीला केंद्रों के नाम जो पूर्ण रूप से बंद हो गए (कोटरी सैण सन 2005,आठबाखल सन 2016,गाड़ियों पुलसन  1998,पानी सैण 2010,बडियार गाँव 2009,बड़खेत 2007,सुरमाड़ी 1999, बराई और चाँद पुर 2004,जामरी 2003,मठाली 1997,शिद्ध खाल 1996,जै कोट 1995, मेलधार 2000, करतिया 1999 वैसे करतिया कुमालडी में नाटक मंच होता था रामलीला नही)
पर कुछ सालों से रिखणीखाल बल्ली में रामलीला का मंच हर साल सज रहा है जो अच्छी बात है। बाकी मेरे देखने में सभी जगह मंचों का आयोजन बंद हो गया है क्यों कि एक रामलीला मंचन के लिए 165 कलाकारों की जरूरत होती है संगीतकार,डयरेक्टर और अन्य कार्यकर्ताओं की पर पलायन की आंधी में अब 165 गाँव में भी मिला के 100 लोग नही मिकते है जो है भी उन के पास जीविका से बाहर सोचने का कोई विकल्प नही है।
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सुझाव-:अगर इस छेत्र में अच्छा स्कूल कक्षा 1 से 12 वीं औऱ महाविधालय हो पुस्तकालय हो हॉस्पिटल हो मछली पालन पशुपालन खेल कूद के लिए ब्यवस्था,नदियों से सिंचाई और पीने के पानी की उचित ब्यवस्था महिला मिलन केंद्र जो स्कूल मौजूद है उन के भवन और ब्यवस्था को सुदृढ़ करना रेल मार्ग का निर्माण,बैज्ञानिक खेती करना,खेतों की चकबन्दी,बागवानी,संचार ब्यवस्था ठीक करना सड़कों की मरम्मत दुकानदारों की कमेटी बना के उन को सिखाया जाय कि सभी लोग एक तरह का सामान न बेचो इस से फायदा ये होगा कि लोगों को सभी सामान क्षेत्र में प्राप्त हो जाएगा और जो रोज कोई न कोई दुकान बंद हो जा रहा है उस की समस्या भी खत्म हो जाएगी। वरना हर दिन एक भाई बेरोजगार हुई है और हर दुकान में एक तरह का
सामान होने से दुकारों में सामान सड़ रहा है औऱ कुछ चीजें मिलती ही नही है। नाटक मंचों का आयोजन कवि सम्मेलनों का आयोजन ताड़केश्वर मंदिर नोशेणा देवी मंदिर,ढोंटियाल,ढिमकी भैरव मंदिर,कालिंका मंदिर,बंजादेवी मन्दिर,बूंगी देवी मंदिर,की भब्यता बनाई जाए ये होना बहुत जरूरी है। पर्यटक को बढ़ावा मिलेगा औऱ स्थानीय लोगों को रोजगार क्षेत्र को पहचान और राज्य को राजस्व। इन मंदिरों को प्रिंट मीडिया,सोसल मीडिया और समाचारों में जगह मिकेगी विस्तार से तो लोगों का रुझान बढ़ेगा लोगों को छेत्र के बारे में पता लगेगा। एक बड़े शौभाग्य की बात है कि उत्तराखंड के नक़्शे में इस क्षेत्र  के 2 गाँव के नाम आप देख सकते है (बडियार गाँव और चुरानी) ये अच्छी बात है कि ब्लॉक का कोई गाँव तो नक़्शे में आया वरना हम लापता गंज में जी रहे होते।

वैसे हम को पता है ये सब सपने जैसा है पर सपने साकार उसी के होते है जो सपने देखता है। तो क्या हर्ज है कुछ कुछ सब करेंगे तो सब कुछ मिल जाएगा अपने अपने हिसाब से अपने अपने क्षेत्र में मेहनत करो दिल्ली दूर है पर है धरती पर।
क्षेत्र में जो भी सरकारी विभाग है उन से शहलीनता से जवाब तलब करो उन से पूछों की वजह क्या हुई कि काम नही हो रहा है हॉस्पिटल में दवाई क्यों नही है। खाद बीज विभाग में बीज क्यों नही है नल में पानी क्यों नही है खम्बे पर बिजली क्यों नही है जागरूक होना ही होगा वरना कुछ नही होगा कोई भी सरकार आएगी वो निक्कमी ही होगी पर हम उन से RTI के तहत बात कर सकते है जवाब पूछ सकते है सवालों की झड़ी लगा दो कोई भी अधिकारी अगर अपने काम पर नही है सीधा डी एम, एस डी एम, पटवारी, थानेदार, को सम्पर्क करो। अगर वो भी गायब है तो सी एम, पी एम, को बात करो कोई एक तो सुनेगा पर पहले खुद अच्छा करने की सोचो खुद गाँव में गंदगी नजे फैलाओ शराब का सेवन न करो जिस भाई बहिन को जो ज्ञान है वो उस ज्ञान को नई पीढ़ी को दो जिस के पास पैसा है वो क्षेत्र में कुछ रोजगार उतपन करें खेती करो बागवानी करो पर खाली तास न खेलो जीवन को ब्यर्थ न करो। जारी है..... अगला भाग पढ़ने के लिए ब्लॉग के साथ बने रहे

देवेश आदमी (प्रवासी)
पट्टी पैनो रिखणीखाल
(देवभूमि उत्तराखंड)
फोन-:8090233797

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

रिखणीखाल-भाग-02 By Devesh Rawat

गतांग से आगे
शिक्षा-:इस  क्षेत्र  में शिक्षा एक सिरदर्द है जुई ग्राम सभा में 3 बच्चों पर 3 अध्यापक है कोटरी सैण में 95 बच्चों पर 2 अध्यापक है प्रायमरी स्कूल की बात है ये राजकीय इंडरमीडियट स्कूल बड़खेत में भवनों की मात्रा इतनी है कि पूरा एक गॉंव बस सकता है पर 6 अध्यापकों से 553 बच्चे देखे जा रहे है। देखे जाने शब्द का प्रयोग इस लिए कर रहा हूँ कि इस दसा में पढ़ाना सम्भव नही है।टांडियों, दरखसती खाल,डाबरी में भी हाल स्कूल के यही है।
कुछ हाल कमोबेश द्वारी स्कूल का भी वही है भवन नया तो बना है पर हालत बहुत खराब है भवन के और समूचे क्षेत्र  में 50% अध्यापक तो रोज कोटद्वार से छेत्र में अपडोंन करते है। राजकीय विद्यालय करतिया में शिक्षा का ये हिसाब है कि 35% बच्चे आप को मंदाल नदी में मच्छी मारते हुए देख जाएंगे। कोई सड़क सुविधा नही है फिलहाल जो सड़क भी बनी है वो बर्षात में बंद हो जाती है। प्राथमिक विद्यालय गाजा इस क्षेत्र में ऐसा विद्यालय है जहाँ भवन और अध्याक ठीक ठाक है। राजकील विद्यालय बुंगलगड़ी भी शिक्षकों का रोना रौ रहा



है यहाँ पर स्कूल के नजदीक है बाजार है जिस की वजह से शोरगुल से बच्चे अच्छे से पढ़ नही पाते है। चपडेत श्री दलीप रावत जी का गॉँव है जो बर्तमान में इस छेत्र से दूसरी बार विधायक है श्री दलीप रावत जी BjP के उम्मीदवार है औऱ उन के पिता स्वर्गीय श्री भारत सिंह रावत जी भी 4 बार इसी क्षेत्र से विधायक रहे है।
किल्बो खाल का हाल भी यही है ये स्कूल सन 2000 तक जनता स्कूल हुआ करता था तब यहाँ पर पढ़ाई बहुत ही
अच्छी थी क्षेत्र के लोगों को यहां अपने बच्चों को पढ़ाना सपना लगता था। जब कि यहां उस वक्त 12 km पैदल रास्ता तय कर के जाना होता था पर आज कारगिल शाहिद अनसूया प्रसाद जखमोला मोटर मार्ग होने के बावजूद भी यहाँ बदहाली अनदेखी का रोना है। उसी की बगल में ग्राम सभा खिकरयूं में भी हाल बहुत बुरे है। ग्राम सभा चौकड़ी चुराणी कलवाडी क्षेत्र के बड़े गॉंव में आते है यहां के लोग अमीर ज्यादा है पहले से ही इस कि वजह ये है कि यहां खेती पहले से कम रही है या फिर दूर नयार के किनारे इन लोगों की खेती है,जिस वजह से इस क्षेत्र के लोग पहले से ही दिल्ली चंडीगढ जैसे जगह पलायन हो गए है। पर जो गॉंव में है भी अन्य गाँव के मुकाबले पैसे वाले है।
ऐसी क्षेत्र में एक स्कूल है जो 18 गाँव को जोड़ता है सिद्धखाल जो क्षेत्र का अकेला ऐसा स्कूल है जिस स्कूल में आप गाड़ी सीधा ले जांयेगे वरना सब जगह ये हालत नही है सड़क की यह स्कूल कोटद्वार से बीरोंखाल जाने वाले रास्ते में पड़ता है। शिक्षा भी अच्छी है यहाँ अन्य स्कूलों के मुकाबले पर भवन अच्छे नही है लैब नही है ।एक मात्र फील्ड है जिस में बॉलीबॉल ही खेला जा सकता है बस बाकी कोई सुविधा नही है।
अब बात करता हूँ क्षेत्र के सब से पुराने स्कूल और एक मात्र महाविद्यालय रिखणीखाल की जिस में भवन की कमी अध्यापकों की कमी पूरे बिषय न होना लैब की कमी फील्ड की कमी और बिजली की किल्लत आदि बहुत सी कमियाँ है यहां पहके स्कूल में पढ़ाई अच्छी थी पर जब से महाविधालय खुला प्रायमरी स्कूल और माध्यमिक विद्यालय की हालत खराब हो गई है 500 मीटर पर है ये तीनों विद्यालय।
राजकीय उच्चतम माध्यमिक बिद्यालय खदरासी यह बिद्यालय करतिया की तरह मंदाल नदी के किनारे है सड़क की कोई सुविधा नही है झूला पुल ही इस को देश से जोड़ता है। यह बिद्यालय सन 1999 तक जनता बिद्यालय था उचिकरण के साथ साथ इस बिद्यालय का निम्नी करण भी हुआ है।करीब 5 साल तक तो यहां साइंस का क्लास ही नही था अब है और लैब नही है प्रशिक्षण के लिए । इस रिखणीखाल क्षेत्र में आज भी ७५% छात्र नकल कर के पास होते है दावे के साथ बोल रहा हूँ।


सन 2003 में केंद्र की मनमोहन सरकार ने एक योजना चलाई थी जिस का नाम है आंगनबाड़ी जिस के तहत ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में बालविकास , महिला उन्मूलन, जच्चा-बच्चा देख-रेख, कुपोषण, प्रथम शिक्षा और अन्य कही बिभागों से मिला कर योजना चलाई जो शुरुआत में ही धरातल पर दम तोड़ गई। जिस के लिए न नियम कड़े बने न कानून न भवन न यह भी हमारे क्षेत्र में है पर पूरे देश की तरह इस विभाग द्वारा दिये गए सत्तू बिस्कुट,नमक,दलिया आंगनवाड़ी बहिनजी के गाय,भैस खा रही है।
कुछ हाल कुलाणी खाल के भी ऐसे ही है पृथक राज्य के बाद इस बिद्यालय का भी जीर्णोद्धार और उचिकरण हुआ और शिक्षा का अभी तक कोई आता पता नही है। सिर्फ भवन का उच्चीकरण हुआ है शिक्षा का तो मजा ही बना है। खुबाणी, लयकुली,बडेर गाँव, छाड़ियाणी, धुरा,बराई, खनेता,सोली,टांड़यों,सिलगोंव,गाडियों, उनेरी,ढाबखाल, सींदी, सिमल गॉंव, पानीसेण, सुन्दरोली, बूंग, सिनाला, इन गॉंवों के स्कूल चौपट है किसी भी प्रकार की शिक्षा के लिए रात नही खुली है।

स्वास्थ्य  सेवा-:एक मात्र चिकित्सा केंद्र रिखणीखाल में है जो मुख्य बाजार से 3km दूर है देबुखाल बैंड पर जिस में 108 सेवा बहुत अच्छी है पर यहाँ भी भवन बने हुए 25 साल हो गए आज तक कोई सुविधा नही है फस्टेडबॉक्स के लिए भी सामान मरीज से मँगवाया जाता है वो किसी केमिस्ट्री की दुकान में जायेगा ढूंडने फिर वार्डबॉय या कामचलाऊ नर्स उस की मरहमपट्टी करेंगे हर साल यहां डॉ बदलते है डॉ कम कोमपोटेर ज्यादा बदलते है ये लोग स्थानीय है तो ठीक है वरना सभी कोटद्वार से आते जाते है रोज,3 घण्टा आना3 जाना तब कैसे स्वास्थ्य सेवा होगी उन को ही कुछ दिन में हड्डी दर्द की गैस की दिक्कत हो जाएगी।

तिमलसेंण डिस्पेंसरी में 2 स्टाफ है पर दवाई नही है। रथुवाधाब डिस्पेंसरी में भी दवाई नही 1 स्टाफ खदरासी में भी फोड़े की दवाई मिलेगी बस 1स्टाफ किमाड में भी वही हाल गुनेड़ी,बएला,बूंगा में भी हालत खराब है स्वास्थ्य।सेवा है लिए सब से नजदीक 85km कोटद्वार है और वहाँ भी नए भवन की चकाचोंद में दवाइयों रास्ता भूल गए जितने भी डॉ है वो निजी क्लीनिक खोले है और 200₹ का फीस लेते है फिर उस से नजदीक है जौलीग्रांट, दून या इंद्रेश Aiims ऋषिकेश जहां डॉ की सीट पर कुत्ते बैठे होते है हॉस्पिटल के अंदर गाय घुस जाती है।
75% गॉँव में सड़क न होने की वजह से 108 एम्बुलेंस नही जा पाती है इस वजह से मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते है। जो मरीज रिखणीखाल हॉस्पिटल पहुंच भी जाते है वहां सुविधा न होने की वजह से मरीज की हालत खराब हो जाती है।


सुरक्षा -: क्षेत्र में सुरक्षा के इतंजाम ये है कि कोई थाना ही नही है पहले रोज 3 पुलिश वाले लैंसडौन से आते थे और साम को चले जाते थे पर अब 4 पुलिश वाले 4 होमगार्ड की तैनाती तो है पर उन को कोई सुविधा नही मिलती वो अनाथों की तरह जीवन गुजारते है इस में वो क्षेत्र के लोगों की सुरक्षा क्या करेंगे।
गुलदारों का रिख का आतंक है इस क्षेत्र में जिमकॉर्बेट पार्क ढिकाला से लगे होने के कारण यहां बन्यजीवों को आप मार नही सकते हो और बन्यजीव आप को मार दे कोई खोज खबर नही। कोई फोरेस्टगार्ड नही है क्षेत्र में अगर है भी तो वो मेदावन, मुंडिया पाणी, कांडा रथुवाढाब से ऊपर नही आते। खुद वो लोग जंगलों से तस्करी करते है चरस गांजा लकड़ी,मच्छी बन्यजीवों की।
बिगत 6 साक पहले ग्राम धामदार में बाघ न 5 लोग खा दिए लोगों ने बाघ मार दिया।पर इस जुर्म में 10 लोग आज भी जेल में है। ऐसी बहुत कहानियां है ऊसा क्षेत्र की।
राजस्व का फायदा-: यह क्षेत्र राजस्व अर्जन के लिए बहुत अच्छा है *(राजस्व मतलब सरकार के आय का साधन ये सरक भाषा है)* पर यहां तो सब कुछ होते हुए भी कुछ नही है 2011 और 2013 में आये आपदा में बंजादेवी झूला पुल बह गया था आज भी वो पुल वैसा ही है नोदानु,करतिया,झरत,ढूंगीचोड,गोलीचोड, अम्डडा को जोड़ने वाला एक मात्र मंदाल नदी पर ये पुल है और करतिया स्कूल जाने वाले बच्चों को रोज कठिनाई का सामना करना पड़ता है। आम जनजीवन की गाड़ी भी नदी नालों में फंसी है।
यही हाल गाजा,मुछेल गाँव गल्ले गॉँव दबराड, सेरा गाड़ को जोड़ने वाला पुल ढोंटियाल मंदिर के पास 4 साल पहले बाह गया। आपदा में मेलधार गॉँव पूरीतरह से दब गया था मलवे में उन के पुनर्वास की बात भी अधर में लटकी है,सरकार बदली पर सूरतें हाल नही।
तिमल सैण कपुल डोबरियाल का पुल, सिवाणा डगु का पुल, ऐसे नजाने बहुत से पुल है जो आपदा की भेंट चढ़ गए और आज तक किसी ने उन की सुधि न ली। सब लोग चाटुकारिता में ब्यस्त है और क्षेत्र बदहाली का रोना रो  रही है।
कुछ गॉँव जैसे चेबड़,तेडिया,पांड,धुरा,धूताडाँड़ ,कुडू डाँड़ छमना,टांड़यों,सिल गाँव,राजबो मल्ला, कुमे खत्ता, जोशी डाँड़, ये गॉँव बहुत ही दुर्गम जगह है यहाँ सुखः सुविधा 0% है पर लोग अभी भी उम्मीद में है कि कभी तो विकाश का सूरज उगेगा।
इस क्षेत्र में जो भी सरकारी भवन टूटा या जर-जर हुआ उस का कोई मालिक नही है। ऐसा नही है कि यहां कोई नेता आता नही है डॉ हरक सिंह रावत (जब राजस्व मंत्री थे तब 3 बार आये और अभी चुनाव के बख्त 2 बार) हरीश रावत (पूर्व मुख्यमंत्री) लगभग 3 बार आये सुरेंद्र सिंह नेगी लगभग हर 2,3 साल में आते है पर आंसुओं की बारिश कर के सब निकल जाते है। कहते है 1983 में इंद्रागांधी ने इस छेत्र के लिए अलग पैकेज की घोषणा की थी और वो 1984 तक काम सुरु नही हुआ और आज भी 1984 वापस नही आया। स्वेज विभाग,स्वजल ग्राम,भूमि संरक्षण इकाई,समूह गाह,
खाद बीज विभाग,पशुपालन पालन, पशुचिकित्सा,sbi बैंक ,pnb बैंक, अलकनन्दा ग्रामीण बैंक कॉर्पोरेशन बैंक इस इलाके में है पर बैंकों में सर्वर डोन ही रहता है,या बिजली नही होती है। राजस्व कैसे प्राप्त होगा। एक सराब का ठेका है पर इस बार ठेका बंद कराओ आंधी में वो भी बंद हो गया उस ठेके में हर दारू की बोतल 500₹ की होती थी रात दिन मदिरा मिलता था। पर क्षेत्र की दारु की पूर्ती आर्मी से सेवानिबरित लोग या सेवारत लोग कर रहे है गैर तरीके से भी दारू मिलता है। कोटरी सैण गाड़ियों पुल रिखणीखाल, देबुखाल, चकोलिया खाल ढाबखाल और गॉँव में कच्ची शराब।
इस क्षेत्र में दूध उत्पादन, मछली उत्त्पादन, बकरी, भेड़ ,या मवेशियों का ब्यापार आसानी से हो सकता है पर अब पलायन की भयानक स्थिति की वजह से मजबूर लोग है गाँव में रह गए है जो खुद को मजबूरी में मजबूर बताते है। जिन के पास पैसा है वो घर छोड़ चुके है। खेलने के मैदान बन सकते है इस क्षेत्र में पर वो भी नही हो रहा है आय की हजारों स्रोत है पर सभी स्रोतों को सरकार की अनदेखी ने बंद कर दिया है।

खेल-: बॉलीबॉल इस क्षेत्र का मुख्य खेल रहा है वजह साफ है कि कोई और खेल खलने के लिए लोगों के पास जगह नही थी। बॉलीबॉल खेलने के लिए ज्यादा बड़ा फील्ड नही चाहिए और कुछ फील्ड है छेत्र में जैसे करतिया,कुमालडी (वैसे अब ये फील्ड आधा नदी में बह गया) आठबाखल में है पर बाकी जगज ऊपरी इलाकों में खेतों में खेल खेल जाते है कोई भी खेल।
एक जमाना था ज इस क्षेत्र में जाने माने बोलिबोल खिलाड़ी थे। जैसे-:बिक्रम सिंह नेगी (बड़खेत) भोपाल सिंह गुसाईं (राजबो) भारत सिंह रावत (आठबाखल) देवपाल सिंह रावत (द्वारी गाँवणा) चुर्रा भाई (धामदार) महावीर सिंह नेगी (कुमालडी) नेगी जी (सिरस्वाडी) पुष्कर सिंह (चुरानी) गुलडांग सिंह (कलवाड़ी) परवीन सिंह नेगी (सुन्दरोली) सूरज सिंह,बोली भाई,सतेंद्र सिंह विनोद सिंह(ब्राई धूरा) त्रिलोक सिंह (कांडा नाला) विक्रम सिंह रावत (कोटरी) केदार सिंह रावत (कोटरी) यशवंत सिंह (पलिगांव) दीवान सिंह (द्वारी) भारतेंदु सिंह पटवाल (कोटरी) अनिल नेगी (चपडेत) चंद्र मोहन सिंह (तिमल सैण) यशवंत सिंह (ढुङ्गधार) गम्भीर सिंह (राजबो) श्याम सिंह (राजबो) जय दीप सिंह बिष्ट (चौकड़ी) भारतीय मुक्के बाजी के कोच है उभि जयदीप सिंह बिष्ट जी। लगभग सभी लोग आर्मी में है भारतीय सेना में इन लोगों ने क्षेत्र का नाम रोशन किया है। पर कोई खेल अकैडमी नही बन पाई क्षेत्र में।


 जारी है..... अगला भाग पढ़ने के लिए ब्लॉग के साथ बने रहे

लेखक-:देवेश आदमी (प्रवासी)
पट्टी पैनो रिखणीखाल
जिल्ला पौड़ी गढ़वाल
(देवभूमि उत्तराखंड)

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

रिखणीखाल भाग - एक के बारे में रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी By Devesh Rawat


रिखणीखाल ये मेरा बिकास खण्ड है उत्तराखंड के जिला पौड़ी गढ़वाल, लैंसडाउन तहसील लैंसडाउन विधानसभा क्षेत्र में बसा हुआ है। इस के एक तरफ जयहरीखाल, दूसरी तरफ बीरोंखाल, तीसरी तरफ नैनीडांडा, चौथी तरफ सतपुली है रिखणीखाल में 572 गॉँव पड़ते है इसकी कुल आवादी सरकारी आंकड़ों में 35719 है, रिखणीखाल में पट्टी पैनो,पट्टी इडिया कोट,पट्टी बदलपुर,पट्टी बिचला बदलपुर। किसी जमाने में 52 गढ़ों के एक गढ़ गुज़डू गढ़ में यह क्षेत्र में आता था, मंदाल नदी और पूर्वी नयार नदी रिखणीखाल ब्लॉक के मुख्य नदियाँ है अन्य छोटी नदियाँ भी इस क्षेत्र में बहती है, पर नयार और मंदाल मुख्य है, इन नदियों का पानी दूर के ढोल सुवाहने होते के बराबर है क्योंकि ये नदियों का पानी सिचाई के काम में नहीं आता , फिलहाल कुछ छुट पुट जगह को छोड़ दें तो नयार का पानी रिखणीखाल में काम नही आता  वैसे नयार दो है, एक पूर्वी और दूसरी पश्चिमी, पर पश्चिमी नयार रिखणीखाल में नही आती है वैसे दोनों नयार का उद्द्गम स्रोत एक ही पहाड़ी है और दोनों नयार सतपुली बांघाट में मिलती है सतपुली में उन दोनों नदियों के संगम में वार्षिक मेला भी लगता है। नयार आगे चलकर के अलकनंदा नदी में है तथा मंदाल नदी राम गंगा में जा के मिलती है।

अब बात करते है रिखणीखाल की यहाँ के लोगों का एक जमाने में मुख्य ब्यवसाय सिर्फ खेती था | वही आर्मी में भर्ती होना नोजवानो का एकमात्र सपना। फलों की बात करें तो पैनो पट्टी में आम और गर्म प्रजाति के हर फल होते है बाकी सभी पट्टियों में अखरोट ,काफ़ल,हिसोरां,घिंगोरा, आवाला,सेब,नासपाती आदि होते है। मक्के की खेती धान गेहूं दलहनी खेती यहाँ काफी अच्छी होती है पर केवल परिवार के सालभर के गुजारे के लिए 
बात 1990 के दसक की है या उस से पहले की है पर आज नोकरीं पेशा ही यहां का मुख्य आय का श्रोत है यहाँ लोगों ने बड़ी तेजी से शहरों का रुख किया है मेरी अपनी नजर में कुछ गॉँव 90 % तो कुछ गॉँव पूर्ण रूप से खाली हो गए है।
इस लिंक पर देखिये गढ़वाली सुपर हिट फिल्म भाग-जोग
जैसे-:कांडा, चिलाऊँ,उप गॉँव, तेडिया,पांड,सिरस्वाडी, बांजी खाल,आठबाखल, राजबो तल्ला और मल्ला, नावे तल्ली,भँयासु, वलसा,ढुङ्गधार,डिंड,जुई,किम गॉँव, चेबड़, चिलावं,अन्द्रोंली,वड्डा, पातल, अंदरसों,पलि गॉँव, कुंडू डाँड़,घ्वटुला,बड़खेत तल्ला और मल्ला, जुकनियाँ,गुजरी,डबराड,कोकोटरी वल्ली और पल्ली बुंगा,पडेर गॉँव, धामधार, कुमालडी,चिमना, टांड़यों,मैला गॉँव, सौंप खाल,द्वारी,सेरा गाड़,गाड़ियों,धूता डाँड़,तिमला खोली, पैनोल गॉँव बुद्ध गॉँव,ल्विठ्या,जामरी,मुँडेणा तिमल सैण,डबुर,गाजा, सुलमेडी,सुन्दरोली, पांच गॉँव,खिंकरो, आदि कुछ गॉँव है जिन की हालत बहुत ही दयनीय है पलायन की वजह से। एड किल्क जरूर करें तभी हम आपको और जानकारी पहुंचा पाएंगे 
इस क्षेत्र से बहुत है नाकाम और खुदगर्ज नेता निकले है ये क्षेत्र लैंसडाउन विधानसभा क्षेत्र में आता है पहले यह क्षेत्र धूमाकोट विधानसभा में था। लैंसडाउन विधानसभा से सुरेंद्र सिंह नेगी जी(पूर्व पेयजल मंत्री) ने पहली बार 1992 में निर्दलीय चुनाव लड़ा था उसके वाद सतपाल महाराज जी(बर्तमान पर्यटकमंत्री) ने भी निर्दलीय चुनाव लड़ा था,
भुवनचंद्र खंडूरी (पूर्व मुख्यमंत्री और हाल के सांसद ) तेज़ पाल सिंह रावत जी और प्रथम ब्लॉक प्रमुख श्री भारत सिंह रावत जी जैसे विधायक रहे है यहाँ से बर्तमान में दलीप रावत जी यहाँ के विधायक है जो भारत सिंह रावत जी के सुपुत्र है।
पर सवाल इस बात का रहा है कि इस क्षेत्र में विकास ने नजर तक नही मारी है ब्लॉक स्तर पर एक महाविद्यालय खुला है जिस में भी ऑब्जेक्ट पूरे नही है। भावी पीढ़ी का भविष्य घर का न घाट का है। भौगोलिक परिस्थितियों के हिसाब से देखें तो बहुत ही सुगम क्षेत्र है पट्टी पैनो तो बहुत ही सुगम है। पर यहां इस क्षेत्र पर किसी की नजर तक नही गई।
पलायन इस अनदेखी का एक नतीजा है। 90% गॉँव में पीने के पानी की और मवेशियो के लिए पानी चारे की बड़ी दिक्कत है। बनों के हिसाब से देखा जाय तो यहाँ पट्टी पैनो गर्म इलाका होने के कारण साल के जंगलों से घिरा है जो कि टाइगर प्रोजेक्ट ढिकाला के अन्तर्गत आता है और बाकी की तीनों पट्टी बाँज बुरासँ चीड़ देबदार के जंगलों से घिरा है।
इस लिंक पर देखिये नरेंद्र सिंह नेगी जी नया गीत जो जल्द आपके बीच आने वाला है यहाँ से अधिकतर लोग रामनगर, काशीपुर,रुड़की,हरिद्वार, देहरादून, कालागढ़,दिल्ली जा के बस गए है। क्षेत्र में बिजली भी बरसात के दिनों में अठखेलियाँ खेलती है लगभग 25% गॉँव सड़क मार्ग से जुड़ें है। पूर्वी छाड़ियाणी में तो सड़क गए हुए 1 साल हुआ है औऱ गॉँव खाली हुए 8 महीने वही हाल धुरा,राजबो,डिंड,और जुगणिया डाँडा का भी है जहां सड़क जाने से पहले लोग चले गए है। अगर इस क्षेत्र में देखा जाय तो ताड़केश्वर महाधाम ही एक मात्र आस्था का केंद्र है। बाकी घूमने लायक हसीन वादियाँ तो है पर पर्यटक के लिए ये नाकाफी है। कोई होटल नही गेस्ट हाउस नही है। ग्राम सभा जुई में एक वृंदावन नाम ने होटल खुला है पर सब के बस की बात नही है वहां भी रुकना ठहरना। रेल मार्ग नही है जब कि सम्भव है उत्तरकाशी या बद्रीनाथ जैसी पहाड़ी भी नही है।
पर सोचें कौन इस के बारे में 9 विद्यालय 12 वीं तक है और अध्यापक यहां भी नही है इस क्षेत्र में कमाल की बात है मात्र इन शिशु मंदिर है 5 वीं कक्षा तक उस के बाद कोई नबोदित विद्यालय या गैर सरकारी कोई शिक्षण संस्थान नही है। कंप्यूटर की पढ़ाई भी नही न कोई कोचिंग इंस्टिट्यूट। स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले में यहाँ सब भगवान भरोसे है।
IPS,IFS,IS या NDA में यहाँ से बहुत लोग निकलें है पर पलायन की वजह से ये लोग अब गॉँव आते ही नही है। न किसी नेता को इस क्षेत्र की फिक्र है न क्षेत्रिय लोगों को। खेती प्रधान क्षेत्र का हाल ये है कि मात्र 5% जमीन खेती के लायक रह गई है बाकी पर झाड़ी उगी है।
इस क्षेत्र में आने की किये बीरोंखाल से दुगड्डा से नैनीडाँडा से सतपुली से आने का रास्ता है 75% सड़कें कच्ची है मात्र एक राष्ट्रीय राज मार्ग था जो दुगड्डा में राष्ट्रीय राजमार्ग 19 पर मिलना था पर नई सरकार ने अपनी दारू बेचो निति के लिए उसे से सहायक राजमार्ग कर दिया है। अब यहां के लिए सिर्फ टेक्सी,GMO की ही सुविधा है। सारा क्षेत्र सुगम है पर दुर्गमता की मार झेल रहा है। कोशिश करना आप कि इस हसीन जगह को देखने जरूर आना और कुछ नही एक और आदमी मिल जाएगा हम को साथ में आँसूं बहाने वाला।
इस लिंक पर देखिये फ्युलोडिया ओर्जिनल गीत
इस क्षेत्र की अनदेखी बहुत हुई है आज इस क्षेत्र में अस्थाई थाना है जो रिखणीखाल में है बाकी इस क्षेत्र में सुरक्षा
के भी कोई इंतजाम नही है। 85km दूर कोटद्वार और 53km दूर लैंसडाउन पड़ता है। पेट्रोल पम्प् भी 53km दूर है सूचना का कोई साधन नही है टेलिफोन टावर 28 है पर काम अपने मन मुताबित करते है,करतिया,चौडू डाँडा,राजबो,मेंदणी बयोला रिखणीखाल में लगे फ़ोन के खम्बे सिर्फ दिखावे के है लगभग सिग्नल ना के बराबर है। हॉस्पिटल की सुविधा सिर्फ रिखणीखाल में है जिस में सिर्फ बुखार सिरदर्द की दवा मिलती है और इलाज करने वाला भी वार्डबॉय है कोई स्पेसलिस्ट डॉ या नर्स नही है। 108 नंबर सेवा है पर मरीज को 108 सेवा लेकर कहाँ जाएगी ...? मरीज को घर से उठा तो देती है एम्बुलेंस पर आखिर राजकीय चिकित्सालय कोटद्वार रैफर करना पड़ता है और वहाँ के हालात और बुरे है कोटद्वार से दून या जोलीग्रांट या महंत इंद्रेश। जारी है..... अगला भाग पढ़ने के लिए ब्लॉग के साथ बने रहे


लेखक-:देवेश आदमी (प्रवासी)
पट्टी पैनो रिखणीखाल
जिल्ला पौड़ी गढ़वाल
(देवभूमि उत्तराखंड) 

गढ़वाल के राजवंश की भाषा थी गढ़वाली

 गढ़वाल के राजवंश की भाषा थी गढ़वाली        गढ़वाली भाषा का प्रारम्भ कब से हुआ इसके प्रमाण नहीं मिलते हैं। गढ़वाली का बोलचाल या मौखिक रूप तब स...