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बुधवार, 9 मई 2018

23.5 किलो की मूली पैदा करने वाले श्री विद्या दत्त का ये और कारनामा - सुधीर सुंदरियाल


बाधाएं कब बांध सकी हैं आगे बढ़ने वालों को..!
आपने कुछ समय पहले कई अख़बार और सोशल मीडिया पर एक खबर देखी होगी कि श्री विद्या दत्त नाम के एक बुजुर्ग ने एक 23.5 किलो की मूली पैदा की है। वो बुजुर्ग इस बार उससे भी बड़ी मूली पैदा कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाएंगे। कल हमैं इनकी कर्मभूमि मोती बाग ग्राम सांगुड़ा,  देखने का मौका मिला। ....जहां इन्होंने अपना कर्मक्षेत्र  चुना उस क्षेत्र मे कभी पानी की बहुत बड़ी समस्या थी। वहां पीने का पानी तक नहीं था। तब ऐसी परिस्थिति में श्री विद्या दत्त जी ने लगभग एक लाख लीटर का पानी का टैंक जमीन के अंदर बनाकर उसके ऊपर के पहाड़ के बरसाती पानी को इकठ्ठा कर उसमे डाल कर, रैन वाटर हार्वेस्टिंग का एक अनोखा उदाहरण दुनिया को दिखा दिया।

अमेज़ॉन से खरदिए मंडवे का आटा नीचे के लिंक से 
इस टैंक का नाम सुखदेई जलाशय है, जिसका निर्माण  1978 मे किया गया। जहां पीने का पानी नहीं मिलता था वहां श्री विद्या दत्त जी ने इस जलाशय से अपने खेतों में पानी की व्यवस्था कर सागसब्जी और फलों का रिकार्डतोड़ उत्पादन करने लगे । आज भी 82 वर्ष से ऊपर की उम्र मे वो साग सब्जी, फल और मौन पालन मे नित नये प्रयोग करते रहते हैं। कृषि पंडित श्री विद्या दत्त जी इन प्रयोगों के अलावा लगातार भू सुधार और #चकबन्दी के लिए भी काम कर रहे हैं। ऐसे जीवट महापुरुष को मेरा शत शत नमन है।

Sudhir Sundriyal
 भलु लगद /Feel Good
बंजर खेत आबाद करो एक मुहीम

सोमवार, 7 मई 2018

बिच्छू घास से बनी चाय


खबर नॉन स्टॉप से - 
पहाड़ की एक घास जो बदन पर लग जाए तो खुजली के मारे जान निकल जाती है, लेकिन कभी आपने सोचा है कि यह घास चाय की मीठी चुस्की भी दे सकती है। ठंड में आपके बदन को गर्म रखने के लिए भी तैयार है। हालांकि बहुत ज्यादा प्रचलन न हो पाने की वजह से आज तक यह उत्पाद अपने ही घर में दम तोड़ रहे है, लेकिन अब जिला सहकारी बैंक सहकारी कौतिक-2016 के जरिये एक बाजार देने जा रहा है। जो 19 जून से गुरूड़ाबाज में शुरू होने जा रहा है। जिसका उद्घाटन मुख्यमंत्री हरीश रावत और विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल करेंगे। अब वह दिन दूर नहीं जब पहाड़ की बिच्छू घास सीमा पार भी अपनी धूम मचाएगी और पहाड़ के कास्तकार होंगे मालामाल। बिच्छू घास से बनी चाय को भारत सरकार के एनपीओपी (जैविक उत्पादन का राष्ट्रीय उत्पादन) ने प्रमाणित किया है। 
आप इस अमेजॉन इस लिंक से भी चाय और अन्य समान मंगवा सकते हो जैसे की नेट्ले लीफ है
इस ग्रीन टी को बिच्छू घास के अलावा पिरुल, बुरांश, तुलसी और चीड़ की पत्तियां से तैयार किया गया है। जो बागेश्वर स्थित हिमालयन ऑग्रेनिक औदोगिक उत्पादन सहकारी समिति में निर्मित है। खास बात यह है कि इस चाय के औषधीय लाभ भी है। बताते है कि बिच्छू घास में जोड़ों के रोग से लड़ने की असीमित क्षमता होती है। बिच्छू घास से कृषकों ने शॉल भी तैयार कर ली है। इसे भी मेले में शामिल किया जा रहा है। बताते है कि बिच्छू घास यानि नेटल ग्रास के रेशे से धागे तैयार किए है। जिससे यह शॉल तैयार की गई है। इसके अलावा मेले में मिट्टी की मूर्तियां मिलेंगी। जो खास उधमसिंहनगर जिले के कुम्हारों दारा तैयार की गई है। पत्थर की चककी, कपड़े और रुई से तैयार की गई है और एनपीओपी ने इन उत्पादों को राज्य के बाहर विदेशों तक बेचने का जिम्मा उठाया है। इस मेले के पहाड़ के कास्तकारों को बाजार दिलाया जाएगा। लोग मसाला डोसा के बारे में तो जानते है, लेकिन हमारा प्रयास है कि लोग भट्ट की चुड़कानी और झिगोरे की खीर के बारे में भी जाने। मसाला डोसा की तरह पहाड़ी व्यंजन, हस्त शिल्प को भी पहचान मिले। मेले में पहाड़ी व्यंजन के साथ पहाड़ी खेल-कूद को भी पहचान दिलाने की तैयारी है। मुख्य कार्यक्रम समन्वयक डॉ.अरविंद जोशी ने बताया कि मेले में गुल्ली डंडा, खो-खो, कबड्डी, मुर्गा झपट, बाघ बकरी सहित कई अन्य खेलों का आयोजन कराया जाएगा। जो मेले में आने वाला हर व्यक्ति खेल सकता है। मेले में कुल 40 स्टॉल लगाए जाएंगे। एक स्टाल पहाड़ के युवाओं के लिए होगा। जिसके जरिये उनकी कैरिएर काउंसलिंग की जाएगी।
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मंगलवार, 23 जनवरी 2018

सुखी संपन्न गाँव भी हो रहे है वीरान और भुतहा- देवेन्द्र शर्मा की रिपोर्ट साभार- gaonconnection.com


दूर से देखने पर यह किसी आम पहाड़ी गाँव के जैसा ही है। पहाड़ी ढलान पर बसा कियारी, हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले की रोहरु तहसील के जुब्बल-कोटखाई इलाके में स्थित एक छोटा सा गाँव है। हालांकि, यह तथ्य कि कियारी कभी एशिया का सबसे समृद्ध गाँव माना जाता था, उसे गाँवों की पारंपरिक छवि से अलग करता है।
एक समय में देश का सबसे समृद्ध गाँव कहा जाने वाला गाँव आखिर है कैसा ? यह जानने के लिए मैं गाड़ी से निकल पड़ा। कियारी शिमला से करीब 45 किलोमीटर दूर है (कुछ लोग इसे अब दूसरा सबसे अमीर गाँव कहते हैं, पहले नंबर का गाँव भी शिमला में ही है)। गाँव तक पहुंचने वाली सड़क पहाड़ों के बीच से होकर गुजरती है। जैसे ही मेरी कार गाँव के बाजार में पहुंची, मेरी पहली धारणा यह बनी कि वाकई यह अमीर गाँव है। मैंने पहाड़ों में जितने गाँव देखे हैं उनसे इस गाँव का बाजार काफी साफ था। यह बाजार एक पार्किंग में खुलता है जो अपेक्षाकृत साफ-सुथरा था।


गाँव के बुजुर्गों ने मेरा अभिवादन किया। दुआ-सलाम के बाद हम गाँव के अंदर चल पड़े। मैं हैरान था कि गाँव के मंदिर तक जाने वाले रास्ते पर टाइल्स लगी हुई थीं। निश्चित रुप से यह मेरी उम्मीदों से परे था। मुझे आशा नहीं थी कि शहरों की पागल कर देने वाली भीड़ से दूर इस गाँव का यह गलियारा इतना साफ-सुधरा होगा। मैंने एक बागान मालिक सुनील चौहान से पूछा, इस गाँव की समृद्धि का राज क्या है। मुझे उम्मीद थी कि वह बताएंगे कि कैसे गाँव में सेब की खेती से धीरे-धीरे संपन्नता आई। लेकिन उन्होंने मुझे जो बताया मुझे उस जवाब की आशा नहीं थी, सुनील ने कहा, इस गाँव के लगभग 99 पर्सेंट पुरुष सरकारी सेवाओं में हैं। मेरे पिता एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थे, मेरे दादा जी भी सरकारी सेवा में ही थे। यही स्थिति गाँव के हर व्यक्ति की है। सरकारी नौकरी की बदौलत उनकी नियमित आमदनी या कहें आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित थी।
ग्राम पंचायत के पूर्व अध्यक्ष देवेंद्र सिंह चौहान ने बात को और स्पष्ट करते हुए कहा, चूंकि गाँव वालों की आय सुरक्षित थी इसलिए उन्होंने जोखिम उठाया और उद्यमिता दिखाई। इसमें कोई शक नहीं है कि सेब की खेती करने से गाँव में अतिरिक्त पैसा आया है, लेकिन इससे पहले भी हम आलू जैसी नकदी फसल करते थे। उस समय औसतन एक शख्स के पास 20 बीघा की जोत थी, जोकि ऊपरी पहाड़ी इलाके के हिसाब से काफी अच्छी मानी जाएगी। लेकिन अब इसमें काफी कमी आई है। उस हिसाब से गाँव के अधिकतर बुजुर्ग काफी पढ़े-लिखे थे, कुछ लोग उस समय लाहौर में पढ़ भी रहे थे। अच्छी शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा के चलते उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में आसानी हुई।
उस समय हिमाचल केंद्र शासित प्रदेश होता था। 1962 के बाद ऐसे कई सरकारी सर्वे हुए जिनमें कियारी को एक प्रगतिशील गाँव के रुप में दिखाया गया। इसकी मुख्य वजह यह थी कि गाँव के लोगों की बचतें इतनी ज्यादा हो गईं कि सरकार को गाँव में 1967 में सब-पोस्ट ऑफिस खोलना पड़ा। 1981-82 में कियारी को बचत ग्राम घोषित किया गया, मतलब ऐसा गाँव जहां पोस्ट ऑफिस में बहुत अधिक बचतें हों। मैं पोस्ट ऑफिस भी गया जो बहुत साफ सुथरा और व्यवस्थित था। वहां जगत राम मिले। जगत राम पिछले 39 वर्ष से ग्राम डाक सेवक हैं। उन्होंने कहा, यह पोस्ट ऑफिस आस-पास के 29 गाँवों में अपनी सेवाएं देता है। अब बहुत चिट्ठियां नहीं आती हैं, जो आती हैं वे अधिकतर स्कूलों और बैंकों की होती हैं। गाँव में दो बैंकों की शाखाएं हैं – स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और कोऑपरेटिव बैंक। लेकिन आज भी बैंकों से ज्यादा पैसा पोस्ट ऑफिस में जमा है।
गाँव का भव्य मंदिर भी इस क्षेत्र की संपन्नता का उदाहरण है। इसका जीर्णोद्धार हो रहा है, इसका एक आलीशान हिस्सा तैयार हो चुका है। इसके अलावा गाँव में एक प्राइमरी, मिडिल और हाई स्कूल है। गाँव में सिविल अस्पताल, जानवरों का अस्पताल और टेलिफोन एक्सचेंज है। वास्तव में, गाँव में सभी तरह की जरुरी सुविधाएं पहले से ही उपलब्ध हैं। चौहान कहते हैं, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकतर बच्चे नेपाली मजदूरों के हैं। हमारे बच्चे अधिकतर शिमला में ही पढ़ते हैं।
इसके बाद गाँव के बुजुर्गों से विचार-विमर्श करने के लिए मैं गांव के प्रतिष्ठित निवासी राजेंद्र चौहान के घर पहुंचा। यहां बातचीत में एक नतीजा यह निकला कि संपन्नता के बावजूद गाँव के अधिकतर युवा गाँव से बाहर चले गए हैं। वे शहरों में रहना पसंद करते हैं। जो लोग गाँवों में रहे गए हैं उनमें से अधिकतर इन युवाओं के बुजुर्ग माता-पिता हैं। यह पूछे जाने पर कि क्यों युवा शहरी जीवन के प्रति आकर्षित हैं, राजेंद्र कहते हैं, इसकी एक वजह यह हो सकती है कि गाँवों में रहने वाले युवाओं के लिए सही रिश्ते नहीं मिलते। आप भले ही गाँव में रहकर, सेब की खेती करके एक करोड़ रुपये कमाते हों लेकिन लड़कियों को आपमें कोई रूचि नहीं होगी। वे चाहती हैं कि उनके होने वाले पति शहर में रहकर कोई नौकरी करें, भले ही उनकी तनख्वाह सेब की खेती से होने वाली कमाई का एक अंश भर हो। सवाल उठता है कि गांव में रहने वाली लड़कियां अपने होने वाली पति के बारे मेँ क्या सोचती हैं? वे भी शहरों में रहने वाले लड़कों को ही वरीयता देती हैं।

निश्चित तौर पर यह चिंताजनक बात है। अधिकांश समाजशास्त्री गांवों में अवसर की उपलब्धता न होने को शहरों की ओर होने वाले पलायन के लिए जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन मैँने कियारी में जो देखा वह एकदम अजीब था, जहां लोग समृद्ध गांवों को भी छोड़कर जा रहे हैं। असल में, यह प्रवृत्ति हिमाचल प्रदेश की पूरी सेब पट्टी में दिखाई देती है। उत्तराखंड के आर्थिक रुप से असुरक्षित सैकड़ों गांव वीरान पड़े हैं यह बात मेरी समझ में आती है। यह पलायन का सामान्य सा उदाहरण है। लेकिन हिमाचल प्रदेश के समृद्ध, संपन्न गांव भी भुतहा गांव बनते जा रहे हैं, कोई इसकी व्याख्या कैसे करेगा?

साभार - gaonconnection.coom

सोमवार, 22 जनवरी 2018

जानिए पहाड़ के युवा कपिल की कहानी, सभी उत्तराखंडियों को पढ़ना बहुत जरूरी ये नहीं पड़ा तो कुछ नहीं पड़ा - जन तक के सौजन्य से


जन तक के सौजन्य से- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान उत्तराखंड में आकर कहा था पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी कभी उसके काम नहीं आती लेकिन एक युवा ने उनकी इस बात को झुटला दिया है और आज लाखों उत्तराखंडियों के लिए प्रेरणा का कारण बना हुआ है। हम यहाँ बात कर रहे हैं जिला रुद्रप्रयाग के ग्राम सभा टेमरिया-डमार के रहने वाले कपिल शर्मा ने, जो अभी हैं मात्र 26 साल के और इस 26 साल की युवा अवस्था में ही उन्होंने ऐसे कार्य कर दिए हैं जिसके लिए आम आदमी को दूसरा जनम लेना पड़े।
पहाड़ में ये एक आम धारणा है की जहाँ 12वीं कक्षा पूरी हुई, बस उसके बाद अपना बोरिया बिस्तर बांधो और निकल जाओ रोजगार के लिए दिल्ली, मुंबई जेसे महानगरों में रोजगार की खोज के लिए, पर कपिल की सोच कुछ अलग थी वो अपने गाँव में ही रहकर कुछ ऐसा करना चाहते थे कि जिससे यहीं रोजगार हो और लोग उन्हें देखकर वापस फिर अपने पहाड़ों की ओर लोटें, राजकीय इंटर कॉलेज भीरी से 12वीं करने के बाद जब उनके सारे साथी उन्हें छोड़कर बाहर शहरों की ओर जा रहे थे तो वहीँ कपिल ने गाँव में ही रहने का निश्चय किया, और उन्होंने कृषि में व्यवसाय शुरू करने का निश्चय किया, सबसे पहले तो उन्हें अपने घर से ही कड़े विरोध का सामना करना पड़ा क्यूंकि उनके घर वाले इस काम के लिए तैयार नहीं थे, जैसे तैसे उन्होंने अपने घर वालों को इस बात के लिए राजी किया।
आज से लगभग 5 साल पहले उन्होंने अपना कृषि का काम शुरू कर दिया, और उन्हें उस समय इन सभी चीजों का कोई अनुभव भी नहीं था जिसके कारण शुरू के दो साल तो खेतों में इतना भी उत्पादन नहीं हुआ की वो उनसे नए बीज खरीद सकें, आमदनी होना तो दूर की बात है, इस दौरान उनके घरवाले, गांववाले और बाकी लोग उन्हें तरह तरह के ताने देते रहे पर कपिल ने हिम्मत नहीं हारी और वो कृषि से सम्बंधित नयी नयी जानकारियां लेकर कार्य करते रहे, और अब पिछले तीन साल से उनका व्यवसाय सरपट दौड़ता जा रहा है।
इस दौरान उन्होंने अपने पहाड़ में पैदा की जा सकने वाली और भी बहुत सारी चीजों की जानकारी एकत्रित की और कपिल शर्मा यहाँ सब्जियों के खेती के साथ साथ और भी बहुत सारे व्यवसाय शुरू कर चुके हैं| अब हर साल कपिल अपने खेतों में फूलों की खेती भी शुरू कर चुके हैं जिनकी पूरे छेत्र में बहुत मांग रहती है, यहाँ तक कि उनके द्वारा उगाये गये फूलों की डिमांड केदारनाथ मंदिर में भी रहती है और अब हर साल वो वहां भी अपने फूल पहुंचाते है। इसके अलावा कपिल ने अपने खेतों में डेरी व्यवसाय भी शुरू कर दिया है, वहां उन्होंने सबसे पहले गौशाला का निर्माण किया और अब वहां 2 देशी गाय रखी गयी हैं जो प्रतिदिन 20 लीटर से भी अधिक दूध देती हैं। इसके अलावा भी इस पहाड़ी नौजवान ने अपने फ़ार्म में मत्स्य पालन भी पिछले साल से शुरू कर दिया है अब इस काम से भी कपिल की अच्छी खासी आमदनी हो जाती है, और अब वो खुद को ऑर्गेनिक खेती की ओर भी ले जा रहे हैं। इन सब के अलावा भी कपिल अपने क्षेत्र में नवयुवकों को खेती से जुड़ने के लिए लगातार प्रशिक्षण देते आ रहे है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग अपने पहाड़ों की तरफ वापस लौटें।
अगर 3 साल पहले की बात करैं तो जहाँ कपिल सालाना 3 लाख कमा रहे थे तो पिछले 2 साल पहले उनका व्यवसाय 3 लाख से बढकर 5 लाख हो गया था और अगर बात पिछले साल की हो तो वो 7 लाख से उपर जा चुका है और उन्होंने अब इस बार 10 लाख का टारगेट अपने लिए रखा है। इसके साथ साथ पूरे उत्तराखंड के लोग भी उनके इन सारे कार्यों से काफी प्रभावित हो रहे हैं, इसी कड़ी में रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी श्री मंगेश घिल्डियाल जी भी पिछले दिनों उनके फ़ार्म में गये थे और उनके इन सभी कार्यों से काफी प्रभावित नजर आये और उन्होने कपिल शर्मा को ऐसे ही आगे बड़ने को कहा। तो पूरा उत्तराखंड सलाम करता है युवा कपिल शर्मा के इस जज्बे को और उम्मीद करता है कि आने वाले समय बाकी बाकी लोग भी इस काम से जुड़ेंगे और जिससे पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम आ सके।

शनिवार, 18 नवंबर 2017

पौड़ी- दिल्ली हाईवे की वह बरसात की रात शार्ट हिंदी फिल्म जो सत्य घटना के बहुत करीब है

प्रभाकर मीणा भास्कर' पंत द्वारा लिखी और निदेशित फिल्म "बरसात की रात" शार्ट हिंदी फिल्म जो सत्य घटना के बहुत करीब हैजिसे देखने बाद मन में दर पैदा हो जाता है,


शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

जोशीमठ विकासखंड में कीवी की पैदावार उत्साहित करने वाली है। Now Kiwi is born in Uttarakhand उत्तरावणी के सौजन्य से


दुनिया मे सुपर फ्रुट के नाम से मशहूर न्यूजीलैंड के राष्ट्रीय फल कीवी का उत्पादन अब चमोली जिले के सीमांत विकासखंड जोशीमठ में भी हो रहा है। विकासखंड के पैनी व बड़ागांव में कीवी के उत्पादन से काश्तकारों की उम्मीदों को पंख लग रहे हैं।  
उद्यान निरीक्षक सोमेश भंडारी के मुताबिक सीमांत जोशीमठ विकासखंड में कीवी की पैदावार उत्साहित करने वाली है। अन्य किसानों को भी कीवी उगाने के लिए प्रेरित किया जाएगा। कीवी के फल की मांग बहुत है। खासकर यह पर्यटकों को खूब पसंद आ रहा है।
कीवी का पेड़ झाड़ीनुमा होता है। जिसमे कीवी लगता है यह पेड़ जोड़े (नर व मादा) में होते हैं। समुद्रतल से 600 से 1800 मीटर की ऊंचाई पर पैदा होने वाला कीवी औषधीय गुणों के साथ सभी प्रकार के पोषक तत्वों का भी भंडार है।
यह फल न्यूजीलैंड के अलावा चीन, फ्रांस, चिली, ब्राजील आदि देशों में भी प्रचुर मात्रा मे उगाया जाता है। अब इसकी खेती उत्तराखंड में चमोली जिले के सीमांत जोशीमठ प्रखंड में भी होने लगी है। प्रखंड के पैनी व बड़ागांव में कीवी की पैदावार ने किसानों के लिए संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। खासकर उस स्थिति में, जब जलवायु परिवर्तन के चलते निचले क्षेत्रों में सेब की पैदावार सिमट रही है।

कीवी फल के गुण
कीवी (एक्टीनिडिया डेलीसिओसा) बहुत ही गुणकारी फल है। सौ ग्राम के कीवी में 61 कैलोरी 14.66 ग्राम कॉर्बोहाइड्रेट और नींबू से दोगुना विटामिन-सी पाया जाता है। इसके अलावा विटामिन-बी, प्रोटीन, एसिड, सोडियम, कैल्शियम, पोटेशियम सहित अन्य तत्व भी इसमें पाए जाते हैं।
पावर हाउस ऑफ एंटीऑक्सिडेंट कहा जाने वाला कीवी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाता है। गैस, पेट के रोग, खून की कमी व प्लेटलेट्स बढ़ाने में यह बहुत उपयोगी है। दुनिया मे इसकी 50 से अधिक वैरायटी पाई जाती हैं। औसतन 40 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान में पैदा होने वाले कीवी को कम से कम आठ महीने तक ठंड का वातावरण चाहिए।

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी की बायोग्राफिकल डाक्यूमेंट्री का प्रोमो हुआ रिलीज Narendra Singh Negi - Biographical Documentary

"पहाड़ी दगड़्या प्रोडक्शन" लेकर आ रहे है उत्तराखंड के जनगीतकार आंदोलकारी और विश्वप्रशिद्ध सख्सियत श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी की  बायोग्राफिकल डाक्यूमेंट्री जिसका प्रोमो रिलीज हो चुका है आप भी देखिये,

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गुरुवार, 31 अगस्त 2017

हॉकी के जादूगार ध्यानचंद जी की ऐसी डॉक्यूमेंटरी जिसपर आप गर्व के साथ देश के सिस्टम पर गुस्सा करोगे।

हॉकी के जादूगार ध्यानचंद जी की ऐसी डॉक्यूमेंटरी जिसपर आप गर्व के साथ देश के सिस्टम पर गुस्सा करोगे।
ध्यानचंद हॉकी का ऐसा नाम जिसे हर कोई जनता है पर क्या आप उस दौर को देखना और जानना चाहते हो जिस दौर में ध्यानचंद हॉकी खेला करते थे। अगर आपने चक्रवर्ती सम्राट का नाम सुना होगा । जिस प्रकार चक्रवर्ती सम्राट का अश्व जिस भी राज्य में प्रवेश कर जाता था वह राज्य उस राजा का हो जाता था जिसका वह अश्व था। इसी प्रकार उस दौर में ध्यानचंद जी जादू पूरी दुनिया के लोगों पर सर चढ़कर बोलता था। भारत की हॉकी टीम जब एक बार हॉकी खेलने के लिए विदेसी दौरे पर निकलती थी तो आप यकीन नहीं करोगे उन्होंने जितने भी देशो के साथ खेला सब में विजय रहे । सबसे बड़ी बात ये है की भारत ने एक भी गोल नहीं खाया तथा हॉकी के जादूगर ध्यानचंद ने अकेले सौ गोल किये।
यह हकीकत जितनी गर्व करने वाली है उतनी ही गुस्सा करने वाली है। जब आप इस विडिओ को देखोगे तो आपको अपने आप पर गर्व भी होगा और आपको अपने सिस्टम पर गुस्सा भी आएगा कि आखिरी क्यों हमारी सरकारें इतनी असंबेदनशील होती है कि जिस ध्यानचंद ने भारत का सर पूरे विश्व में शान से ऊँचा किया उन्हें अपने जीवन के अंतिम दिनों में इतनी कठिनाई में मरने के लिए भगवान् भरोंसे छोड़ दिया। pls पूरा विडिओ जरुर देखना बड़ा अच्छा विडिओ है।

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

तल्ड / तैडू (DIOSCOREA DELTOIDEA)–डॉ राजेन्द्र डोभाल


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तल्ड की सब्जी तो उत्तराखण्ड में शिवरात्रि के व्रत के समय अक्सर खाने को मिलती है तथा बाजार में ठेलियों में अक्सर बिकने को आता है। उत्तराखण्ड में तो यह प्राचीन समय से ही सूखी सब्जी के रूप में खाया जाता है जिसे स्थानीय लोग जंगलों से खोद कर लाते है। प्राचीन समय से ही तथा कई साहित्यों के अनुसार तल्ड निकालने का उचित समय नवम्बर से मार्च तक माना जाता है जब पौधे अधिकतम आकार प्राप्त कर चुका होता है। इस समय तल्ड के कंद में सर्वाधिक मात्रा में Diosgenise तथा Yamogenin की मात्रा पायी जाती है जिसका चिकित्सा विज्ञान अत्यधिक महत्व है।

तल्ड के बेल की तरह पौधा होता है जिसमें जमीन के अन्दर कन्द बनते है जो विभिन्न आकार के होते है। विश्वभर में डाइसकोरिया जीनस अन्तर्गत लगभग 600 प्रजातियां आती है जो डाइसकोरेइसी परिवार से सम्बंध रखती है। उत्तराखण्ड तथा अन्य हिमालय राज्यों में तो यह जंगली रूप में ही पाया जाता है परन्तु इसकी व्यवसायिक क्षमता देखते हुए भारत के कुछ राज्यों जैसे पंजाब, महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश में इसकी व्यवसायिक खेती की जाती है।
विश्वभर में सामान्यतः यह Tropical क्षेत्र का पौधा है परन्तु कुछ प्रजातियां Temprate क्षेत्रों तक विस्तार पाया जाता है। तल्ड की कुछ जंगली प्रजातियां मानव स्वास्थ्य के लिए Steroidal saponins के मौजूद होने के कारण जहरीली पाई जाती है जिसको Detoxify करके खाने योग्य बनाया जाता है। प्राचीन समय से ही खाने योग्य तल्ड तथा जहरीले तल्ड की प्रजाति की पहचान उसकी पत्तियों से की जाती है क्योंकि खाद्य प्रजाति की पत्तियां विपरीत पाई जाती है तथा जहरीले प्रजाति में alternate पत्तियां पायी जाती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में तो जहरीली प्रजातियां में भी मौजूद Steroidal saponins को कई रासायनिक क्रियाओं से गुजारने के बाद Steroida hormones तथा गर्भ निरोधक के लिए प्रयोग किया जाता है।

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में तल्ड का अत्यधिक महत्व है इसमें मौजूद Diosgenin की वजह से ही है जो इसका प्राकृतिक स्रोत है। तल्ड मे लगभग 4-8 प्रतिशत Diosgenin पाया जाता है। जो वर्तमान चिकित्सा विज्ञान में Progesterone तथा Steroid औषधि निर्माण में व्यवसायिक रूप से प्रयुक्त होता है। इसके साथ-साथ Diosgenin से Cortisone को भी Synthesis किया जाता है जो Arthritis के निवारण में प्रयुक्त होता है तथा Diosgenin से व्यवसायिक रूप Stigmasterol, Sapogenins, Cortisone, pregnenolone, Progesterone, बीटा- Sitosterol, Ergosterol बनाये जाते है जो Progestorone को Synthesis करने में सहायक होते है तथा शरीर में विटामिन D3को Synthesis करने में भी सहायक होते है। इसी गुणवत्ता की वजह से आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में लुप्त प्रायः माने जाने वाला तल्ड जिसको की केवल किसी व्रत के मौके पर ही खाया जाता था अचानक विश्व भर में एक नयी पहचान मिलने लगी है। जिसकी वजह से विश्वभर में फार्मास्यूटिकल उद्योगों में इसकी सर्वाधिक मांग रहती है।

तल्ड मे मौजूद Diosgenin जो सेक्स हॉरमोन तथा गर्भ-निरोधक के अलावा बॉडी बिर्ल्डस भी शरीर में टेस्टी स्ट्रोन का स्तर बढाने के लिए प्रयोग करते है। फार्मास्यूटिकल उद्योग में बढती मांग की वजह से इसका अवैज्ञानिक एवं अत्यधिक दोहन होने की वजह से रेड डाटा बुक ऑफ इण्डियन प्लाट्स ने Vulnerable पौधों की श्रेणी में रखा है। सन् 1998 में मोलर तथा वॉकर के सर्वे के अनुसार जंगलों में तल्ड की 80 प्रतिशत संख्या कम हो गयी है और तभी से इसे आशंकित पौधों की श्रेणी में रखा गया था। Convention on International trade in Endangered species (CITES) के अनुसार जंगलों से उत्पादित सभी उत्पादों के निर्यात पर रोक लगा दी गयी केवल व्यवसायिक रूप से उत्पादित उत्पादों को ही Legal Procurement Certificate (LPC) दिया जाता था। सन् 1997 से 2002 तक भारत की आयात-निर्यात नीति के तहत तल्ड तथा तल्ड से उत्पादित उत्पादों का फार्मालेशन के सिवाय पूर्णतः रोकथाम लगा दी गयी थी।

यदि तल्ड की पोष्टिकता की बात की जाय तो यह औषधीय गुणों के साथ-साथ पोष्टिकता के रूप में भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है इसमें प्रोटीन 3.40 प्रतिशत, फाइबर-7.50 प्रतिशत, वसा-1.20 प्रतिशत तथा कार्बाहाइड्रेट- 22.6 प्रतिशत तक पाये जाते है।
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अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में एक कि0ग्रा0 सूखे तल्ड की कीमत 58.65 डॉलर तक पायी जाती है। उत्तराखण्ड हिमालय राज्य होने के कारण बहुत सारे बहुमूल्य उत्पाद जिनकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मांग रहती है। प्राकृतिक रूप से जंगलों में पाये जाते है। इसका विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन तथा व्यवसायिक क्षमता का आंकलन कर यदि व्यवसायिक खेती की जाय तो यह प्रदेश की आर्थिकी का बेहतर साधन बन सकती है।








डॉ राजेन्द्र डोभाल
महानिदेशक
उत्तराखण्ड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद
उत्तराखण्ड।

बुधवार, 23 अगस्त 2017

लिम्बा (खटाई Lemon/Citrus) डाॅ राजेन्द्र डोभाल महानिदेशक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद उत्तराखण्ड।

त्तराखण्ड राज्य का अधिकांश क्षेत्र पर्वतीय होने के कारण अपने अनमोल तथा अस्मरणीय स्वाद के लिए वर्षों से ही प्रसिद्ध है। प्रदेश अनेकों प्राकृतिक सम्पदाओं का भण्डार है, जिसमें से खटाई एक प्रमुख फल है। शायद ही कोई ऐसा प्रदेशवासी हो जिसने खटाई का आनन्द ना लिया हो। उत्तराखण्ड प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में खटाई को एक विशेष स्वाद के लिये जाना जाता है। पूरे विश्वभर में चीन, भारत, मैक्सिको, अर्जेन्टाइना, ब्राजील, यू0एस0, तुर्की, इटली, स्पेन, ईरान आदि इसके सर्वाधिक उत्पादक देश है। वर्ष 2012 के आंकडों के अनुसार चीन द्वारा सर्वाधिक 2,300,00 टन तथा भारत द्वारा 2,200,000 टन उत्पादन किया गया। उत्तराखण्ड राज्य में खटाई का सर्वाधिक उत्पादन अल्मोडा जिले में लगभग 8,332 मैट्रिक टन प्रतिवर्ष तक किया जाता है, जिसमें धौलादेवी, हवालबाग, ताकुला, ताडीखेत, द्वाराहाट, चैखुटिया, लमगडा तथा भैसियाछाना आदि प्रमुख है। इसके अलावा उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, बागेश्वर, पिथौरागढ आदि जिलों में भी खटाई का व्यवसायिक उत्पादन किया जाता है।
एशिया मूल के खटाई फल का संबंध Rutaceac कुल से है तथा इसे Citrus limon वैज्ञानिक नाम से जाना जाता है। इस प्रजाति के सभी फलों को सामान्यतः सिट्रस नाम से जाना जाता है जो कि इन फलों में सर्वाधिक पाये जाने वाले Citric acid को भी दर्शाता है। खटाई विटामिन-सी का एक अच्छा प्राकृतिक स्रोत है जो कि शरीर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। विटामिन-सी की खोज 1912 में की गई थी तथा वर्ष 1928 में सर्वप्रथम प्राकृतिक स्रोत से निकाला गया जिसे बाद में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा शरीर के लिए महत्वपूर्ण तथा आवश्यक दवा की सूची में भी शामिल किया गया। खटाई मे विटामिन-सी की मात्रा 53 मि0ग्रा0/100 ग्रा0 तक पायी जाती है। इसके अलावा खटाई में ऊर्जा-121 किलो जूल, प्रोटीन-1.1 ग्रा0, फाइबर-2.8 ग्रा0, कोलीन-5.1 मि0ग्रा0, मैग्नीशियम- 8.0 मि0ग्रा0, मैग्नीज़- 0.03 मि0ग्रा0, पोटेशियम- 138 मि0ग्रा0, फाॅस्फोरस- 16 मि0ग्रा0, आयरन- 0.6 मि0ग्रा0, कैल्शियम- 26 मि0ग्रा0 तथा जिंक- 0.06 मि0ग्रा0 प्रति 100 ग्रा0 तक पाये जाते है।

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खटाई में इसके रसीले भाग के अलावा दो महत्वपूर्ण छिलके वाले भाग होते है जो कि एक फ्लेवीडो तथा दूसरा एल्बेडो होता है। फ्लेवीडो खटाई का सबसे बाहरी भाग होता है जो कि इसेंसियल आॅयल का भी प्रमुख स्रोत होता है और प्राचीनकाल से ही फ्लेवर और सुगंध के लिए प्रयोग किया जाता है, जबकि अन्य दूसरा भाग एलबेडो सबसे बाहरी भाग के अन्दर वाला भाग होता है जो कि फाइबर का एक अच्छा स्रोत होता है, और विभिन्न खाद्य पदार्थो में भी प्रयोग किया जाता है।

खटाई में पाॅलीफीनोलस, टर्पीन्स तथा टेनिन्स आदि प्रमुख रासायनिक अवयव पाये जाते है। औषधीय रसायनों की प्रचूरता के कारण खटाई को परम्परागत रूप से ही विभिन्न स्वास्थ्य लाभ हेतु प्रयोग किया जाता है। इसका सेवन पेट, इटेस्टांइन तथा किडनी आदि के रोगों में लाभदायक माना जाता है। आज भी दूरस्त पर्वतीय क्षेत्रों में खटाई का सेवन बुखार को कम करने हेतु किया जाता है। विभिन्न शोध-पत्रों के अनुसार इसके निरन्तर सेवन का विभिन्न कैंसर रोगों में भी प्रभावी पाया गया है।
यह स्वरोजगार का एक अच्छा विकल्प भी है क्योंकि इससे निर्मित विभिन्न खाद्य पदार्थ जैसे कि जूस, अचार, चटनी तथा अन्य विभिन्न एनर्जी ड्रिंक्स की बाजार में अच्छी मांग रहती है। स्थानीय बाजारों में भी इसकी कीमत लगभग 20-30 रू0 प्रति किलो तक मिल जाती है।

डाॅ राजेन्द्र डोभाल
महानिदेशक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद
उत्तराखण्ड।

सोमवार, 21 अगस्त 2017

कुमाऊं की इन दो बेटियों ने कैसे बदली पहाड़ी किसानों की जिंदगी आज की मेहमान पोस्ट में पढ़िये NEWS ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया के माध्यम से


यह सच है कि उत्तराखंड की दो बेटियाँ कुशिका शर्मा और कनिका शर्मा ने अपनी अच्छी ख़ासी मोटी तनख़्वाह की नौकरी को तवज्जो ना देकर रुख किया अपने गाँव का। दिल्ली जैसे महानगर की सुख सुविधाएं सिर्फ इसलिए छोड़ दी ताकि पहाड़ों को फिर से जीवन दे सकें। जी हाँ कुशिका और कनिका शहर में रहकर अपनी जिंदगी बड़े आराम से गुजार रही थीं लेकिन उन्होंने अनुभव किया कि रोज की भागदौड़ में वो सुकून नहीं था जो पहाड़ की वादियों में था। दोनों बहनों ने तय किया कि वो सब कुछ छोड़कर उत्तराखंड में बसे अपने गाँव मुक्तेश्वर में जाकर गाँव की प्रगति में अपना योगदान देंगी। परिवार का समर्थन मिला और उन्होंने गाँव जाकर रास्ता चुना ऑर्गेनिक खेती के प्रति जागरूकता लाने का। मुक्तेश्वर जाकर दोनों बहनों ने‘*दयो – द ओर्गानिक विलेज रिसॉर्ट*‘ का शुभारंभ किया और स्थानीय लोगों को जैविक खेती के प्रति जागरूक करने लगी। साथ ही अब दोनों बहनों की कोशिश अपना कार्यक्षेत्र विस्तारित करने की है ताकि उत्तराखंड के अन्य गाँवों को भी जागरूक किया जा सके। साथ वे अब कृषि उत्पादों को बेचने के लिये सप्लाई चेन बनाने की भी योजना पर कार्य कर रही हैं। नीचे के लिंक पर पूरी स्टोरी पढ़िए
 कुमाऊं की इन दो बेटियों ने कैसे बदली पहाड़ी किसानों की जिंदगी, आज के युवा जहाँ एक ओर शहरी चमक धमक से प्रभावित हो रहे हैं और शहरों में बसने की चाह में अपनी जन्मभूमि अपने गाँवों से विमुख हो रहे हैं। आए दिन हम पढ़ते हैं कि उत्तराखंड के गाँवों से निरंतर पलायन हो रहा है, गाँवों में केवल बुजुर्ग शेष रह गए हैं। ऎसे में यदि हम आपको बताये कि आज भी कुछ युवा हैं जो महानगरों की चमक-धमक, अच्छी ख़ासी नौकरी और समस्त सुख सुविधाओं को अलविदा कहकर अपने गाँवों का रुख कर रहे हैं, अपने गाँवों को तरक्की के पथ पर अग्रसर करने के लिए कार्यरत हैं तो आपको विश्वास नहीं होगा।

शनिवार, 19 अगस्त 2017

कविता - वैसी मां कहां से लाऊं -- डा. राजेश्वर उनियाल 9869116784


 
क्या आवश्यक है कि मां पर कविता केवल मातृ दिवस को ही लिखी जाए...तो लीजिए प्रस्तुत है कविता - वैसी मां कहां से लाऊं ....

चूल्हा, चौकी मैं सजाऊँ
जदेरू उरखेला मैं लगाऊं,
पर कोई मुझे यह बताए
वैसी मां कहां से लाऊँ ।

गाय बछिया फिर मैं पालूं
घर द्वार में उन्हें बसा लूं,
पर दूध दोहती शाम सबेरे
वैसी मां कहां से लाऊं।

घर को रोशन जगमग कर दूं
अंधकार को दूर भगा दूं,
पर सिल्ले जलाकर मुझे पढाए
वैसी मां कहां से लाऊँ ।

सुंदर हार, मोतियों की माला
कंगन चूडी बिंदी लाऊँ,
पर रिंगाल से बाल कटोरती
वैसी मां कहां से लाऊँ ।

टी.वी. रेडियो होमथियेटर
वायलेन, वीणा सब मैं लाऊँ,
पर थपकी देकर मुझे सुलाए
वैसी मां कहां से लाऊँ ।

घुटने जब मेरे छिल जाएं
पहले मारे और चिल्लाए,
फिर अपने आंसू बहाए
वैसी मां कहां से लाऊँ ।

लौट सकता हूं गांव में अपने,
बुन सकता हूं सारे सपने
पर द्वार पर खडी बाट जोहती
वैसी मां कहां से लाऊँ ।

जदेरू(हाथ चक्की), उरखेला(धान कूटने का स्थान), सिल्ले (लौ प्रज्वलित करने वाली लकडी),रिंगाल(देशी कंघी)

डा. राजेश्वर उनियाल  9869116784
 






गुरुवार, 17 अगस्त 2017

भांग (कैनावीस साटाइवा) एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण डा0 राजेन्द्र डोभाल महानिदेशक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् उत्तराखण्ड।


कुछ समय पहले मेरे द्वारा यह वादा किया गया था कि भांग पर अपना वैज्ञानिक दृष्टिकोण आपके सम्मुख प्रस्तुत करूंगा क्योंकि वर्तमान में उत्तराखण्ड सरकार द्वारा भांग की खेती को स्वीकार्य किया गया है लेकिन बहुतायत मंु हमारा समाज भांग की खेती को नशे के रूप में जानता है।
वस्तुतः दुनिया के करीब 170 देश इसकी खेती करते हैं एवं चीन, कनाडा एवं फ्रांस में इसकी खेती रेशे के लिये की जाती है। बाकी अन्य देशों के द्वारा इससे उत्पादित होने वाले लगभग 20,000 से अधिक उत्पादों को औद्योगिक रूप में तैयार किया जाता है।

चीन में यहाँ तक कि इससे बायोप्लास्टिक बनाया जा रहा है एवं आंकड़ों के अनुसार इससे High Value Health Product तैयार किया जाय तो इसके तेल की कीमत का रू0 20,000 से 25,000 अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में मिलने की संभावना है।

भांग का वैज्ञानिक नाम कैनावीस साटाइवा है तथा यह कैनावेसी कुल का पौंधा है। मुख्य रूप से भांग की दो प्रजातियां पायी जाती है कैनावीस इनडिका जो कि छोटी तथा गहरे हरें रंग का पौधा होता है तथा कैनावीस सटाइवा जो कि अत्याधिक मात्रा में पाया जाता है। उत्तराखण्ड राज्य में यह तराई भावर क्षेत्रों से लेकर उच्च हिमालयी क्षेत्रों तक प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय पौंधा है, जिससे सम्पूर्ण विश्व में सबसे पुरानी फसल के रूप में जाना जाता है। भांग का सर्वाधिक उपयोग रेशे के रूप में चीन में किया जाता है तथा विश्व के अन्य देशों फ्रंास, यू0के0, कनाडा, रोमानिया, हंगरी, कोरिया तथा अन्य कई देशों में भांग का औद्योगिक उत्पादन किया जाता है। वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व में कनाडा के अन्तर्गत भांग का सर्वाधिक क्षेत्रफल तथा उत्पादन किया जाता है। विश्व बाजार में भांग से उत्पादित लगभग 20 हजार से अधिक उत्पाद औद्योगिक रूप से तैयार किये जाते हैं जैसेः- हिम्प मिल्क, हिम्प सीड प्रोटीन, फाईबर, जीयो टेक्सटाइल्स, बायोप्लास्टिक, एमीमल बेडींग, बायोफ्यूल, मेडिसीन, सौन्दर्य प्रशाधनों तथा भांग का तेल आदि किया जाता है। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण औद्योगिक एवं औषधीय पौंधा है तथा सम्पूर्ण विश्व में सर्वाधिक बाजार मांग व उगाये जाने वाला एक मात्र फसल है। भांग के तेल का वैज्ञानिक अध्ययन तथा औषधीय एवं औद्योगिक गुणांे के आधार पर ही कई देशो मंे भांग की फसल के उत्पादन को मान्यता प्राप्त है।
भांग के तेल में लगभग 15 प्रकार के फैटीएसीड प्रचूर मात्रा में पाये जाते है तथा सम्पूर्ण बीज में 29.6 से 36.5 प्रतिषत तेल की मात्रा पाई जाती है। जिसमें उमेगा- 6 लेनोलिक एसीड सर्वाधिक (56.9) पाया जाता है तथा उमेगा-3 (20.4) प्रतिशत तथा उमेगा-9 (11.4) प्रतिशततक पाया जाता है, जिसमे उमेगा- 6, 3 एवं 9 के अलावा अन्य फैटीएसीड के साथ-साथ 20-25 प्रतिशत प्रोटीन, 20-30 प्रतिशत काबोहाइड्रेड, 25-25 प्रतिशत तेल तथा 10-15 अधुलनशील रेशा भी पाया जाता है। उक्त सभी आवश्यक तत्वों के विद्यमान होने के कारण भांग सम्पूर्ण पोषकता का पूरक भी माना जाता है। भांग के तेल की औषधीय एवं औद्योगिक मांग के कारण विश्व स्तर पर इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
उमेगा- 6, 3 एवं 9 के प्रचूर मात्रा में उपलब्ध होने के कारण इसका उपयोग हृदय सम्बधी बीमारी, दिमागी संतुलन, शारीरिक, विकास, ओस्टोपोरोसिस, पाचन क्रिया तथा उच्च रक्त चाप के निवारण के लिए प्रयोग किया जाता है। डाॅ0 ईडवर्ड की वर्ष 2015 की रिपोर्ट के अनुसार उमेगा- 6, 3 एवं 9 उपरोक्त सभी बीमारियों के निवारण के साथ-साथ मानव शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत बनाता है। चूंकि उमेगा- 6, 3 एवं 9 मानव शरीर में स्वतः नहीं बनते हैं जिससे भांग का तेल इसका एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोत है तथा मानव पोषण के लिए फिश आॅयल का भी उपयुक्त विकल्प माना जाता है। इसके तेल में विद्यमान 57 घटकांे में से 90.5 प्रतिशत घटकों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा चुका है, जिनमें से मुख्य घटक E-Caryophyllene (19-6&26-1%)] Lemonene (4.1- 15.5 %)] Caryophyllene Oxide (2.0- 10.7 %)] E – Farnesene (4.8-8.5%)] Humulene (5.4-7.8%), Pinene (10.7%), Myrcene (0.8-6.0%) आदि पाये जाते हैं
उपरोक्त घटकों के अलावा विटामिन E – 90, गामा टोकोफेराल- 85, फासफोरस-1160, पोटैशियम – 859, मैग्नीशियम- 483, कैल्शियम – 145 मी0ग्रा0 प्रति 100 ग्राम भी पाया जाता है। विटामिन- D की प्रचूर मात्रा उपलब्ध होने के कारण भांग के तेल का उपयोग त्वचा रोग, शुगर, एक्जाइमा तथा अस्टोपोरोसिस आदि बीमारियों के उपचार हेतु भी प्रयोग किया जाता है। औषधीय उपयोग के साथ-साथ भांग के तेल का विभिन्न औद्योगिक उत्पादों जैसे:- शैम्पो, पेंट, साबुन, सौन्दर्य प्रसाधन, बाॅडीकेयर तथा विभिन्न जीवाणु नाशक त्पादों की निर्माण के लिए प्रयोग किया जाता है।

उपरोक्त सभी महत्वपूर्ण पोषक, औषधीय एवं औद्योगिक गुणों के कारण ही विश्व बाजार में भांग का उत्पादन तथा क्षेत्रफल लगातार बढ़ रहा है। चीन, कपास उत्पादन के बजाय भांग सेे रेशा उत्पादन पर जोर दे रहा है। अन्य देश यू0के0, कनाडा, रोमानिया, हंगरी, कोरिया, तथा आस्ट्रेलिया भी भांग के औद्योगिक उत्पादन को बढ़ावा दे रहा हैI वर्तमान में भांग आधारित 20 हजार से अधिक उत्पाद जिसमें टैक्सटाइल तथा बायोप्लास्टिक (Linoleum) का भी उत्पादन किया जा रहा है। वर्तमान मंे ैSynthetic प्लास्टिक के पर्यावरण पर हानिकारक दुष्प्रभावो को दृश्टिगत रखते हुए भांग से तैयार बायोप्लास्टिक के उत्पादन पर औद्योगिक रूप से जोर दिया जा रहा है जोकि विश्व बाजार में एक अत्यंत महत्वपूर्ण फसल के औद्योगिक उपभोग के लिए बेहतर विकल्प माना जा रहा है।

यू0एन0ओ0डी0सी0 रिपोर्ट के अनुसार जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “Bulletin on Narcotics” जारी करती है, ने विश्व स्तर पर भांग उत्पादन, निर्यात आदि पर नजर रखती है के अनुसार वर्ष 2003 में 2,31,000 हैक्टेयर में भांग की खेती की जा रही थी जिसका 30 हजार टन उत्पादन था। यू0एन0ओ0डी0सी0 की वर्ष 2004 की रिपोर्ट के अनुसार विष्व के 176 देशो में भांग औद्योगिक उत्पादन किया जा रहा है तथा वर्ष 2002 – 2006 तक 122 देशो में भांग का उत्पादन रेजिंन के अलावा अन्य औद्योगिक उत्पादों के लिए किया जाता रहा है केवल 65 देशो में ही भांग का उत्पादन रेजिंन के लिए किया जाता रहा है। वर्श 2008 तक भांग उत्पादन हेतु कुल 6, 41, 800 हैक्टयर क्षेत्र अच्छादित रहा है। जो कि कुल 13, 300 से 66, 100 मैटिक टन उत्पादन तथा 2, 200 – 9, 900 मैट्रिक टन रेजिंन उत्पादन करता था। यू0एन0ओ0डी0सी0 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2008 से विश्व स्तर पर भांग आधारित औद्योगिक उत्पादांे की बाजार मांग व उपयोगिता लगतार बढ़ने की वजह से अन्य कई देश अमेरिका, अफ्रीका, पश्चिमी यूरोप भी सम्मलित हो रहें हैं। एफ0ए0ओ0 की वर्ष 2007 की रिपोर्ट के अनुसार चीन विश्व स्तर पर भांग के तेल उत्पादन में अग्रणीय स्थान पर था। जबकि 1961-1975 तक टर्की विश्व स्तर पर भांग के तेल निर्यात में अग्रणीय स्थान रखता था। तत्पश्चात लेबनान 1977 – 1985 तक प्रमुख रहा है। चीन विश्व स्तर पर भांग के तेल के उत्पादन एवं निर्यात में 77 प्रतिशत 12, 200 मेट्रिक टन, 1986 में प्रमुख योगदान रहा है। सोेवियत संघ/रूस का वर्ष 2005 तक भांग के तेल का उत्पादन 10, 300 मैट्रिक टन तक पहुंचा चुका है। जबकि वर्ष 2007 में कनाडा द्वारा 306 मेट्रिक टन भांग के तेल का निर्यात किया गया है, जिसमें 90 प्रतिशत केवल संयुक्त राज्य अमेरिका में खाद्य पदार्थांे तथा औद्योगिक उपयोग हेतु किया गया है।

चूंकि उत्तराखण्ड प्रदेश में भांग तराई भावर से उच्च हिमालयी क्षेत्रों तक प्राकृतिक रूप से पाई जाती है तथा औषधीय एवं औद्योगिक उपयोगिता की वजह से इसका उत्पादन प्रदेश में बंजर भूमि तथा बेनाप भूमि का सदुपयोग कर औद्योगिक रूप से किया जा सकता है। साथ ही यह अत्यन्त सहिष्णु फसल होती है जिसमें विपरीत वातावरण में भी उत्पादन देने की क्षमता होती है तथा जंगली जानवरों, बंदरों एवं कीट व्याधि का प्रकोप भी नहीं पाया जाता है जिससे कम लागत में अधिक मुनाफा लिया जा सकता है। अगर उत्तराखण्ड में भांग की खेती एक कारगर नियंत्रण में की जाय जिससे इसका दुरूपयोग ना हो तो यह एक उपयोगी alternate approach होगी मानव-जंगली जानवरों का संघर्ष रोकने हेतु।


डा0 राजेन्द्र डोभाल
महानिदेशक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद्
उत्तराखण्ड।

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

सत्य घटना - सोणी ताई की प्रसव पीड़ा - भाग दो by Devesh Rawat


पिछले भाग में मैने बताया था कि सोणी ताई को प्रसव पीड़ा ज्यादा होने के कारण वह बे-होश हो गई थी
अब आगे..............  
सभी लोग गौशाला की और भागते हुए जाते है गौशाला गाँव से थोड़ा बाहर थी। वहाँ पहुंचने में कुछ वक्त लग गया इतने में कुछ औरते जोर से आवाजे देने लग गई। झबरू ताऊ और अन्य लोग गौशाला में पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया। तब तक शाम के 7:32 बज गये थे। हल्की हल्की बर्फ भी गिरने लगे गई थी। वैसे समय देखने के लिए घड़ी गाँव में दीना दिदी के पास ही हुआ करती थी। तो सारे गाँव को समय वही बताती थी । और कुछ लोग सूर्य की रोशनी और कुछ रात को चाँद देख के समय का मोटा- मोटा आंकलन कर देते थे। दीना दीदी को इस लिए घड़ी के साथ बुलाया था ताकि वह बच्चा पैदा होते ही समय बता सके और बच्चे की कुंडली ठीक से बन सके। कही बार घड़ी का सेल खत्म हो जाता था तो दो लोगों को गॉँव वालो ने अपने खर्चे पर दुगड्डा भेजते थे सेल लाने के लिए। वैसे इस क्षेत्र में गाड़ी की सुविधा नही थी तो दुगड्डा से पैदल 70 KM आना जाना पड़ता था। दो दिन में गाँव तक पहुँच ही जाते थे। इन लोगों को ढाँकर बोलते है।
नमक,भेली,तेल और अन्य रोज की जरूरत के सभी सामन 70 km का सफर तय कर के दुगड्डा से आता था।
ताऊ जी ने पदान जी को बोला काका आगे क्या करना है। ताऊ जी बड़ी चिंता में थी। आंखों में आँसू भरे हुए थे पर रोना नही आ रहा था। बेचैनी में अ-सुद् सी हालत थी। अपने मांथे पर फ़्टगी मार रहे थे कि कैसी किसमत फूटी मेरी। इस कड़ाके सर्दी की रात में ताऊ जी पसीने से सरावोर थे । आज गाँव में किसी के घर का चूल्हा नही जला था। सारा गाँव परेशान था।
इतने में दाई ने छन्नि के अंदर से भरे हुए कंठ से आवाज लगाई। झबरू जैसे भी कर पर इस छोरी को हॉस्पिटल पहुंचा ले जा। सब कुछ कर पर इस छोरी के प्राण बचा ले। पर कोई करे भी तो क्या करे । इलाके में कोई हॉस्पिटल नही था। बोलना आसान है पर उस से भी मुशकिल है ये सोचना कि किसी मरीज को प्राथमिक उपचार मिल सके।
इतने में मंगली दादी आई अपनी लांठी को टेकती हुई आयी। दादी के सफेद बाल झुकी हुई कमर। कमर पर सफेद सापा जो न जाने कब से धोया नही था। और कानों में आठ-आठ मुर्खिल, पैरों में पैडा,नाक में बुलाक, दादी ने जीवन भर चप्पल नही पहनी। दादी ने अपनी कमर पर बंधे कपड़े (पठुक) से एक सिक्का और कुछ चाँवल निकाले सिक्का एक आना का था। जो उस दौर में बहुत ज्यादा था। पर मरता क्या नही करता। दादी ने ताऊ को बोला बेटा मानेगा तो मै तेरी माँ के समान हूँ और आज पुकार अपनी कुलदेवी को, और बोल अगर आज मेरी सोणी को कुछ हुआ तो या तू नही, या मै नही। तेरी पूजा कभी नही करूंगा अगर तूने मुझे निराश किया तो। अब करें तो क्या करें । ताऊ जी ने वही किया जो दादी ने बोला। जीवन संगनी का सवाल जो था। ताऊ जी ने सिक्का और चाँवल अपने सिर के ऊपर घुमाए (परोखे) फिर दाई को बोला कि सोणी के सिर से पैसा (उच्यणु) घुमा दे। सारा कार्यक्रम विधिवत चल रहा था इतने में भुन्द्रा काकी को देवता आ गया, वह नाचने लगी चिल्लाने लगी, काकी नेअपने बाल खोल दिये, गाँव वालों ने भीड़ लगा दी लोग हाथ जोड़े खड़े हो गए । भगतू भाई, पीथा काकी, धुपणो के लिए करछी (डांडयों) खोज रहे थे । कोई घी, कोई खुणजु सभी में अफरा ताफरी मची हुयी थी। इतने में धूपण भी आ गया। गोंत अर गंगाजल का लोटा भी गया।
सभी ब्यवस्था होते ही दो चार अन्य देवी-देवता भी प्रकट को गए। मंगतू काका तो छूरी पकड़ के नाचते है। जब छन्नि (गौशाला) में छूरा नही मिला तो बैल का कीला ही उखाड़ दिया।
 
मंगतू काका ताऊ जी के सिर पर हाथ रख के बोले !! तेरी माँ ने मेरे लिये भेंट निकाला था कि बकरा मारूँगी, मारा नही । मै तेरा रास्ता रोक रहा हूँ । मै भैरव हूँ!! ताऊ जी बोले हे परमेश्वर जी !! जब माँ ही न रही तो मुझे क्या पता कि क्या माँगा था। ताऊ जी दोनों हाथों से धुपणु घुमाने लगे। इतनी देर में सुमा भाभी (बौ) ने किटगताल (चिल्लाना) मारी। उनकी आवाज ने सब के कानों को सुन्न कर दिया। आवाज इतनी बड़ी थी कि सोणी ताई बेहोशी से बाहर आ गई । तीन गाँव दूर तक आवाज गई थी। और अगल-बगल के गाँव के लोग भी लालटेन और रांका जला के आवाजें देने लग गए।
यही भाईचारा है पहाड़ों में कि तू दुखी तो सब दुखी मै सुखी तो जग सुखी। कुछ बगल के गाँव से पांच सात उजाले हमारे गाँव की ओर बढ़ने लगे गए थे । जोर-जोर से आवाजें दे रहे थे वह लोग।

सोणी ताई ने अब कुछ हरकत की अपनी आंखों से ही कहा हो जैसे मुझे न बचावो मुझे मरने दो। अब मेरी बस की बात नही। नही बचूंगी मै पर लोगों ने हिम्मत बंधाई अब तो हाल ये है कि ताऊ जी के भी आंसू गिरने लग गए थे। होंठ कांपने लग गए थे उनके। बोल कुछ नही पाए पर दर्द जितना ताई को प्रसब् का उतना ही ताऊ को बिरह का।
लोगों से ताई को जोर लगाने को बोला कुछ कोशिश करने को बोला पर कोई फायदा नही हुआ ताई जी जीने की उम्मीद हार चुकी थी।
इतने में पदान जी ने बोला पिंनस को सजाओ अर ब्वारी को अंदर गाँव के हॉस्पिटल में ले जाओ । वहाँ कुछ हो सकता है। लोगो ने तैयारी शुरू कर दी। इतने में बगल के कुछ गाँव के लोग भी मौके का जायजा लेने आ गये कि माजरा क्या है। राम सलाम दुअा के साथ कहानी समझ में आई । उनमें से किसी ने बताया कि अंदर गाँव का हॉस्पिटल अभी सही से नही बना डॉ नही है वहां कोई भी कर्मचारी अभी नही आया। अब सारी रही हुई उम्मीद भी खत्म हो गई । पर उन लोगों ने ताई को रिखणीखाल ले जाने की बात कही। वह लोग बोले!! रिखणीखाल में कम्पाउडर है कुछ तो जुगाड़ हो जाएगा। रात्रि के 11 बज गए थे अभी तक घुटने की ऊंचाई का बर्फ गिर चूका है चारों ओर सन्नाटा सर्दी की ठंडी हवायें। औऱ इतना बड़ा बखेड़ा कुछ नोजवानों ने ताई को उठा के पिंनस में रखा रसियों से बांधा अच्छी तरह से कपड़ों से दन (भेड के ऊन से बना बिछौना दन होता है) ढक दिया। औऱ 4 नोजवान कंधा लगा कर कुछ आगे से उजाला कुछ पीछे से रांका (मसाल) जला कर और पूरे गाँव की सान मिट्टी तेल का गैस मेरे सिर पर सब से आगे। वैसे हम लोग इस गैस को किसी खास मौके पर ही बाहर निकालते है पर आज तो समूचे गाँव पर ही संकट था। 
द्वारी,शेरागाड, डबराड, पानीसैण शिमला सैण होते हुए करीब रात्रि के 3 बजे हम लोग ताई को बिना सांस लिए रिखणीखाल में पंहुचा दिए ताई भी हिम्मत हार चुकी थी पर सांसे अभी कहीं अपनी मर्जी से अटकी हुई थी। 
जैसे ही हम रिखणीखाल पहुंचे अगत बगल गाँव वालों (बल्ली, ब्यौला) को पता चल गया कि कोई मरीज आ रहा है बूढ़े लोगों की खांसने की आवाजें सुनाई दे रही थी चिमनी की रौशनी भी दूर दिख रही थी।
बस कुछ ही छण में हम 25,30 लोग ताई जी को लेकर रिखणीखाल हॉस्पिटल में पहुंच गए पर किस्मत आज हम लोगों के साथ न था यहां तो ताला लगा हुआ था। कोई नही आस पास हम लोगों का दिल बैठ गया 5 घण्टे के सफर के बाद भी खुसी का मुंह नही देखा अब तक ताई मरी सी हालत में हो चुकी थी हम सर्दी में भी ताई के चेहरे पर तमलेट और छाकल से पानी निकाल के पानी के छीटे मार रहे थे।नाले गदेरे पार करते करते उबड़ खाबड़ रास्ते कहीं झाड़ियां कहीं चढ़ाई का रास्ता तो कहीं खड़ी ढलान नजाने आज देवी हम को कौन सी शक्ति दे रही थी कि हम जिन रास्तों पर दिन में नही चल पाते है रात के अंधेरे में बिना किसी रुकावट के चल रहे है। हमारे उजाले अब पूरी तरह बुझ चुके थे हम अब अंधेरे में थे पर उजाले की उम्मीद नही छोड़ी थी।
हम परिस्थिति के आगे लाचार थे असहाय थे हम उस दुश्मन से लड रहे थे जो हमारे साथ थी उठता बैठता है हमारा ही दोस्त है हमारा ही साथी है वो था बदहाली छेत्र की अनदेखी पहाड़ों की, शोषण समाज का। पर करे तो क्या करे सब के पास सवाल था पर जवाब किसी के पास नही था। सभी इतने लाचार थे कि किसी से सवाल भी नही पूछ सकते अपने आपस में कि अब क्या।
खैर होनी को कौन टाल सकता है भगवान जैसे हम सब की परीक्षा ले रहा हो सहन्ता की सीमा मांप रहा हो।
पर तभी किसी ने छिल्लुड (क्याडा) के उजाले के साथ आवाज दी हम को हम खुस हुए कि डॉ आगया पर वो कोई स्थानीय निवासी था करीब 70 साल का जो जायजा लेने आये थे कि आखिर इतनी रात को हॉस्पिटल में कौन आये है दिक्कत क्या है। राम दुवा हुई पूरी ब्यथा उन को बताई तो उन्हों ने बोला डॉ तो कल ही साम को अपने घर ग्राम भरपूर गया है उस की 6 साल की बेटी को घर के छ्ज्जा से बाघ उठा ले गया बेचारी सुबह मिली तो बाघ ने उसे आधा खा दिया था।
बेचारी मर गई पर आप ऐसा करो आज हमारे गाँव में शादी है वहाँ हमारे एक रिश्तेदार डॉ आये हैदिल्ली से । बस हम लोगों की खुशी का ठिकाना न रहा। जैसे कि वर्षों के प्यासे को पानी मिल गया हो। वो बूढ़े बाबा बोले कि इन को हमारे घर ले चलो आनन-फानन में ताई को हम ने उठा के उन के घर बएला तल्ला गाँव पहुंचा दिया वहां भीड़ इकठ्ठा हो गई। हम लोगों के बिखरे हुए बाल फटे पुराने कोड़ें चप्पलों पर धागे बंधे हुए पेंट पर रंगबिरंगी टल्ली (थेकले) रिखणीखाल के लोग हम से सभ्य दिख रहे थे हम थोड़ा देहात के थे वो लोग सेंदार के या हो सकता है आज उन के गाँव में शादी थी तो उसी की चकाचौंद रही होगी पर बहरहाल डॉ साहब को नींद में से जगा के लाये ग्रामीण पूरा माजरा समझाया फिर डॉ साहब बोले भाई बात तो सही है पर हम जानवरों के डॉ है इंसानों के नही। हम लोग फिर जहां खड़े थे वहीं नजर आरहे थे निराशा हताशा और लाचार सब के गले सूखे थे आंखे सूजी थी ठंड से ठिठुर रहे थे पर करते भी क्या किस्मत वहाँ लाई थी जहां सब कुछ होते हुए भी कुछ न था। फिर डॉ बोला कि कोई बात नही वैसे मेरी बीबी नर्स है वह कुछ करेगी हम लोग खुश तो हुए पर पूरे नही क्यों कि इतने भी गंवार नही थे हम कि नर्स और डॉ में फर्क न जान सकें। डॉ साबह ने किसी अपनी बीबी को लाने भेजा। वह शहर के लोग थे 30 मिनट तो लगेगा ही नींद से जगने का। पर वो भली औरत थी कहानी को आधा सुने ही बालों का जूड़ा बनाते हुई दौड आई मामले की गहराई को समझा और सारी ब्यवस्था करने की जिम्मेदारी उस परिवार को दे दी जिन के घर में शादी हो रही थी। और अब सोणी ताई की डिलीवरी।
जो सामान हम ने अपने घर में जुटाया था वही इन भले लोगों ने यहां भी जुटा दिया था। ताई को पुनः किसी गौशाला में ले जाया गया। हम लोग उन की चौक में बैठ गए किसी भले भाई ने हम को तांबें के बड़े-बड़े गिलासों में गर्म चाय पकड़ा दी वह भाई वही था जिस की आज शादी की न्यूतेर थी। चाय गले से नही उतर रही थी। रिखणीखाल खाल की वो ठंडी वीरान हवायें हड्डी को भी छेद देती है। ताऊ जी और पदान दादा जी छन्नि में ही थे। किसी ने उन के लिए चाय वही भेज दी उन की छन्नि घर से चार कदम थी आवाजें यहां हम को साफ सुनाई दे रही थी। हम लोगों ने एक दूजे का मुहँ ताकते हुए चाय की चुसकियाँ मारनी शुुरु की अब सुबह के 5 बज गए थे। बर्फ भी गिरनी बंद हो गई थी सर्दी की रातें थी वरना गर्मी के दिनों में ग्रामीणों का आना जाना शुरु हो जाता । चिडियों का गुंजन सुनाई दे रहा था।
अचानक हम को किसी बच्चे के रोने की आवाजें सुनाई देने लगी। हम ने बड़ी उत्सुकता से दूल्हे को समय पूछा वो भाई बोला छः बज के तीन मिनट और अब चार तारिख हो गई थी, बुधवार हम लोगों से राहत की सांस ली। चलौ हमारी मेहनत कामयाब हुई। छन्नि से किसी दीदी ने हम को ग्राउंड जीरो की रिपोर्ट दी वो बोली कि जुडवा बच्चे हुए है । और दोनों लड़के है हमारा खुशी का ठिकाना न रहा। जैसे कि हमने आज सिकन्दर बन के जग जीत लिया।.......
 
हम गौशाला में जाते है तो मंजर देख के सन्न रह जाते है खुशी के आँसू पोछे,या गम के सम्भालें,जो मन्जर था वह हमारे पैरों के नीचे की जमीन को खिसका ले गया। हम जैसे खड़े थे वैसे ही रह गए......

अब आगे कल.......
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लेखन -:देवेश आदमी (प्रवासी)
पट्टी पैनो रिखणीखाल
(देवभूमि उत्तराखंड)
सम्पर्क -:8090233797

बुधवार, 9 अगस्त 2017

सत्य घटना - ताई जी की प्रसव पीड़ा by Devesh Rawat



बात मंगलबार 1970 की है मौसम सर्दी का, इलाके में घना कोहरा लगा हुआ था। गाँव घाटी में होने के कारण रात जल्दी हो जाती थी ओंस शाम 4 बजे से ही पड़नी शुरु हो जाती थी। चारो और सर्दी की वजह से सन्नाटा। पहाड़ों की जिन्दगीं की पटकथा वहां का मौसम लिखता है वहाँ के वाशिंदे नहीं। सर्दी, गरमी, और बरसात, कोई भी मौसम हो ।
 
1973 का वो मंगलबार का दिन था। सर्दी की ठिठुरती शाम और अचानक सोणी ताई को प्रसब् पीड़ा का होना। झबरू ताऊ ध्याडी (मजदूरी) कर के घर भी नही आये थे ताई जी को प्रसब् की असहनीय पीड़ा हो रही थी। वह चीखने लगी तो अगल- बगल वालो के घरों ने आवाजे सुनी। बुजर्ग औरतों को माजरे को समझने में देर नहीं लगी। सोणी ताई को लोगों ने घर के अंदर ही चारपाई पर लेटा दिया। सुमा काकी गरम पानी करने लगी । पीथा दादी सरसों के तेल से सोणी ताई की मालिस करने लगी। पुष्पा भाभी गोसाला से गाय बछियों को किसी और की छन्नि (गोशाला) में बांधने लगी। क्यों कि यहाँ सोणी ताई जी ने अपने बच्चे को जन्म देना था। (पहाड़ों में पहले प्रसब् के लिए गौशाला का प्रयोग किया जाता है)। छीला दीदी ने एक घरेलू चिमनी का जुगाड़ किया। शीशी (पवा) के ढकन पर छेद कर के चिमनी बनाई । और मिट्टी तेल डाल कर धोती के कोने को फाड़ के बत्ती बना कर छन्नि को प्रकाशमय कर दिया। सभी पड़ोसी अपनी तरफ से कोशिश कर रहे थे। कोई पुरानी धोती को फाड़ के खंडेला (बिछौना) बना रहा था। तो कोई पत्ती (ब्लेड) का जुगाड़ और कोई मुछेका (लकड़ी की बल्ली) जला रहा था। गौशाला में तो मनशीरु दादा जी डिगचा मुक्जया (धोना) रहे थे। न जाने कितने साल बाद इस डिगचे ने फिर से दुनियाँ देखी । पर आज उस के लिए भी संग्रांद थी। उधर सोणी ताई की बढ़ती जा रही थी। अब गाँव की दाई (पहाड़ी नर्स) भी आ गई थी । सब ने सोणी ताई को रसोड़ा (किचन) से छन्नि में शिफ्ट किया। छन्नि उन की अपनी भी नही है छन्नि ग्राम पंचायत की थी। क्यों कि छन्नि जिन का थी। वह इस गाँव में अकेले पण्डित थे। कुछ साल पहले वह लोग बड़े आदमी बन गए थे । क्योंकि वह लुधियाना में किसी A-one साइकिल कम्पनी में दोनों भाई नोकरीं करते थे। माँ उनकी बहुत पहले मर चुकी थी। एक बहिन थी। उस की शादी हो गई और कुछ साल पहले पिताजी भी स्वर्ग सिधार गए । दोनों भाई वहीं बस गए जैसे पढने वाले बहार बसने की सोच रहे है । पहले तो आते जाते थे घर, पर जब से उन के पिताजी गुजरे उसके बाद एक बार गाँव पूजा (पुजै) में आये थे मेंजैसे आप एलपीजी जाते जो। अब सात साल हो गए है घर नही आये। उनकी खेती गाँव के कुछ लोग करते थे। पर उनकी छन्नि लोगों के काम आ गई । घर को उनके गाँव वालों ने पंचायत भवन बना दिया था । पाँचवी क्लास तक की पढ़ाई भी उन्हीं के घर में होती है। वैसे हर साल हम लोग अपने घर की मरम्मत करें न करें उनके घर और छन्नि दोनों की मरम्मत और सफेदी जरूर करते थे। वह गाँव का अकेला घर था जिस पर चूना लगता था। रात को हम सब यहीं पर पढ़ते थे सभी पढ़ने वाले बच्चे रात नौ बजे तक यहीं रहते थे। नौ बजे के बाद खाना खाने अपने-अपने घर जाते थे। किसी को गाँव वाले को नौ बजे से पहले अपने बच्चों को खाना खिलाने की इजाजत नही थी। न धै (आवाज मारना) लगाने की। वरना दीना दीदी उसका विरोध करती थी। दीना दीदी हमारी अध्यपिका (बहिन जी) थी। ..पुरे गाँव में दीदी अकेली है जो दसवीं पास है बाकी पांच और आठ तक ही पढ़े लिखे है । पूरी पढाई न करने का मुख्य कारण स्कूल का पचीस किलोमीटर दूर होना । दीना दीदी का परिवार पहले लैंसडाउन रहता था चाचा जी आर्मी में थे पर 1965 की लड़ाई में खो गए थे।दीदी अपने माँ पापा के साथ कोटद्वार में रहती थी । पापा के मौत के बाद वह लोग गाँव में रहने लगे थे। दीदी गाँव के बच्चों को पढ़ाती थी।
इससे गाँव के बच्चो की जिंदगी सुधर रही थी। और बाल मंगलदल की तरफ से दीदी को महीने के पचपन रूपये मिल जाते थे।
 
इसी बीच झबरू ताऊ भी अपने सापा (गमछा) से हाथ मुहँ पोंछते हुए फ़्तगी मफलर पहने हुए चप्पलों पर सेलू के धागे बंधे थे । ताऊ जी का फौजी सुलार आज भी वैसे था है जैसे हवलदार पप्पू काका ने उन्हें एक साल पहले दिया था। ताऊ जी ने शायद दादा जी के श्राद के बाद दाढ़ी भी नही बनाई थी । कम से कम दो महीने तो ब्यतित हो गए होंगे। वैसे ताऊ जी एक पाँव से थोड़ा कमजोर थे। सुना था जब ताऊ जी उम्र में लगभग सालभर के थे तो गाँव में कोई महामारी फैली थी ताऊ जी महामारी को मात तो दे गए पर पैर से मार खा गए।

ताऊ घर के चौक में पांव रखा ही था। लोगों की भीड़ देखी तो ताऊ जी के हाथ पांव फूल गए । माजरा समझने में देर नही लगी। मालगुजार दादा ने और हवलदार ताऊ तथा पदान दादा ने ताऊ को समझाया तो ताऊ बाहरी मन से शांत हो गये पर फिर भी पहली औलाद जो घर में आने वाली थी। तो ताऊ जी की डर भी रहे थे। सभी पल भर में ताऊ जी के साथ हँसी मजाक करने लग गए। गढ़वाल में यही हँसी मजाक है जो हर दर्द दुःख सुख या आपदा में हम लोगों को आपस में जोड़ देता है!! तिरलोक चाचा बोले भाई गुड़ की भेली लाओ, या भूडे पकाओ पहली बार बाप बन रहा है, तो चिमनी ताई बोली!! पकोड़ी से नीचे काम नही चलेगा। गाँव में छ्कोल (सामूहिक भोजन) देना पड़ेगा। घर के चौक में अंगेठी जलाई हुई थी कोई हुक्का गुड़गुड़ा रहा है तो कोई बार-बार छन्नि में खबर लेने जा रहा है। घुत्ती भाई तो डी डी वन के पत्रकार की तरह ग्राउंड जीरो से पल-पल की खबर दे रहा था। दे भी क्यों न ? वह भी तो आज भाई बनेगा। उस के चाचा का महेमान रास्ते में जो है.....।
 
ताऊ जी की शादी हुए नौ साल हो गए थे। जब उनकी शादी हुई थी तब उनकी उम्र पंद्रह साल और ताई की उम्र बारह साल की थी। बल ताऊ जी की जब शादी हुई थी दादा जी ने दो दून मंडवा, दो दून झंगोरा, दहेज में दिया था। तब ये सब जोड़ने के लिए नाना जी को ताई की बुलाक गिरबी (बंधान) में रखकर बारातियों को खाने की ब्यवस्था करवाई थी। दादी का ही ग़ुलाबंद ताई (दुल्हन) को पहनाया गया था। वैसे कुछ अज्ञांता और कुछ खराब आर्थिक स्थिति की वजह से ताऊ जी के पहले तीन बच्चे पैदा होते ही मर गए थे।
समय बीतता जा रहा था । अब सब के माथे पर थोडा- थोडा चिंता दिखने लग गई थी। पर कोई किसी को कह नही रह था। उस की वजह ये थी कि पहाड़ों में कहते है जब डर लगे तो दूसरे को मत बोलो कि मुझे डर लग रह है। उसे हिम्मत से आगे का रास्ता तय करने दो। वरना दूसरा भी डर जायेगा । डरने का हक सब को है पर बोलना किसी को नही। आगे चलते रहो कुछ वक्त बाद हिम्मत आप को खुद खोजेगी। पदान दादा जी थोकदार जी को बुलाने संता दीदी को भेजा कि थोकदार जी को भट्या (बुला) लाओ। कुछ देर बाद पंखी ओढ़े मंकी टोपी और ब्राउन कोट चप्पल के साथ आर्मी वाले गर्म मौजे (जुराप) पहने थोकदार जी लांठी हाथ में लिए चौख में पहुंच गए। ताऊ जी ने मोड़ा सरकाया थोकदार जी बैठ गए । बुलाने की वजह जानी और सभी के बीच में सलाह मसवारा किया।
इतने में घुत्ती भाई ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट ले कर आ गया। घुत्ती भाई ने बोला कि दादी चाचा जी को बुला रही है कि हमारी बस की बात नही है। चाची बेहोश हो गई है जल्दी आओ।....
आगे अगले भाग में..


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लेखक-: देवेश आदमी (प्रवासी)
पट्टी पैनो रिखणीखाल
(देवभूमि उत्तराखंड)
सम्पर्क-:8090233797

बुधवार, 2 अगस्त 2017

आखिर जनता की क्यो नहीं सुनती सरकारें -चारु तिवारी


उत्तराखंड फिर सुलग रहा है। इस बार आवाज आ रही है सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ से। पंचेश्वर बांध को लेकर। टिहरी बांध के विस्थापितों की करुण कहानी अभी थमी नहीं है कि नेपाल की सीमा से लगे सीमान्त पिथौरागढ़ जनपद में बनने वाले पंचेश्वर बांध के विस्थापन की त्रासदी का रास्ता तैयार किया जाने लगा है। 315 मीटर ऊंचे बनने वाले इस बांध की क्षमता 6480 मेगावाट है। इस बांध ने भारत सरकार के उस नारे की भी पोल खोल दी जिसमें वह भविष्य में बड़े बांध न बनाये जाने की बात कर रही थी। पंचेश्वर बांध परियोजना भारत-नेपाल सीमा पर बहने वाली  महाकाली नदी पर उत्तराखंड के चंपावत जनपद और नेपाल के बैतड़ी जनपद के तल्ला सौराड़ क्षेत्र की सीमा पर प्रस्तावित है। जिस स्थल पर यह बनना है उसकी ऊंचाई समुद्र सतह से 430 मीटर है। जिस ऊंचाई पर 315 मीटर ऊंचा बांध बनने का अर्थ है पिथौरागढ़ जनपद से इस जलराशि में जाने वाली चार नदियों काली, सरयू, पनार और रामगंगा पर इसका असर पड़ेगा। काली नदी में धारचूला तक, सरयू में सेराघाट तक, पनार में सिमखेत तथा रामगंगा में थल तक का तटीय क्षेत्र डूब जायेगा। इस कारण भारत के 145 गांवों के सात हजार से अधिक परिवारों और चालीस हजार से अधिक की जनसंख्या को विस्थापन
का दंश झेलना पड़ेगा। नेपाल के साठ गांवों की बीस हजार से अधिक आबादी विस्थापित होगी। पंचेश्वर बांध की जद में पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, बागेश्वर और चंपावत जनपद आने वाले हैं। इससे इन जिलों की 9100 हेक्टेयर भूमि प्रभावित होगी। बागेश्वर के लिये लंबे समय जनता की रेलवे लाइन की मांग भी हमेशा के लिये समाप्त हो जायेगी। इस बांध के विरोध में जनता सड़कों पर है। सरकार हमेशा की तरह जनसुनवाइयों के माध्यम से पूरे मामाले को दूसरी दिशा में मोड़ने का काम कर रही है। जलविद्युत परियोजनाओं के बारे में हमारे अनुभव कभी अच्छे नहीं रहे। पंचेश्वर बांध के सवाल को और प्रखरता से रखे जाने की जरूरत है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जब लड़ाई जब विस्थापन या मुआवजे पर आयेगी तो हम लड़ाई हार जायेंगे। इसलिये बांध को निरस्त करने की लड़ाई लड़ी जानी चाहिये। इसके लिये बांधों के पुराने अनुभवों को समझना जरूरी है।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इस पहाड़ी राज्य में जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण और इसे बिजली
प्रदेश बनाने का सपना यहां की जनता की बेहतरी के लिए नहीं है। इस पूरी परिकल्पना के पीछे विकास के नाम पर एक बेहद शातिराना मुहिम चल रही है। सत्तर के दशक में टिहरी बांध के बाद विकास का यह दैत्याकार मॉडल लगातार यहां के लोगों को लील रहा है। प्राकृतिक धरोहरों के बीच रहने वाली जनता को लगातार उससे दूर करने की साजिश और इसे बड़े इजारेदारों को सौंपने की सरकारी नीतियां हिमालय के लिए बड़ा खतरा हैं। यह सवाल तब और महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब राज्य के विभिन्न हिस्सों में बांधों के खिलाफ लगातार जनआंदोलन चल रहे हैं। पिछले दिनों पिंडर पर बांध न बनाने को लेकर जबर्दस्त आंदोलन हुआ है और केदार घाटी में जनता ने नारा दिया है सर दे देंगे, लेकिन ‘सेरा’ (बड़े सिंचित खेत) नहीं देंगे। प्रशासन लगातार आंदोलनकारियों को जेल में डालता रहा है। कई स्थानों पर अभी भी लोग जनसुनवाइयों में बांधों का जमकर विरोध कर रहे हैं।


विकास के नाम पर लोगों को बरगलाने का सिलसिला बहुत पुराना है। टिहरी बांध के विरोध में स्थानीय लोगों ने
लंबी लड़ाई लड़ी। आखिर सरकार की जिद और विकास के छलावे ने एक संस्कृति और समाज को डुबो दिया। राज्य में प्रस्तावित सैकड़ों जलविद्युत परियोजनाओं से पूरा पहाड़ खतरे में है। इनसे निकलने वाली सैकड़ों किलोमीटर की सुरंगों से गांव के गांव खतरे में हैं। कई परियोजनाओं के खिलाफ लोग सड़कों पर हैं। बांध निर्माण कंपनियों का सरकार की शह पर मनमाना रवैया जारी है। जिन स्थानों पर जनसुनवाई होनी है, वहां जनता के खिलाफ बांध कंपनियों और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से भय का वातावरण बनाया गया है। राज्य की तमाम नदियों पर बन रही सुरंग-आधारित परियोजनाओं से कई गांव मौत के साये में जी रहे हैं। सरकार ने चमोली जनपद के चाईं गांव और तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना की सुरंग से रिसने वाले पानी से भी सबक नहीं लिया। यहां सुरंग से भारी मात्रा में निकलने वाले पानी से पौराणिक शहर जोशीमठ के अस्तित्व को खतरा है। चमोली जनपद के छह गांव पहले ही जमींदोज हो चुके हैं। तीन दर्जन से अधिक गांव इन सुरंगों के कारण कभी भी धंस सकते हैं। बागेश्वर जनपद में कपकोट में सरयू पर बन रहे बांध की सुरंग से 2010 में सुमगढ़ में मची भारी तबाही में 18 बच्चे मौत के मुंह में समा गए थे। भागीरथी पर बन रहे बांधों के खतरे सबके सामने हैं। टिहरी का जलस्तर बढऩे से कई गांव मौत के साये में जी रहे हैं। बावजूद इसके आंखें बंद कर राज्य को बिजली प्रदेश बनाने की जिद में बांध परियोजनाओं को जायज ठहराने की जो मुहिम चली है वह पहाड़ को बड़े विनाश की ओर ले जा सकती है। अब पूरे मामले को छोटे और बड़े बांधों के नाम पर उलझाया जा रहा है। असल में बांधों का सवाल बड़ा या छोटा नहीं है, बल्कि सबसे पहले इससे प्रभावित होने वाली जनता के हितों का है।

पिछले चालीस वर्षों से जलविद्युत परियोजनाओं का विरोध कर रही जनता की इन सरकारों ने नहीं सुनी। लंबे
समय तक टिहरी बांध विरोधी संघर्ष की आवाज को अगर समय रहते सुन लिया गया होता तो आज पहाड़ों को छेदने वाली इन विनाशकारी जलविद्युत परियोजनाओं की बात आगे नहीं बढ़ी होती। पहाड़ में बन रही तमाम छोटी-बड़ी जलविद्युत परियोजनायें यहां के लोगों को नेस्तनाबूत करने वाली हैं। जलविद्युत परियोजनाओं के खिलाफ मुखर हुई आवाज नई नहीं है। भागीरथी और भिलंगना पर प्रस्तावित सभी परियोजनाओं के खिलाफ समय-समय पर लोग सड़कों पर आते रहे हैं। लोहारी-नागपाला से फलेंडा और पिंडर पर बन रहे तीन बांधों के खिलाफ जनता सड़कों पर है। इस बीच जो सबसे बड़ा परिवर्तन आया है, वह है सरकार और बांध निर्माण कंपनियों का जनता को बांटने का षडय़ंत्र। इसके चलते मौजूदा समय में पूरा पहाड़ समर्थन और विरोध में सुलग रहा है। केंद्र और राज्य सरकार के बीच एक ऐसा अघोषित समझौता है जिसके तहत वह न तो इन परियोजनाओं के बारे में कोई नीति बनाना चाहते हैं और न ही बिजली प्रदेश बनाने की जिद में स्थानीय लोगों के हितों की परवाह करते हैं। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि यदि इन सरकारों की चली तो पहाड़ में 558 छोटे-बड़े बांध बनेंगे। इनमें से लगभग 1500 किलोमीटर की सुरंगें निकलेंगी। एक अनुमान के अनुसार अगर ऐसा होता है तो लगभग 28 लाख आबादी इन सुरंगों के ऊपर होगी। यह एक मोटा अनुमान सिर्फ प्रस्तावित बांध परियोजनाओं के बारे में है। इससे होने वाले विस्थापन, पर्यावरणीय और भूगर्भीय खतरों की बात अलग है।

मौजूदा समय में एक नई बात छोटी और बड़ी परियोजना के नाम पर चलाई जा रही है। बताया जा रहा है कि पहाड़ में बड़े बांध नहीं बनने चाहिए। इन्हें ‘रन ऑफ द रीवर’ बनाया जा रहा है, इसलिए इसका विरोध ठीक नहीं है। लेकिन यह सच नहीं है। उत्तराखंड में बन रही लगभग सभी परियोजनायें तकनीकी भाषा में भले ही ‘रन ऑफ द रीवर’ बतायी जा रही हों या उनकी ऊंचाई और क्षमता के आधार पर उन्हें छोटा बताया जा रहा हो, लेकिन ये सब बड़े बांध हैं। सभी परियोजनायें सुरंग आधारित हैं। सभी में किसी न किसी रूप में गांवों की जनता प्रभावित हो रही है। कई गांव तो ऐसे हैं जो छोटी परियोजनाओं के नाम पर अपनी जमीन तो औने-पौने दामों में गंवा बैठते हैं, लेकिन वे विस्थापन या प्रभावित की श्रेणी में नहीं आते हैं। जब सुंरग से उनके घर-आंगन दरकते हैं तो उन्हें मुआवजा तक नहीं मिलता, जान-माल की तो बात ही दूर है। सरकार और परियोजना समर्थकों की सच्चाई को जानने के लिए कुछ परियोजनाओं का जिक्र करना जरूरी है।

जिस लोहारी-नागपाला को लेकर पिछले वर्षो में विवाद होता रहा और फिलहाल वह बंद है। उसे ‘रन ऑफ द रीवर’ का नाम दिया गया। इसमें विस्थापन की बात को भी नकारा गया। स्थानीय लोगों ने तब भी इसका विरोध किया था, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। यह परियोजना 600 मेगावाट की है। इसमें 13 किलोमीटर सुरंग है। भागीरथी पर ऐसे 10 और बांध हैं। इनमें टिहरी की दोनों परियोजनाओं और कोटेश्वर को छोड़ दिया जाये तो अन्य भी बड़े बांधों से कम नहीं हैं। इनमें करमोली हाइड्रो प्रोजेक्ट 140 मेगावाट की है। इसके सुरंग की लंबाई आठ किलोमीटर से अधिक है। जदगंगा हाइड्रो प्रोजेक्ट 60 मेगावाट की है। इसकी सुरंग 11 किलोमीटर है। 381 मेगावाट की भैरोघाटी परियोजना जिसे सरकार ने निरस्त किया है, उसके सुरंग की लंबाई 13 किलोमीटर है। मनेरी भाली प्रथम 90 मेगावाट क्षमता की रन ऑफ द रीवर परियोजना है। यह 1984 में
प्रस्तावित हुई। इसे आठ किलोमीटर सुरंग में डाला गया है। इसका पावर हाउस तिलोय में है। इस सुरंग की वजह से भागीरथी नदी उत्तरकाशी से मनेरी भाली तक 14 किलोमीटर तक अपने अस्तित्व को छटपटा रही है। इसके बाद भागीरथी को मनेरी भाली द्वितीय परियोजना की सुरंग में कैद होना पड़ता है। 304 मेगावाट की इस परियोजना की सुरंग 16 किलोमीटर लंबी है। इसके बाद टिहरी 1000 मेगावाट की दो और 400 मेगावाट की कोटेश्वर परियोजना है। आगे कोटली भेल परियोजना 195 मेगावाट की है। इसमें भी 0.27 किलोमीटर सुरंग है।

गंगा की प्रमुख सहायक नदी अलकनंदा पर दर्जनों बांध प्रस्तावित हैं। इन्हें भी रन ऑफ द रीवर के नाम से प्रस्तावित किया गया। इस समय यहां नौ परियोजनाएं हैं। इनमे 300 मेगावाट की अलकनंदा हाइड्रो प्रोजेक्ट से 2.95 किलोमीटर की सुरंग निकाली गई है। 400 मेगावाट की विष्णुगाड़ परियोजना की सुरंग की लंबाई 11 किलोमीटर है। लामबगड़ में बनी इसकी झील से सुरंग चाईं गांव के नीचे खुलती है जहां इसका पावर हाउस बना है। यह गांव इसके टरबाइनों के घूमने से जमींदोज हो चुका है। लामबगढ़ से चाईं गांव तक नदी का अता-पता नहीं है। तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना इस समय सबसे संवेदनशील है। इस परियोजना की क्षमता 520 मेगावाट है। इससे निकलने वाली सुरंग की लंबाई 11.646 किलोमीटर है। यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर
जोशीमठ के नीचे से जा रही है। इससे आगे 444 मेगावाट विष्णुगाड़-पीपलकोटी परियोजना है। इससे 13.4 किलोमीटर सुरंग निकली है। 300 मेगावाट की बोवाला-नंदप्रयाग परियोजना से 10.246 किलोमीटर की सुरंग से गुजरेगी। नंदप्रयाग-लंगासू हाइड्रो प्रोजेक्ट 100 मेगावाट की है। इसमें पांच किलोमीटर से लंबी सुरंग बननी है। 700 मेगावाट की उज्सू हाइड्रो प्रोजेक्ट की सुरंग की लंबाई 20 किलोमीटर है। श्रीनगर हाइड्रो प्राजेक्ट जिसे पूरी तरह रन ऑफ द रीवर बताया जा रहा था उसकी सुरंग की लंबाई 3.93 किलोमीटर है। यह परियोजना 320 मेगावाट की है। अलकनंदा पर ही बनने वाली कोटली भेल- प्रथम बी 320 मेगावाट की परियोजना है। यह भी सुरंग आधारित परियोजना है। गंगा पर बनने वाली कोटली भेल-द्वितीय 530 मेगावाट की है। इसकी सुरंग 0.5 किलोमीटर है। चिल्ला परियोजना 144 मेगावाट की है, इसमें से 14.3 किलोमीटर सुरंग बनेगी।

जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों के ये आंकड़े केवल भागीरथी और अलकनंदा पर बनने वाले बांधों के हैं। इसके अलावा सरयू, काली, शारदा, रामगंगा, पिंडर आदि पर प्रस्तावित सैकड़ों बांधों और उनकी सुरंगों से एक
बड़ी आबादी प्रभावित होनी है। अब सरकार और विकास समर्थक इसके प्रभावों को नकार रहे हैं। उनका कहना है कि पर्यावरणीय प्रभाव और आस्था के सवाल पर विकास नहीं रुकना चाहिए। असल में यह तर्क ही गलत है। जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण का विरोध पर्यावरण और आस्था से बड़ा स्थानीय लोगों को बचाने का है। पिछले चार दशक से नदियों को बचाने से लेकर अपने खेत-खलिहानों की हिफाजत के लिए जनता सड़कों पर आती रही है। जिस तरह इस बात को प्रचारित किया जा जाता रहा है कि इन बांध परियोजनाओं की शुरुआत में लोग नहीं बोले, यह गलत है। लोहारी-नागपाला के प्रारंभिक दौर से ही गांव के लोग इसके खिलाफ हैं। भुवन चंद्र खंडूड़ी के मुख्यमंत्रित्वकाल में लोहारी-नागपाला के लोगों ने उसका काली पट्टी बांधकर विरोध किया था। श्रीनगर परियोजना में भी महिलाओं ने दो महीने तक धरना-प्रदर्शन कर कंपनी की नींद उड़ा दी थी। लोहारी-नागपाला परियोजना क्षेत्र भूकंप के अतिसंवेदनशील जोन में आता है, जहां बांध का निर्माण पर्यावरणीय दृष्टि से कतई उचित नहीं है। विस्फोटकों के प्रयोग से तपोवन-विष्णुगाड़ जल विद्युत परियोजना में चाईं गांव विकास के नाम पर विनाश को झेल रहा है। यहां के लोगों ने 1998-99 से ही इसका विरोध किया था, लेकिन जेपी कंपनी धनबल से शासन-प्रशासन को अपने साथ खड़े करने में सफल रही। आठ साल बाद 2007 में चाईं गांव की सड़कें कई जगह से ध्वस्त हो गईं। मलबा नालों में गिरने लगा, जिससे जल निकासी रुकने से गांव के कई हिस्सों का कटाव और धंसाव होने लगा। गांव के पेड़, खेत, गौशाला और मकान भी धंस गए। करीब 50 मकान पूर्ण या आंशिक रूप से ध्वस्त हुए तथा 1000 नाली जमीन बेकार हो गई। 520 मेगावाट वाली तपोवन-विष्णुगाड़ जल विद्युत परियोजना का कार्य उत्तराखंड सरकार और एनटीपीसी के समझौते के बाद 2002 में प्रारंभ किया गया, जिसमें तपोवन से लेकर अणमठ तक जोशीमठ के गर्भ से होकर सुरंग बननी है। निर्माणाधीन सुरंग से 25 दिसंबर 2009 से अचानक 600 लीटर प्रति सेकेंड के वेग से पानी का निकलना कंपनी के पक्ष में भूगर्भीय विश्लेषण की पोल खोलता है। इस क्षेत्र में विरोध करने वालों पर अनेक मुकदमे दायर किए गए हैं।

चिपको आंदोलन की प्रणेता गौरा देवी के गांव रैणी के नीचे भी टनल बनाना महान आंदोलन की तौहीन है। वर्षों
पहले रैणी महिला मंगल दल ने परियोजना क्षेत्र में पौधे लगाये थे। परियोजना तक सड़क ले जाने में 200 पेड़ काटे गए और मुआवजा वन विभाग को दे दिया गया। पेड़ लगाने वाले लोगों को पता भी नहीं चला कि कब ठेका हुआ। गौरा देवी की निकट सहयोगी गोमती देवी का कहना है कि पैसे के आगे सब बिक गया। रैणी से छह किमी दूर लाता में एनटीपीसी द्वारा प्रारंभ की जा रही परियोजना में सुरंग बनाने का गांववालों ने पुरजोर विरोध किया। मलारी गांव में भी मलारी झेलम नाम से टीएचडीसी की विद्युत परियोजना चल रही है। मलारी ममंद ने कंपनी को गांव में नहीं घुसने दिया। परियोजना के बोर्ड को उखाड़कर फेंक दिया। प्रत्युत्तर में कंपनी ने कुछ लोगों पर मुकदमे दायर किए हैं। इसके अलावा गमशाली, धौलीगंगा और उसकी सहायक नदियों में पीपलकोटी, जुम्मा, भिमुडार, काकभुसंडी, द्रोणांगिरी में प्रस्तावित परियोजनाओं में जनता का प्रबल विरोध है। पिंडर नदी में प्रस्तावित तीन बांधों के खिलाफ फिलहाल जनता वही लड़ाई लड़ रही है। 

बांध परियोजनाओं के आलोक में पंचेश्वर बांध को नये सिरे से देखे जाने की जरूरत है। पंचेश्वर के तमाम पहलुओं को जनता को बताना होगा। यह भी कि यह हमारी सांस्कृतिक, सामाजिक, पार्यावरणीय और हमारे अस्तित्व के साथ किस तरह जड़ा हुआ है। पंचेश्वर बांध का मतलब है हमें अपनी जमीन से उजाड़े जाने का षडयंत्र। यह ऐसा षडयंत्र है, जिसे हमारी व्यवस्था ने ही जन्म दिया। इस विस्थापन की कहानी के किरदार हमारे प्रतिनिनिधि हैं। सरकारें हमारे अस्तित्व, हमारी अस्मिता, हमारे स्वाभिमान, हमारे भविष्य का सौदा किस तरह करती है इसका उदाहरण नेपाल-भारत के बीच जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर बनी समितियों का है, जिसमें हमारे प्रतिनिधि शामिल होते रहे हैं। उत्तराखंड सरकार ने तो उसके लिये अलग से विंग ही बना दी थी। इसका परिणाम यह हुआ कि हमारे प्रतिनिधियों ने हमारे विस्थापन का सौदा किया। पंचेश्वर के बहाने अगर अस्तित्व को बचाने की लड़ाई आगे बढ़ती है तो यह उत्तराखंड के पूरे परिदृश्य को बदल सकती है।

गढ़वाल के राजवंश की भाषा थी गढ़वाली

 गढ़वाल के राजवंश की भाषा थी गढ़वाली        गढ़वाली भाषा का प्रारम्भ कब से हुआ इसके प्रमाण नहीं मिलते हैं। गढ़वाली का बोलचाल या मौखिक रूप तब स...