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बुधवार, 13 जुलाई 2016

रुमुक सतपुळि नयरि छाल की Garhwali Poem

रुमुक सतपुळि नयरि छाल की
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थड़्या-चौंफळा सि लगाणि च रुमुक ।
जन जून भ्यटणा को जाणि च रुमुक ॥

मेळु-पंया-सकिन्या का पल्वस्यां फूल ।
अफु पिंग्ळि पोतळ चिताणि च रुमुक ॥

कुबरण्यां-डुबरण्यां कळचुण्ड़्या आंखि।
फर्र-फर्र ड्यब्ळि फरकाणि च रुमुक ॥

समळ्यौण्यां खुद थैं बटि-बाटा लगैकि ।
बिंदरि गौड़ि सि कन रमाणि च रुमुक ॥

पिंग्ळु दुसला कु मुण्ड्यड़ू बांधिकि ।
कणट करदा-करदा जाणि च रुमुक ॥

दिनमनि की हैंसि ठट्ठा छोडि-छाडिक ।
यखुल्या यखुलि रुफणाणि च रुमुक ॥

झणि कै का सोचुम पोड़िक "पयाश" ।
खुट्यूं ऐथर-ऐथर सरकाणि च रुमुक ॥

@पयाश पोखड़ा ।

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मंगलवार, 12 जुलाई 2016

म्यार मुल्कै तीन भैंण मिठ्ठी-मयाली अर प्यारी नौ गढ़वाळी-कुमौनी-जौनसारी Garhwali Poem Garhwali Poem By Pardeep Singh Rawat

लोकभाषा बचाणा कू आन्दोलन का हवन मा एक आहुति मेरी तरफ बटे भी:::---




म्यार मुल्कै तीन भैंण
मिठ्ठी-मयाली अर प्यारी
नौ गढ़वाळी-कुमौनी-जौनसारी

यों दगड़ी बोलण-बच्याण
उत्तराखण्डी की छै या पच्छाण
यों की दगड़्या भी कम नि छाय
भोटिया-राठी-सलाणी।
जन्न माँ की मयळि पराणी।

कभी सर्या उत्तराखण्ड मा
यूं को राज छौ।
शब्द भण्डार भी खूब छौ।
आणा-पखाणां, गीत-कविता
साहित्य भी कम नई छौ।

आज यों गौ-गल्याउँद
घुन्जा घाळीक रुणां छन,
अपणा आख़री सांस लीणा छन,
यूका घौर-गौ मा परदेशी
खूब फळणा-फुलणा छन।
ऊखुणी अकादमी भी बण्यां छन।
यो अपणू का बीच अनाथ ह्वयां छन।

अब बक्त ऐ गै अपणी दुधबोली-भाषा बचाणा कू
अपणो दगड़ी अपणी बोलि-भाषा मा बच्याणा कू।
यख लिखदरो अर सुणदरों की क्वी कमि नीच।
कमि बस पढ़दरों अर बोलदरो की।

हे म्यारा मुल्कै फुन्यानाथौ
हथ्थ जोड़दू तुम कू यूं ‘साथी’
लोकभाषा अकादमी बणै की
बचै द्या तुम गढवाळी-कुमौनी-जौनसारी।
बचै द्या तुम गढवाळी-कुमौनी-जौनसारी।




रचना: गोविन्दराम पोखरियाल ‘साथी’
ग्राम-डुलमोट, पट्टी ढौंडियाल स्यू,
पौड़ी गढ़वाल

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